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दिल्ली में क्वॉड का मंथन आगाज़ -बैठे चार यार क्या अब रुक जाएगा वार?- चीन एशियाई नाटो जैसी संज्ञा क्यों देता हैँ? आतंकवाद के खिलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति को दोहराना बैठक का महत्वपूर्ण संदेश

by Page 3 News International Desk
May 27, 2026
in Hindi Editorials
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भारतीय अध्यक्षता में संपन्न क्वॉड शिखर सम्मेलन 26 मई 2026 -इंडो-पैसिफिक से मिडिल ईस्ट तक बदलती वैश्विक रणनीति का नया संकेत

क्वॉड अब केवल एक संवाद मंच नहीं, वैश्विक रणनीतिक स्थिरता, समुद्री सुरक्षा,तकनीकी सहयोग और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बचाने वाला प्रभावशाली समूह बना -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर नई दिल्ली में 26 मई 2026 को संपन्न हुई, क्वॉड विदेश मंत्रियों की बैठक केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी,बल्कि तेजी से बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच चार प्रमुख लोकतांत्रिक शक्तियों, भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का रणनीतिक मंथन थी। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव ने पूरी दुनियाँ की ऊर्जा सुरक्षा,समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन को अस्थिर कर दिया है,वहीं हिंद- प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता, समुद्री विस्तारवाद और भू- राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक शक्तियों की चिंताओं को और गहरा कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली में बैठे चार यार केवल बयान देने नहीं, बल्कि भविष्य की विश्व-व्यवस्था के नए समीकरण तय करने के लिए एक मंच पर दिखाई दिए। भारतीय विदेश मंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैठक और संयुक्त प्रेस वार्ता ने स्पष्ट संकेत दिया कि क्वॉड अब केवल एक संवाद मंच नहीं,बल्कि वैश्विक रणनीतिक स्थिरता, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बचाने वाला प्रभावशाली समूह बन चुका है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, अमेरिकी सैन्य गतिविधियों, ऊर्जा संकट की आशंकाओं और इंडो- पैसिफिक में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच दिल्ली में हुआ यह मंथन आने वाले समय की वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाला बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
साथियों भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो,ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग और जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्वॉड देशों के बीच रणनीतिक समन्वय अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है। यह बैठक ऐसे समय हुई जब पूरी दुनियाँ पश्चिम एशिया की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। ईरान से जुड़े घटनाक्रम, अमेरिकी सैन्य सक्रियता और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर बढ़ते खतरे ने वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की आशंकाओं को बढ़ा दिया है।ऐसे में नई दिल्ली की यह बैठक केवल इंडो- पैसिफिक तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें वैश्विक भू – राजनीतिक चुनौतियों और आर्थिक सुरक्षा के व्यापक पहलुओं पर भी विचार हुआ।भारतीय विदेश मंत्री ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक विकास और स्थिरता का मुख्य इंजन बन चुका है। उन्होंने इस क्षेत्र में स्वतंत्र,खुले और समावेशी वातावरण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का दबाव,आक्रामकता या एकतरफा शक्ति-प्रदर्शन क्षेत्रीय संतुलन के लिए खतरा है।उन्होंने भरोसेमंद और पारदर्शी साझेदारी को वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया। उनका यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से चीन की आक्रामक नीतियों और विस्तारवादी रणनीति की ओर संकेत माना गया। भारत ने साफ संदेश दिया कि वह इंडो-पैसिफिक में किसी भी प्रकार की अस्थिरता को स्वीकार नहीं करेगा और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।क्वॉड बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समुद्री सुरक्षा और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन पर हुआ व्यापक विचार- विमर्श रहा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व व्यापार का सबसे बड़ा समुद्री मार्ग है, जहां से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक बढ़ती सैन्य गतिविधियों और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया है। बैठक में इस बात पर सहमति बनी किअंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाए और किसी भी देश को एकतरफा तरीके से समुद्री नियंत्रण स्थापित करने की अनुमति न मिले। यह संदेश स्पष्ट रूप से चीन की समुद्री गतिविधियों और उसके बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सटीकता से देखा जा रहा है।
साथियों,बैठक में वैश्विकसप्लाई चेन की मजबूती पर भी विशेष जोर दिया गया। कोविड महामारी और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशिया संकट ने यह साबित कर दिया कि दुनियाँ किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता का जोखिम नहीं उठा सकती। क्वॉड देशों ने महत्वपूर्णखनिजों यानी क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की।आधुनिक तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरणों के निर्माण में इन खनिजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभी तक इन क्षेत्रों में चीन का दबदबा माना जाता रहा है,लेकिन क्वॉड देशों की नई रणनीति का उद्देश्य वैकल्पिक आपूर्ति तंत्र विकसित करना है ताकि सटीकता से किसी एक देश पर निर्भरता कम हो सके।
साथियों, भारत और अमेरिका के बीच क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन को लेकर हुए समझौते को इस बैठक की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत तेजी से उभरती हुई विनिर्माण शक्ति बनना चाहता है और इसके लिए उसे सुरक्षित तथा विश्वसनीय संसाधन आपूर्ति की आवश्यकता है। वहीं अमेरिका चीन पर निर्भरता कम करने की वैश्विक रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच यह सहयोग भविष्य में तकनीकी और औद्योगिक साझेदारी को नई ऊंचाई दे सकता है।उभरती हुई प्रौद्योगिकियों और साइबर सुरक्षा पर भी बैठक में व्यापक चर्चा हुई। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, साइबर डिफेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर आज वैश्विक शक्ति संतुलन के नए उपकरण बन चुके हैं। क्वॉड देशों ने इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और सुरक्षित तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने पर सहमति जताई। विशेष रूप से साइबर अपराध और डिजिटल जासूसी को लेकर साझा चिंता व्यक्त की गई। डिजिटल दुनिया में बढ़ते खतरों को देखते हुए यह सहयोग भविष्य में सामरिक सटिका से महत्व का आधार बन सकता है।
साथियों,आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को दोहराना भी इस बैठक का महत्वपूर्ण संदेश रहा। क्वॉड देशों ने स्पष्ट कहा कि किसी भी प्रकार का आतंकवाद मानवता और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है और इस बार भी उसने आतंकवाद के खिलाफ कठोर वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। यह संदेश केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन शक्तियों को भी संकेत था जो अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद को समर्थन देती हैं।मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया के हालात पर हुई चर्चा ने इस बैठक को और अधिक वैश्विक महत्व प्रदान किया। ईरान से जुड़े तनाव, अमेरिकी सैन्य हमलों और क्षेत्रीय संघर्षों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित करने की आशंका पैदा कर दी है। क्वॉड देशों ने चिंता जताई कि यदि यह संकट और गहराया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, सप्लाई चेन में बाधा और आर्थिक अस्थिरता पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि दिल्ली बैठक में पश्चिम एशिया के मुद्दे पर विशेष ध्यान दिया गया।
साथियों, बैठक में यह भी स्पष्ट हुआ कि क्वॉड अब केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी के व्यापक ढांचे में विकसित हो रहा है। यह समूह एक ऐसे वैकल्पिक वैश्विक सहयोग मॉडल के रूप में उभर रहा है जो लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और नियम- आधारित व्यवस्था पर आधारित है। क्वॉड की बढ़ती सक्रियता इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन बहुध्रुवीय स्वरूप की ओर बढ़ सकता है।हालांकि इस बार नेताओं का पूर्ण शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो सका, लेकिन विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह साबित कर दिया कि क्वॉड की गति धीमी नहीं हुई है। भारत ने औपचारिक रूप से क्वॉड की अध्यक्षता ऑस्ट्रेलिया को सौंप दी। यह हस्तांतरण केवल प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि सहयोग की निरंतरता का प्रतीक भी है। ऑस्ट्रेलिया की नई भूमिका आने वाले समय में इंडो- पैसिफिक रणनीति को और सक्रिय बना सकती है।भारत के लिए यह बैठक विशेष महत्व रखती है क्योंकि उसने एक बार फिर वैश्विक कूटनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका को स्थापित किया है। नई दिल्ली अब केवल दक्षिण एशिया की राजनीतिक राजधानी नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बनती जा रही है। रूस- यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया संकट और इंडो- पैसिफिक सुरक्षा तक, भारत ने संतुलित और बहुआयामी कूटनीति का प्रदर्शन किया है। क्वॉड बैठक की सफल मेजबानी ने यह संदेश दिया कि भारत विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।क्वॉड को लेकर चीन की चिंताएं भी लगातार बढ़ती रही हैं। चीन लंबे समय से इस समूह को एशियाई नाटो जैसी संज्ञा देता रहा है, हालांकि क्वॉड देश लगातार यह कहते रहे हैं कि यह किसी के खिलाफ सैन्य गठबंधन नहीं है। फिर भी वास्तविकता यह है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती शक्ति और आक्रामक रणनीति ने क्वॉड को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियों ने क्षेत्रीय देशों को सामूहिक रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है।दिल्ली में हुई यह बैठक वैश्विक राजनीति के उस संक्रमण काल की झलक भी है जहां सुरक्षा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुके हैं। अब युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि सप्लाई चेन, डेटा, साइबर स्पेस और समुद्री मार्गों पर भी शक्ति संघर्ष चल रहा है। क्वॉड की नई रणनीति इसी बदलती वैश्विक वास्तविकता को प्रतिबिंबित करती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि नई दिल्ली में संपन्न क्वॉड विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया कि विश्व राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। इंडो -पैसिफिक की सुरक्षा, पश्चिम एशिया का संकट, ऊर्जा आपूर्ति,साइबर सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और वैश्विक सप्लाई चेन जैसे मुद्दे अब अलग-अलग नहीं रहे। इन सभी चुनौतियों का समाधान सामूहिक सहयोग और भरोसेमंद साझेदारी में ही निहित है। दिल्ली में हुआ यह रणनीतिक मंथन आने वाले वर्षों की वैश्विक राजनीति का आधार बन सकता है। भारत की सक्रिय भूमिका,अमेरिका कीरणनीतिक प्राथमिकताएं, जापान की सुरक्षा चिंताएं और ऑस्ट्रेलिया की क्षेत्रीय भागीदारी मिलकर एक ऐसे नए वैश्विक ढांचे की ओर संकेत कर रही हैं जहां लोकतांत्रिक शक्तियां मिलकर विश्व व्यवस्था को संतुलित रखने की कोशिश कर रही हैं।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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