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ब्रिक्स सम्मेलन 2026:मोदी- शी-पुतिन एक मंच पर, तेल 108 डॉलर पार -क़्या ब्रिक्स से भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार को मिलेगी ऑक्सीजन? -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
September 13, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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ब्रिक्स के मंच पर भारत का बड़ा दांव -क़्या रूस का तेल, चीन का बाजार और यूपी आई बदल देंगे वैश्विक अर्थव्यवस्था की चाल?

दिल्ली में ब्रिक्स का महामंथन -क़्या खोज पाएंगे आर्थिक संकट का रास्ता? -सम्मेलन की सफ़लता का अंतिम पैमाना अगले कुछ महीनों में दिखने वाले व्यापार,निवेश, भुगतान,ऊर्जा और कूटनीतिक परिणाम होंगे – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को चल रहे दो दिवसीय 18 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस समय पूरी दुनिया की निगाहों के केंद्र में है। भारत की अध्यक्षता में चल रहे इस सम्मेलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन,चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत ब्रिक्स के प्रमुख नेता मौजूद हैं। चीन की आधिकारिक घोषणा की थी कि शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को भारत में रहेंगे। यही वजह है कि दिल्ली का यह सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं,बल्कि बदलती वैश्विकआर्थिक और भू-राजनीतिक व्यवस्था का बड़ा मंच बन गया है। भारत की अध्यक्षता का फोकस रेजिलिएंस,इनोवेशन,कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी पर है और नई दिल्ली ब्रिक्स को केवल राजनीतिक बयानबाजी का मंच नहीं, बल्कि व्यावहारिक आर्थिक सहयोग का प्रभावी प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश कर रही है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि इस सम्मेलन का सबसे ज्यादा इंतजार भारतीय पीएम और चीन के राष्ट्रपति की संभावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर है। चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है और बीजिंग भारत के साथ रणनीतिक तथा दीर्घकालिक दृष्टिकोण से संबंधों को मजबूत करने, सहयोग बढ़ाने और मतभेदों को उचित तरीके से संभालने की बात कर रहा है। यह मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत में शी की 2019 के बाद पहली यात्रा है और दोनों देशों के बीच सीमा तनाव के बाद संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की प्रक्रिया के बीच हो रही है।संभावित बातचीत में सीमा पर शांति, व्यापार असंतुलन,बाजार पहुंच, निवेश,आपूर्ति शृंखला, वीजा तथा आर्थिक संबंधों को स्थिर करने जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं।हालांकि इससे तत्काल ट्रेड डेफिसिट खत्म होने की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि दोनों देशों के बीच आर्थिक संवाद के लिए ठोस रास्ता बनता है तो यह भारतीय उद्योग,निर्यात और निवेश के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है।मीडिया के अनुसार लगभग 6 साल के अंतराल के बाद,भारत और चीन के बीच सीधी विमान सेवा फिर 21 सितंबर से शुरू होने जा रही है,वर्ष 2020 में कोरोना महामारी और सीमा पर उपजे तनाव के चलते दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें स्थगित कर दी गई थीं।
साथियों बात अगर हम पुतिन का संदेश: ब्रिक्स बनाम जी-7 की बदलती तस्वीर को समझने की करें तो,ब्रिक्स बिजनेस फोरम में व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक ताकत को रेखांकित किया। उनका संदेश साफ था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती शक्तियों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। आज ब्रिक्स में कुल 21 सदस्य भाग ले रहे 11 पूर्ण सदस्य हैं तथा 10 साझेदारी सदस्य हैं,और यह समूह लगभग आधी दुनियाँ की आबादी तथा क्रय-शक्ति के आधार पर लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। पुतिन द्वारा ब्रिक्स और जी-7 की आर्थिक हिस्सेदारी की तुलना का राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है,वैश्विक आर्थिक शक्ति अब केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिक्स तुरंत जी-7 का विकल्प बन गया है। ब्रिक्स के भीतर चीन-भारत मतभेद, अलग- अलग आर्थिक हित और पश्चिम के साथ अलग- अलग देशों के संबंध अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। इसलिए दिल्ली सम्मेलन की असली सफलता इस बात से तय होगी कि बयान कितने बड़े हैं, उससे ज्यादा ठोस फैसले कितने लागू होते हैं।
साथियों बात अगर हम शेयर बाजार में गिरावट और ब्रिक्स से ऑक्सीजन की उम्मीद कुछ समझने की करें तोब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब भारतीय शेयर बाजार अंतरराष्ट्रीय जोखिमों से दबाव में है। 11 सितंबर को सेंसेक्स 0.84 प्रतिशत गिरकर 74,272.61 और निफ्टी 0.92 प्रतिशत गिरकर 23,261.7 पर बंद हुआ। बाजार तीन महीने के निचले स्तर तक पहुंच गया और मिडकैप तथा स्मॉलकैप में भी तेज बिकवाली दिखाई दी। सप्ताह के स्तर पर निफ्टी लगभग 2.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 2.9 प्रतिशत नीचे रहा।शुरुआतीकारोबार में तस्वीर और भयावह थी सेंसेक्स करीब 740 अंक तक गिरा और बीएसई की कुल बाजार पूंजी में शुरुआती मिनटों में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये की कमी आई। इसलिए सवाल स्वाभाविक है कि क्या ब्रिक्स सम्मेलन इस गिरते बाजार को ऑक्सीजन दे सकता है? इसका जवाब है,हां, लेकिन सीमित और शर्तों के साथ।यदि सम्मेलन से स्थानीय मुद्रा व्यापारडिजिटल पेमेंट कनेक्टिविटी,निवेश सहयोग,सप्लाई चेन,ऊर्जा सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और बाजार पहुंच पर ठोस घोषणाएं निकलती हैं तो बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल टेक्नोलॉजी, निर्यात और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों के लिए सकारात्मक धारणा बन सकती है। लेकिन शेयर बाजार केवल सम्मेलन की तस्वीरों से नहीं चलता। उसे तेल, ब्याज दर, विदेशी निवेश, महंगाई, कॉरपोरेट कमाई और वैश्विक जोखिमों से भी सटीकता से दिशा मिलती है।
साथियों बात अगर हम 108 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क़ो समझने की करें तो,भारत के लिए इस समय सबसे बड़ा आर्थिक जोखिम कच्चा तेल है। 11 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया और दिन के दौरान करीब 108.7 डॉलर तक कारोबार हुआ। पश्चिम एशिया में संघर्ष,यमन के हूती बलों की गतिविधियां और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरे ने वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है,इसलिए लंबे समय तक महंगा तेल रुपये, महंगाई, चालू खाते और कंपनियों की लागत पर दबाव डाल सकता है।11 सितंबर को रुपया भी शुरुआती कारोबार में डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर करीब 95.79 तक पहुंचा। ऐसे माहौल में ब्रिक्स से ऊर्जा सहयोग, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और सुरक्षित समुद्री आपूर्ति पर ठोस पहल भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होगी।
साथियों बात अगर हम अमेरिका की बॉन्ड यील्ड और वैश्विक बाजार का दबाव को समझने की करें तो,दूसरी बड़ी चिंता अमेरिकी बॉन्ड यील्ड है। 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 5 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है; 11 सितंबर को इसका दिन का उच्च स्तर लगभग 4.98 प्रतिशत रहा। ऊंची अमेरिकी यील्ड का मतलब है कि वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी डेट इंस्ट्रूमेंट अधिक आकर्षक हो सकते हैं, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी निकलने का खतरा बढ़ता है। इसके साथ अमेरिका में महंगाई के दबाव और फेड की संभावित सख्ती की चिंता ने जोखिम वाली परिसंपत्तियों पर दबाव बढ़ाया है। इसलिए भारत में बाजार की कमजोरी को केवल घरेलू समस्या समझना गलत होगा; इसके पीछे तेल, बॉन्ड यील्ड, डॉलर, भू-राजनीति और वैश्विक पूंजी प्रवाह का सटिका से संयुक्त प्रभाव है।
साथियों बात अगर हम क्या ब्रिक्स डॉलर पर प्रहार करेगा ? इसको समझने की करें तो,ब्रिक्स में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हुई है। वाणिज्य मंत्री ने सदस्य देशों से भुगतान प्रणालियों को जोड़ने,स्थानीय मुद्राओं में सीमा- पार व्यापार बढ़ाने, बाजार पहुंच आसान बनाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने की अपील की है।उन्होंने यूपीआई को अंतरराष्ट्रीय डिजिटल भुगतान सहयोग के संभावित मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया।लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है,ब्रिक्स 2026 का तत्काल एजेंडा कोई नई साझा ब्रिक्स करेंसी लॉन्च करना नहीं है।भारत ने इस सालऔपचारिक डी-डॉलराइजेशन एजेंडे से दूरी रखते हुए व्यावहारिक भुगतान सहयोग और स्थानीय मुद्रा लेनदेन पर जोर दिया है। इसलिए इसे डॉलर पर तत्काल हमला कहने के बजाय डॉलर पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करने की दीर्घकालिक कोशिश कहना ज्यादा सटीक होगा।
साथियों बात अगर हम 12 सितंबर की असली परीक्षा: भाषण नहीं,एक्शन को समझने की करें तो,12 सितंबर को मोदी-शी मुलाकात,ब्रिक्स नेताओं की उच्चस्तरीय बैठकें,आर्थिक सहयोग,व्यापार,निवेश,डिजिटल भुगतान सप्लाई चेन और वैश्विक शासन सुधार जैसे मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण रहे।भारतीय पीएम का कार्यक्रम भी कई द्विपक्षीय मुलाकातों से भरा है और शी के साथ बातचीत को सबसे महत्वपूर्ण बैठकों में गिना जा रहा है।ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पहले ही व्यापार बाधाएं कम करने, निवेश बढ़ाने,सप्लाई चेन को मजबूत करने औरडिजिटल भुगतान सहयोग पर जोर दिया जा चुका है।अब दुनियाँ यह देखना चाहती है कि क्या शिखर सम्मेलन इन विचारों को ठोस समझौतों और समयबद्ध योजनाओं में बदल पाता है।
साथियों बात अगर हम भारत को क्या मिलेगा अर्थव्यवस्था बाजार या वैश्विक नेतृत्व? इसको समझने की करें तो, ब्रिक्स 2026 से भारत को सबसे बड़ा लाभ केवल तत्काल शेयर बाजार उछाल के रूप में नहीं,बल्कि रणनीतिक आर्थिक और कूटनीतिक पूंजी के रूप में मिल सकता है। भारत यदि रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के साथ संवाद बनाए रखते हुए अमेरिका,यूरोप और ग्लोबल साउथ के बीच संतुलन कायम करता है, तो उसकी ब्रिज पावर मजबूत होगी। रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग,चीन के साथ व्यापार और सीमा स्थिरता, ईरान के साथ क्षेत्रीय संपर्क तथा अन्य ब्रिक्स देशों के साथ निवेश और सप्लाई चेन सहयोग भारत की वैश्विक भूमिका को मजबूत कर सकते हैं।भारतीय पीएम और पुतिन कीबातचीत में ऊर्जा,रक्षा,अंतरिक्ष, उर्वरक महत्वपूर्ण खनिज और व्यापार जैसे क्षेत्र पहले ही चर्चा में रहे हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि ब्रिक्स सम्मेलन भारतीय शेयर बाजार के लिए तुरंत चमत्कारीऑक्सीजन नहीं, बल्कि भरोसे का नया आधार बन सकता है। यदि दिल्ली से व्यापार बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने, स्थानीय मुद्रा भुगतान, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा,समुद्री मार्गों की सुरक्षा और सप्लाई चेनविविधीकरण पर ठोस फैसले निकलते हैं तो बाजार को मध्यम अवधि में सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। लेकिन यदि पश्चिम एशिया का युद्ध लंबा चलता है, तेल 100-110 डॉलर के ऊपर बना रहता है और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची रहती है,तो ब्रिक्स की सकारात्मक खबरें भी बाजार के दबाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाएंगी।असली कहानी यही है कि दिल्ली में ब्रिक्स केवल एक शिखर सम्मेलन नहीं कर रहा; यहां भारत उस बदलती दुनियाँ में अपनी जगह तय करने की कोशिश कर रहा है, जहां आर्थिक शक्ति पश्चिम से आगे बढ़कर ग्लोबल साउथ की ओर तेजी से फैल रही है। सम्मेलन की सफलता का अंतिम पैमाना भाषण नहीं, बल्कि अगले कुछ महीनों में दिखने वाले व्यापार, निवेश, भुगतान,ऊर्जा औरकूटनीतिक परिणाम होंगे।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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