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क्या ब्रिक्स बनेगा नई विश्व व्यवस्था का इंजन? -भारत के क्रिटिकल मिनरल्स दांव से हिल गए ट्रंप? -अमेरिका,चीन और पश्चिम की बढ़ी चिंता! -क्या क्रिटिकल मिनरल्स बदलेंगे दुनियाँ की चाल?

by Page 3 News International Desk
September 12, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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ब्रिक्स 2026 का मूल मंत्र बिल्डिंग फॉर रेसिलिन्स, इन्नोवेशन, कोआपरेशन एंड सस्टेंएंबिलिटी तथा ह्यूमनिटी फर्स्ट, भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर

ब्रिक्स 2026 क़ी अध्यक्षता भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि 21वीं सदी की नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते कद की निर्णायक घोषणा बन सकती है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनियाँ इस समय जिस दौर से गुजर रही है,उसमें युद्ध, व्यापारिक टकराव,ऊर्जा संकट, आपूर्ति-श्रृंखला की अस्थिरता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और महाशक्तियों के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक खींचतान ने वैश्विक व्यवस्था को अभूतपूर्व अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है। ऐसे समय में 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हो रहे 18 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक सामान्य कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी सामूहिक शक्ति को कितना प्रभावी बना सकती हैं। भारत 2026 में चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसकी अध्यक्षता का मूल मंत्र बिल्डिंग फॉर रेसिलिन्स, इन्नोवेशन, कोआपरेशन एंड सस्टेंएंबिलिटी तथा ह्यूमनिटी फर्स्ट है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा क़ि,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रिक्स अब केवल ब्राजील,रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का पुराना समूह नहीं रह गया है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने के बाद यह 11 सदस्यीय समूह बन चुका है। ब्रिक्स देशों में दुनियाँ की करीब आधी आबादी रहती है और क्रय-शक्ति समानता के आधार पर वैश्विक जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है। यही वजह है कि नई दिल्ली में होने वाला सम्मेलन पश्चिमी देशों सहित पूरी दुनियाँ की निगाहों के केंद्र में है।
साथियों,भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स का एजेंडा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा गया है। व्यापार,निवेश,ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक एमएसएमई स्टार्टअप,वैश्विक मूल्य- श्रृंखलाओं,पर्यावरण आपदा-रोधी क्षमता और भुगतान प्रणालियों जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर पूरे वर्ष बैठकें हुई हैं। जयपुर में ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में ब्रिक्स इकोनॉमिक पार्टनरशिप 2030 की दिशा में प्रगति,व्यापार वित्त की कमी दूर करने के लिए जयपुर सहमति और अधिक मजबूत तथा विविध वैश्विक मूल्य- श्रृंखलाओं पर जोर दिया गया। इसी तरह गुरुग्राम में ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में ऊर्जा सुरक्षा और स्मार्ट ग्रिड तथा ऊर्जा भंडारण के लिए ब्रिक्स डिजिटल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस की सटीकता से शुरुआत हुई।
साथियों,इसी व्यापक आर्थिक रणनीति के बीचक्रिटिकल मिनरल्स भारत की अध्यक्षता का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू बनकर उभर रहे हैं।लिथियम, निकेल कोबाल्ट ग्रेफाइट, कॉपर, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और प्लेटिनम ग्रुप की धातुएं आज केवल खनिज नहीं रह गई हैं; ये इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, रक्षा प्रणालियों एयरोस्पेस, दूरसंचार और आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियादी ताकत बन चुकी हैं। इसलिए जिस देश या समूह के पास इन खनिजों के भंडार, खनन, प्रोसेसिंग और तकनीक पर नियंत्रण होगा, उसके पास भविष्य की औद्योगिक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।यही कारण है कि ब्रिक्स में क्रिटिकल मिनरल्स का महत्व तेजी से बढ़ा है। 2024 के कज़ान शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स देशों के विशाल खनिज भंडार को देखते हुए भूवैज्ञानिक सहयोग और ब्रिक्स जियोलॉजिकल प्लेटफार्म को व्यावहारिक सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।इसका उद्देश्य भूवैज्ञानिक जानकारी,संसाधन आकलन, खनन तकनीक और खनिज संसाधनों के तर्कसंगत विकास में सहयोग बढ़ाना है।ब्रिक्स के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार समूह के पास दुनिया के रेयर-अर्थ मिनरल रिजर्व का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा है।
साथियों,यहां भारत की रणनीति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के पास रेयर अर्थ और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं, ब्राजील के पास रेयर अर्थ के साथ लिथियम और कॉपर की क्षमता है, रूस के पास निकेल, कॉपर और अन्य रणनीतिक खनिज हैं, दक्षिण अफ्रीका और रूस प्लेटिनम ग्रुप मेटल्स में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं, जबकि इंडोनेशिया निकेल की वैश्विक आपूर्ति में बेहद बड़ा खिलाड़ी है।यानी ब्रिक्स देशों की ताकतें एक-दूसरे की कमियों को पूरा कर सकती हैं।समस्या यह है कि जिन देशों के पास संसाधन हैं,उनके पास हमेशा प्रोसेसिंग और डाउनस्ट्रीम तकनीक नहीं है; वहीं जिन देशों के पास बड़ा बाजार, पूंजी और औद्योगिक क्षमता है, उनके पास पर्याप्त घरेलू भंडार नहीं हैं।यदि यह बिखरी हुई क्षमता एक साझा मूल्य- श्रृंखला में बदलती है, तो ब्रिक्स क्रिटिकल मिनरल्स में एक अत्यंत प्रभावशाली शक्ति बन सकता है।यहीं से उस सवाल का जवाब भी मिलता है कि भारत क्यों इस मुद्दे को इतना महत्व दे रहा है। भारत का उद्देश्य केवल खनिज खरीदना नहीं, बल्कि खनन से लेकर प्रोसेसिंग,रिफाइनिंग, तकनीक और अंतिम उत्पाद तक पूरी वैल्यू चेन में अपनी स्थिति मजबूत करना है। यह रणनीति चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने और भविष्य की तकनीकी तथा ऊर्जा अर्थव्यवस्था के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत बनाने से जुड़ी है। भारत पहले ही ब्रिक्स के भीतर अधिक लचीली और विविध वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं की सटीकता से वकालत कर चुका है।
साथियों इसका असर वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है। यदि किसी एक देश के पास किसी महत्वपूर्ण खनिज की खनन और प्रोसेसिंग क्षमता अत्यधिक केंद्रित हो और वह आपूर्ति को राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल करे, तो पूरी दुनिया की औद्योगिक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण खनिजों को राजनीतिक हथियार बनाए जाने के खिलाफ आपूर्ति-श्रृंखलाओं को सुरक्षित, विविध और विश्वसनीय बनाने की दिशा में सहयोग की वकालत कर रहा है।इसलिए क्रिटिकलमिनरल्स का मुद्दा अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न बन चुका है।
साथियों, इस पूरी कहानी में चीन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। चीन ब्रिक्स का सबसे बड़ा आर्थिक और औद्योगिक खिलाड़ी है और रेयर अर्थ की वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा 2020 के गलवान संघर्ष के बाद पैदा हुआ विश्वास का संकट अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में शी जिनपिंग का 12-13 सितंबर को भारत दौरा ऐतिहासिक महत्व रखता है। चीन के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की थीं कि शी जिनपिंग भारतीय पीएम के निमंत्रण पर 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने नई दिल्ली आएंगे।यह सात वर्षों में उनका पहला भारत दौरा होगा। 11 सितंबर को चीन के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा था कि मोदी और शी के बीच द्विपक्षीय बैठक कीव्यवस्था की जा रही है। दोनों पक्ष संबंधों को दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ाने, संवाद और सहयोग बढ़ाने तथा मतभेदों को उचित ढंग से संभालने की बात कर रहे हैं।इस बैठक में सीमा विवाद,एलएसी पर स्थिरता, व्यापार घाटा,बाजार पहुंच, निवेश,वीजा और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की हालिया बातचीत में नए सैन्य हॉटलाइन और सीमा प्रबंधन से जुड़े तंत्र पर प्रगति भी हुई है।
साथियों,हालांकि यहां भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है।चीन के साथ संबंध सुधारना भारत की जरूरत है, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और सुरक्षा हितों से समझौता करना नहीं। इसी तरह रूस के साथ भारत के संबंध, अमेरिका और पश्चिम के साथ रणनीतिक साझेदारी, क्वाड में भूमिका तथा ब्रिक्स और एससीओं में सक्रिय भागीदारी ये सभी भारत की उस बहु- संरेखीय विदेश नीति का हिस्सा हैं जिसमें नई दिल्ली किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने के बजाय अलग- अलग मंचों पर अपने राष्ट्रीय हितों को साधने की कोशिश करती है।इसलिए ब्रिक्स सम्मेलन में क्रिटिकल मिनरल्स के साथ-साथ डिजिटल भुगतान और आर्थिक संपर्क भी महत्वपूर्ण होंगे।भारत ब्रिक्स देशों के डिजिटल भुगतान प्रणालियों और सीबीडीसी को जोड़ने की दिशा में भी पहल कर रहा है,जिसका लक्ष्य सीमा- पार लेनदेन को आसान बनाना है; इसे डॉलर को तत्काल हटाने की योजना के रूप में नहीं बल्कि भुगतान प्रणालियों को अधिक सक्षम और विविध बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
साथियों लेकिन ब्रिक्स के सामने चुनौती भी कम नहीं है। ईरान और यूऐई के बीच मौजूदा तनाव,पश्चिम एशिया का युद्ध,ऊर्जा आपूर्ति और होर्मुज संकट तथा रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दे सदस्य देशों के बीच एक जैसी सोच नहीं बनने देते। ब्रिक्स में सर्वसम्मति आवश्यक है और मई में विदेश मंत्रियों की बैठक भी ईरान- यूऐई मतभेदों के कारण संयुक्त बयान जारी नहीं कर सकी थी। इसलिए नई दिल्ली सम्मेलन का असली परीक्षण यही होगा कि क्या इतने विविध हितों वाले देश साझा घोषणापत्र और व्यावहारिक एजेंडे पर सहमत हो पाते हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स अमेरिका या पश्चिम को चुनौती देने वाला कोई नया सैन्य गठबंधन बन जाएगा। वास्तविक सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स व्यापार, ऊर्जा,डिजिटल भुगतान, क्रिटिकल मिनरल्स,तकनीक और वैश्विक वित्त के क्षेत्र में ऐसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं खड़ी कर सकता है जो किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करें। भारत के लिए यही सबसे बड़ा अवसर है। यदि नई दिल्ली क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में संसाधन-संपन्न देशों को तकनीक,पूंजी और बड़े बाजारों से जोड़ने में सफल होती है,यदि चीन के साथ सीमा पर स्थिरता और आर्थिक संबंधों में संतुलन बनाती है और यदि ग्लोबल साउथ की आवाज को व्यावहारिक आर्थिक परिणामों में बदलती है, तो ब्रिक्स की 2026 अध्यक्षता भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि 21वीं सदी की नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते कद की निर्णायक घोषणा बन सकती है। और यही वह बिंदु है जहां क्रिटिकल मिनरल्स किसी खदान के भीतर छिपे संसाधन से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति-संतुलन को बदलने वाली रणनीतिक संपत्ति बन जाते हैं।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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