पापा वो छत हैं,जो धूप में साया बन जाते हैं,
खुद दर्द सहकर भी बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं।
जब सिर से हट जाएँ,तब रिश्तों के चेहरे नज़र आते हैं,
जिन्हें अपना समझा था,वही अक्सर औकात दिखाते हैं।
अफसोस! जीते पिता की कद्र कई घरों में नहीं होती,
उनकी बूढ़ी आँखों की नमी भी अक्सर दिखाई नहीं देती।
जब तक साँसों में हैं,उनके चरणों में सम्मान रखो,
कल तस्वीर के आगे रोने से पहले आज उनका हाथथामो
पितृपक्ष आएगा तो पिंड और तर्पण खूब करोगे,
मुट्ठी भर चावल लेकर कौवे में पिता को ढूँढोगे।
पर जिसने जीवन भर तुम्हें निवाला देकर बड़ा किया,
क्या उसके जीवित रहते एक निवाला प्रेम से दिया?
मृत पिता के लिए श्रद्धा दिखाना आसान है,
जीते पिता की सेवा करना ही सच्चा सम्मान है।
श्राद्ध की थाली से पहले उनके मन का हाल पूछो,
कर्मकांड से पहले उनके चरणों में बैठकर प्यार लुटाओ।
याद रखो बेटों,पिता फिर लौटकर कभी नहीं आते,
बीते हुए पल लाख चाहो,वापस नहीं लौट पाते।
किशन पितृपक्ष में ही नहींहर दिन पिता को भगवान मानो
जब तक हैं तुम्हारे पास,जीते-जी उनकी कद्र जानो।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
