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भारतीय संस्कृति और दर्शन ने सदैव संतोष को सर्वोच्च गुण माना है

by Page 3 News International Desk
June 21, 2026
in Hindi Editorials, Hindi News
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संतोष ही सबसे बड़ा धन है, यदि व्यक्ति के मन में संतोष है तो वह सीमित संसाधनों में भी सुखी रह सकता है

हमें अपनी इच्छाएँ सीमित करके अपने साधनों से संतुष्ट रहने में ही सच्ची खुशियाँ छुपी हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आज का युग अभूतपूर्व प्रगति, तकनीकी विकास और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य के पास पहले की अपेक्षा अधिक संसाधन, अधिक अवसर और अधिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, फिर भी आश्चर्य की बात यह है कि संतोष, शांति और खुशी की कमी पहले से अधिक दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य की इच्छाएँ उसके साधनों और आवश्यकताओं से कहीं अधिक बढ़ गई हैं। वह जो प्राप्त कर चुका है, उससे संतुष्ट होने के बजाय जो नहीं मिला है, उसकी चिंता में अपना वर्तमान खो देता है। वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि सच्ची खुशियाँ बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने साधनों के अनुरूप जीवन जीने और सीमित इच्छाओं में संतोष खोजने में निहित हैं। आवश्यकता केवल इस सत्य को पहचानने और अपनाने की है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ सीमित हैं, किंतु इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। यह क्रम जीवनभर चलता रहता है। यही कारण है कि अनेक बार अत्यधिक संपन्न व्यक्ति भी मानसिक तनाव, चिंता और असंतोष से घिरा रहता है, जबकि सीमित साधनों वाला व्यक्ति भी संतोष और प्रसन्नता के साथ जीवन व्यतीत करता दिखाई देता है। यह अंतर धन या संसाधनों का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का है। जिसने संतोष का महत्व समझ लिया, उसने जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति प्राप्त कर ली।
साथियों, भारतीय संस्कृति और दर्शन ने सदैव संतोष को सर्वोच्च गुण माना है। हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है। यदि व्यक्ति के मन में संतोष है तो वह सीमित संसाधनों में भी सुखी रह सकता है, किंतु यदि संतोष नहीं है तो अपार धन-संपत्ति भी उसे खुश नहीं रख सकती। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ राजाओं और सम्राटों के पास असीमित वैभव था, फिर भी वे मानसिक शांति की तलाश में भटकते रहे। दूसरी ओर अनेक संत-महात्मा अत्यंत साधारण जीवन जीते हुए भी आनंद और आत्मिक संतुष्टि से परिपूर्ण रहे।वर्तमान समय में उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा ने इच्छाओं को और अधिक बढ़ा दिया है। विज्ञापन, सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति ने लोगों के मन में यह धारणा पैदा कर दी है कि अधिक वस्तुएँ, अधिक धन और अधिक प्रतिष्ठा ही खुशी का आधार हैं। लोग अपने जीवन की तुलना दूसरों से करने लगे हैं। किसी के पास नई कार है तो दूसरे को उससे बड़ी कार चाहिए, किसी के पास बड़ा घर है तो दूसरे को उससे अधिक भव्य घर चाहिए। इस अंतहीन दौड़ में व्यक्ति अपनी वास्तविक आवश्यकताओं और जीवन के मूल उद्देश्य को भूल जाता है। परिणामस्वरूप उसे न तो वर्तमान का आनंद मिलता है और न ही भविष्य की कोई निश्चित खुशी।
साथियो, इच्छाओं का अनियंत्रित विस्तार केवल मानसिक तनाव ही नहीं बढ़ाता, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को भी जन्म देता है। अनेक लोग अपनी आय से अधिक खर्च करने लगते हैं, ऋण के बोझ तले दब जाते हैं और फिर चिंता तथा अवसाद का शिकार हो जाते हैं। परिवारों में कलह, रिश्तों में दूरी और सामाजिक असंतुलन का एक बड़ा कारण भी यही असीमित इच्छाएँ हैं। जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक पाने की लालसा में जीने लगता है, तब उसके जीवन से संतुलन समाप्त होने लगता है।इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने साधनों के अनुसार जीवन जीता है, वह मानसिक रूप से अधिक शांत और संतुलित रहता है। वह अपनी उपलब्धियों का आनंद लेता है और जो प्राप्त है उसके लिए कृतज्ञ रहता है। ऐसा व्यक्ति जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को भी महसूस कर पाता है। परिवार के साथ बिताया गया समय, मित्रों का स्नेह, प्रकृति का सौंदर्य, स्वस्थ शरीर और शांत मन उसके लिए अमूल्य संपत्ति बन जाते हैं। यही वास्तविक सुख है, जिसे धन से नहीं खरीदा जा सकता।
साथियो संतोष का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति महत्वाकांक्षी न बने या प्रगति का प्रयास छोड़ दे। संतोष और आलस्य में अंतर है। व्यक्ति को अपने विकास, शिक्षा, व्यवसाय और समाजसेवा के लिए प्रयास अवश्य करना चाहिए, किंतु उन प्रयासों के पीछे अंधी लालसा नहीं, बल्कि सकारात्मक उद्देश्य होना चाहिए। जब प्रयास और संतोष का संतुलन बन जाता है, तब जीवन में सफलता भी आती है और शांति भी बनी रहती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इच्छाएँ हमारी आवश्यकताओं और क्षमताओं पर हावी हो जाती हैं।
विश्व के अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने भी यह सिद्ध किया है कि अत्यधिक भौतिकवाद व्यक्ति की खुशी को बढ़ाने के बजाय कम कर देता है। शोध बताते हैं कि एक सीमा तक आर्थिक सुरक्षा और सुविधाएँ जीवन को बेहतर बनाती हैं, लेकिन उसके बाद खुशी का स्तर मुख्यतः मानसिक संतोष, रिश्तों की गुणवत्ता और जीवन के उद्देश्य पर निर्भर करता है। अर्थात् खुशी का स्रोत बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। यदि मन संतुष्ट है तो साधारण परिस्थितियाँ भी सुखद लगती हैं, और यदि मन असंतुष्ट है तो सर्वोत्तम परिस्थितियाँ भी अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।
साथियों, प्रकृति हमें संतुलन का संदेश देती है। पेड़ अपनी आवश्यकता भर जल और पोषण लेकर फल-फूल देते हैं। नदियाँ बिना किसी लालच के निरंतर बहती रहती हैं। सूर्य प्रतिदिन बिना किसी अपेक्षा के प्रकाश देता है। प्रकृति का प्रत्येक तत्व हमें यह सिखाता है कि जीवन का सौंदर्य संतुलन और संयम में है। मनुष्य यदि इस संदेश को समझ ले तो उसका जीवन अधिक सरल, सुखी और सार्थक बन सकता है।परिवार और समाज में भी संतोष की भावना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों को बचपन से ही यह शिक्षा दी जानी चाहिए कि सफलता केवल धन अर्जित करने में नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र, संतुलित जीवन और संतोषपूर्ण मानसिकता में निहित है। यदि नई पीढ़ी को केवल उपभोग और प्रतिस्पर्धा का संदेश दिया जाएगा तो वह कभी संतुष्ट नहीं हो पाएगी। लेकिन यदि उसे कृतज्ञता, सादगी और संतोष के मूल्य सिखाए जाएँगे तो वह अधिक खुशहाल और जिम्मेदार नागरिक बनेगी।आज विश्व अनेक संकटों का सामना कर रहा है—पर्यावरण प्रदूषण, संसाधनों की कमी, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता। इन समस्याओं की जड़ में भी कहीं न कहीं मनुष्य की असीमित इच्छाएँ और अनियंत्रित उपभोग की प्रवृत्ति है। यदि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को समझकर सीमित उपभोग की आदत अपनाए, तो न केवल उसका व्यक्तिगत जीवन बेहतर होगा बल्कि समाज और पृथ्वी का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इस दृष्टि से संतोष केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि वैश्विक कल्याण का आधार भी है।जीवन में सच्ची खुशियों की पहचान करना अत्यंत आवश्यक है। अक्सर हम खुशी को भविष्य की किसी उपलब्धि से जोड़ देते हैं—जब अधिक धन मिलेगा, बड़ा घर बनेगा या कोई विशेष लक्ष्य पूरा होगा, तब हम खुश होंगे। लेकिन यह सोच हमें वर्तमान की खुशियों से दूर कर देती है। वास्तविक खुशी वर्तमान क्षण में जीने, जो प्राप्त है उसकी सराहना करने और अपने प्रियजनों के साथ समय बिताने में है। खुशी कोई मंजिल नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की इच्छाएँ जितनी सीमित होंगी और संतोष की भावना जितनी प्रबल होगी, जीवन उतना ही सुखमय बनेगा। अपने साधनों के अनुरूप जीवन जीना, अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूर रहना, उपलब्ध संसाधनों के प्रति कृतज्ञ होना और आत्मिक संतोष को महत्व देना ही वास्तविक समृद्धि है। सच्ची खुशियाँ महँगी वस्तुओं, भव्य भवनों या अपार धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि उस संतुष्ट मन में छिपी होती हैं जो यह कह सके कि “मेरे पास जो है, वह पर्याप्त है और मैं उसके लिए आभारी हूँ।”इसलिए आइए, हम अपनी इच्छाओं को विवेकपूर्ण सीमा में रखें, अपने साधनों के अनुरूप जीवन जीना सीखें, तुलना और दिखावे की संस्कृति से दूरी बनाएँ तथा संतोष को अपने जीवन का आधार बनाएँ। तभी हम उस सच्ची खुशी को पहचान पाएँगे जो सदैव हमारे आसपास और हमारे भीतर मौजूद है, बस उसे देखने और महसूस करने की आवश्यकता है। यही जीवन का वास्तविक सुख, वास्तविक धन और वास्तविक सफलता है।

kishanchand sanmukhadas Bhawnani 1
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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