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आरएसएस प्रमुख का अमेरिका दौरा बना वैचारिक रणभूमि :2018 के शिकागो विरोध से 2026 के न्यूयॉर्क विवाद तक -अमेरिका और भारत, आरएसएस,हिंदुत्व और धार्मिक स्वतंत्रता पर फिर आमने-सामने?

by Page 3 News International Desk
August 29, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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आरएसएस के सौ साल और अमेरिका में नया विवाद: भागवत के दौरे ने फिर खोल दिए हिंदुत्व और धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल?

न्यूयॉर्क में यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन में आरएसएस प्रमुख क़ा संबोधन- दुनियाँ की निगाह है कि उस संदेश में धार्मिक विविधता, अल्पसंख्यक अधिकार और लोकतांत्रिक सह -अस्तित्व के लिए कितनी स्पष्ट जगह दिखाई देती है? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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गोंदिया-वैश्विक स्तरपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक का 25 अगस्त से लगभग 10 सितंबर 2026 तक,17 दिवसीय तीन देशों अमेरिका,कनाडा और यूनाइटेड किंगडम की यात्रा का 25 अगस्त से शुरू अमेरिका दौरा केवल एक संगठन के शताब्दी वर्ष का वैश्विक संपर्क अभियान नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की विचारधारा,हिंदुत्व,धार्मिक स्वतंत्रता अल्पसंख्यक अधिकारों और भारतीय प्रवासी राजनीति को लेकर अमेरिका में चल रही पुरानी बहस का नया अध्याय बन गया है। 25 अगस्त 2026 से शुरू हुए आरएसएस प्रमुख के अमेरिका-कनाडा-ब्रिटेन दौरे का उद्देश्य आरएसएस के अनुसार संगठन के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वैश्विक हिंदू और भारतीय समुदायों से संवाद करना तथा आरएसएस और भारत के बारे में मौजूद गलत धारणाओं को दूर करना है। लेकिन न्यूयॉर्क पहुंचते ही यह दौरा समर्थन और विरोध, दोनों का केंद्र बन गया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र मीडिया में आई खबरों के हवाले से बताना चाहूंगा क़ि 29 अगस्त को प्रस्तावित यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन में आरएसएस प्रमुख के संबोधन को लेकर न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी,पूर्व एनवायसी कम्पट्रोलर और कांग्रेस उम्मीदवार ब्रैड लैंडर, कई इंटरफेथ एवं मानवाधिकार समूहों तथा यूएस सआईआरएफ ने गंभीर आपत्तियां उठाई हैं।दूसरी तरफ,अमेरिकी हिंदू संगठनों ने इसे हिंदू समुदाय की वैश्विक आवाज और वसुधैव कुटुम्बकम् के संदेश का मंच बताया हैआयोजकों का कहना है कि 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठन इस आयोजन से जुड़े हैं।इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आरएसएस को लेकर अमेरिका में आपत्ति केवल आरएसएस प्रमुख के व्यक्तिगत बयानों तक सीमित नहीं है।आलोचकों की मुख्य आपत्ति आरएसएस की हिंदुत्व संबंधी वैचारिक भूमिका को लेकर है। आरएसएस स्वयं हिंदुत्व को भारतीय सभ्यता,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय एकता की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करता है।आरएसएस की अपनी सामग्री में भागवत हिंदुत्व को सत्य, प्रेम और अपनत्व से जोड़ते हैं तथा संगठन सामाजिक समरसता, जातिगत भेदभाव के विरोध और सेवा को अपनी प्राथमिकताओं में बताता है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि व्यवहार में हिंदुत्व की राजनीतिक व्याख्या बहुसंख्यकवादी राजनीति को मजबूत कर सकती है और इससे मुस्लिम,ईसाई,सिख तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार प्रभावित होने का खतरा पैदा होता है।यही वह वैचारिक अंतर है जहां आरएसएस की आत्म-व्याख्या और उसके आलोचकों की व्याख्या एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है।यह लेख 28 अगस्त 2026 तक उपलब्ध जानकारी पर मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।
साथियों, न्यूयॉर्क में विरोध का सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरा मेयर ज़ोहरान ममदानी बने हैं।एक अमेरिकी समाचार एजेंसी के अनुसार ममदानी ने आरएसएस प्रमुखके कार्यक्रम का सार्वजनिक रूप से विरोध किया और आरएसएस की विचारधारा को भारत के बहुलतावादी तथा धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण के विपरीत बताया। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी निजी कार्यक्रम को केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर नगर प्रशासन द्वारा रोक देना अलग कानूनी प्रश्न है।रिपोर्टों के अनुसार ममदानी ने विरोध तो जताया है, लेकिन शहर के पास कार्यक्रम को रोकने की सीधी कानूनी शक्ति होने का प्रश्न अलग है।इसीलिए यह मामला केवल विचारधारा का नहीं, बल्कि अमेरिका मेंअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का भी बन गया है।ब्रैड लैंडर और कई इंटरफेथ समूहों का विरोध भी इसी वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है। नों रूम फॉर भागवत जैसे विरोध अभियान में मानवाधिकार,धार्मिकस्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को प्रमुख मुद्दा बनाया गया है।विरोध करने वालों में हिंदूस फॉर ह्यूमन राइट्स,इंडियन अमेरिकन मुस्लिम कौंसिल, इंटरफेथ सेंटर ऑफ़ न्यूयॉर्क और अन्य समूहों के नाम सामने आए हैं। उनका तर्क है कि किसी व्यक्ति के हिंदू होने या हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के कारण विरोध नहीं किया जा रहा,बल्कि आरएसएस की राजनीतिक-सामाजिक भूमिका और उससे जुड़े कथित अल्पसंख्यक-विरोधी प्रभावों के कारण आपत्ति है। दूसरी तरफ हिंदू संगठनों का कहना है कि आरएसएस को हिंदू समाज के सांस्कृतिक और सेवा संगठन के रूप में देखने के बजाय केवल राजनीतिक विवादों के चश्मे से देखना सटीकता से अनुचित है।
साथियों इसी विवाद को सबसे गंभीर रूप तब मिला जब यूनाइटेड स्टेट्स कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजस फ्रीडम यानी यूएससीआईआरएफ ने आरएसएस के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों की मांग कर दी। यह बताना जरूरी है क़ि इसकी वार्षिक रिपोर्ट मुख्यतः देशों को विशेष चिंता वाले देश (सीपीसी) और विशेष निगरानी सूची (एसडब्ल्यूएल) जैसी श्रेणियों में रखने की सिफारिश करती है।हालांकि 2025 की उसकी रिपोर्टों में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई है और भारत को विशेष चिंता वाले देश की श्रेणी में रखने की सिफारिश की गई है/या भारत पर अलग गंभीर देश-अध्याय जारी किया गया है। इन निष्कर्षों को भारत सरकार ने पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज किया है।26 अगस्त के अपने आधिकारिक बयान में यूएस सीआईआरएफ ने कहा कि उसे भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकरगंभीर चिंता है।आयोग के चेयरमैन आसिफ महमूद ने अमेरिकी सरकार से आरएसएस के उन सदस्यों और भारतीय अधिकारियों पर लक्षित प्रतिबंधों पर विचार करने की अपील की जिन्हें वह धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन से जोड़ता है। आयोग ने विशेष रूप से मोहन भागवत का जारी वीजा रद्द करने और भविष्य में उनके अमेरिका प्रवेश को रोकने पर विचार करने की मांग की।यह ध्यान रखना जरूरी है कि यूएससीआईआरएफ एक अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सलाहकारी आयोग है; उसकी सिफारिश अपने आप में अमेरिकी सरकार का वीजा रद्द करने का आदेश नहीं है। अमेरिकी एजेंसी ने भी स्पष्ट किया है कि आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं और अमेरिकी सरकार ने इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई घोषित नहीं की है।
साथियों, भारत के विदेश मंत्रालय ने यूएस सीआईआरएफ को पहले भी बियज्ड यानी पक्षपाती संस्था बताते हुए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 21 अगस्त 2026 को कहा कि यह संस्था लंबे समय से भारत के बारे में डिस्पैराजिंग एंड इन्फेलाममेटरी टिप्पणियां करती रही है और उसके अपने एजेंडे हैं,इसलिए भारत को ऐसी संस्था से दूरी रखनी चाहिए। इस प्रकार एक ओर अमेरिकी आयोग भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर भारत सरकार आयोग की पद्धति और निष्पक्षता पर ही सवाल खड़ा कर रही है।दिलचस्प बात यह है कि 2026 का विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ।इसका एक स्पष्ट इतिहास 2018 के शिकागो तक जाता है।सितंबर 2018 में मोहन भागवत वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस में शामिल होने के लिए शिकागो पहुंचे थे। उस समय लगभग 2,500 प्रतिनिधि 60 देशों से सम्मेलन में आए थे। आयोजन का उद्देश्य वैश्विक हिंदू समुदाय को एक मंच पर लाना और हिंदू समाज से जुड़े सामाजिक़ आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक मुद्दों पर चर्चा करना था। लेकिन कार्यक्रम के बाहर और भीतर विरोध भी हुआ।
साथियों, 2018 में छिकागो साउथ एशिन्स फॉर जस्टिस से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस में घुसकर स्टॉप हिन्दू फसकीज़्म और आरएसएस टर्न अराउंड , वुई डू नॉट वांट यू इन टाउन जैसे नारे लगाए। दो प्रदर्शनकारियों को डिसऑर्डरली कंडक्ट और ट्रेसपासिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे भारतीय सरकार की अल्पसंख्यकों से जुड़ी नीतियों का विरोध कर रहे हैं और हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।उसी समय सिख कोऑर्डिनेशन कामिटी ईस्ट कोस्ट ने भी भागवत और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ विरोध की तैयारी की थी और उन पर हिंदुत्व को बढ़ावा देने तथा सिख पहचान को प्रभावित करने का आरोप लगाया था।
साथियों, इसलिए 2018 और 2026 के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि दोनों बार विरोध का केंद्र हिंदू धर्म नहीं, बल्कि आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीतिक- सामाजिक व्याख्या बनी। 2018 में प्रदर्शनकारियों ने आरएसएस को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ा और अल्पसंख्यक अधिकारों की चिंता जताई; 2026 में वही बहस न्यूयॉर्क की राजनीति,इंटरफेथ संगठनों और यूएससीआईआरएफ के स्तर तक पहुंच गई है।अंतर यह है कि 2018 में विरोध मुख्यतः सम्मेलन और प्रदर्शन के स्तर पर था, जबकि 2026 में विवाद अमेरिकी राजनीतिक प्रतिष्ठान और धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सरकारी सलाहकारी तंत्र तक पहुंच गया है।दूसरी ओर, आरएसएस और उसके समर्थकों की दृष्टिसे तस्वीर बिल्कुल अलगहै।आरएसएस स्वयं को सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन मानता है और भागवत की वर्तमान वैश्विक यात्रा को संगठन के शताब्दी वर्ष का आउटरेच अभियान बताता है। न्यूयॉर्क का यूनिवर्सल ऑननेस कार्यक्रम भी एक स्रोत, एक मानव परिवार और सभी के प्रति सम्मान के संदेश पर आधारित बताया गया है। आयोजकों के अनुसार यह कार्यक्रम विभिन्न परंपराओं के बीच एकता, सेवा और साझा मूल्यों पर केंद्रित है। अमेरिकी हिंदू एडवोकेसी ग्रुपहिन्दुम्पैक्ट ने भी यूएस सीआईआरएफ की कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे हिंदू समुदाय के खिलाफ पक्षपाती दृष्टिकोण बताया है।
साथियों, यही कारण है कि 2026 की कहानी को केवल भागवत का विरोध कहना अधूरा होगा। असल कहानी तीन स्तरों पर चल रही है,पहला,आरएसएस बनाम उसके आलोचक; दूसरा, हिंदुत्व की सांस्कृतिक बनाम राजनीतिक व्याख्या;और तीसरा,भारत-अमेरिका संबंधों के बीच धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न। एक तरफ भारत सरकार और आरएसएस समर्थक कहते हैं कि भारत की सभ्यता बहुलतावादी है और आरएसएस समाज सेवा तथा राष्ट्रीय एकता के लिए काम करता है; दूसरी तरफ यूएस सीआईआरएफ और मानवाधिकार समूह कहते हैं कि वास्तविक कसौटी संगठन के घोषित उद्देश्यों से अधिक यह होनी चाहिए कि अल्पसंख्यकों के साथ जमीन पर व्यवहार कैसा है।इस पूरे विवाद में अमेरिका की भूमिका भी सावधानी से समझनी होगी।अमेरिका में किसी राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से असहमति व्यक्त करना अपने आप में किसी विदेशी नेता के प्रवेश पर प्रतिबंध का आधार नहीं बनता। वीजा और प्रवेश का अंतिम निर्णय अमेरिकी सरकार की संबंधित संस्थाओं के सटीक अधिकार क्षेत्र में आता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 2018 का शिकागो और 2026 का न्यूयॉर्क एक ही लंबे वैचारिक विवाद के दो पड़ाव दिखाई देते हैं।2018 में सवाल था कि अमेरिका में आरएसएस और हिंदुत्व की छवि क्या है; 2026 में सवाल इससे आगे बढ़कर यह हो गया है कि क्या किसी भारतीय सामाजिक – सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख को अमेरिकी राजनीतिक और धार्मिक स्वतंत्रता के विमर्श में जवाबदेह ठहराया जा सकता है। समर्थकों के लिए भागवत विश्व बंधुत्व और हिंदू सभ्यता का संदेश लेकर अमेरिका पहुंचे हैं,जबकि विरोधियों के लिए उनका आगमन भारत में बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक अधिकारों की चिंता का प्रतीक है। यही विरोधाभास इस दौरे को ऐतिहासिक बनाता है।इनका 2026 अमेरिका दौरा इसलिए केवल एक भाषण या एक कार्यक्रम नहीं है;यह भारत की वैचारिक पहचान और अमेरिका में भारतीय प्रवासी समुदाय की बदलती राजनीति का परीक्षण भी है।यदि भागवत न्यूयॉर्क में यूनिवर्सल ऑननेस का संदेश देते हैं,तो दुनियाँ की निगाह इसपर होगी कि उस संदेश में धार्मिक विविधता,अल्पसंख्यक अधिकार और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व के लिए कितनी स्पष्ट जगह दिखाई देती है।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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