मोबाइल में नेटवर्क है,फिर भी दिलों में दूरी क्यों है,
एक ही छत के नीचे रहकर भी अपनों से दूरी क्यों है।
कभी जिनकी हँसी से घर का आँगन महकता था,
आज उन्हीं के बीच ख़ामोशी की मज़बूरी क्यों है।
परिवार के दिल आज इतने सिकुड़ते क्यों जा रहे हैं,
अपने ही अपनों से नज़रें चुराते क्यों जा रहे हैं।
जो रिश्ते कभी सुख-दुःख में ढाल बनकर खड़े थे,
वो रिश्ते आज औपचारिकता में सिमटते क्यों जा रहे हैं।
मोबाइल की दुनियाँ में हर पल संवाद हो रहा है,
पर घर के भीतर अपनापन कहीं खो रहा है।
हज़ारों मील दूर बैठे लोगों से बातें होती हैं,
पास बैठे अपनों से मिलने का समय क्यों नहीं हो रहा है।
नाराज़गी की दीवारें संवाद से गिर सकती हैं,
सूनी आँखें प्रेम की भाषा से फिर खिल सकती हैं।
थोड़ा धैर्य,थोड़ा सम्मान,थोड़ा अपनापन बाँटें,
टूटते रिश्तों की डोर फिर विश्वास से जुड़ सकती है।
आओ,घर को फिर प्रेम का संसार बनाएँ,
रिश्तों में खोए हुए विश्वास को लौटाएँ।
किशन मोबाइल के नेटवर्क से बढ़कर दिलों को जोड़ें,
अपनों के बीच अपनापन ही जीवन का आधार बनाएँ।

