• About Us
  • Contact
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
Monday, May 25, 2026
  • Login
  • Register
Page3News Worldwide
  • Home
  • Page 3 Family
    • E-Paper
    • E-Magazine
    • Management Team
  • Subscriptions
  • Countries
    • USA
    • Canada
    • India
    • Balochistan
    • Thailand
    • UK
    • Australia
  • Language Wise News
    • Thai News
    • Punjabi News
    • Hindi News
  • Other News
    • World News
    • Latest Movie Reviews
    • Culture
    • Finance
    • Hollywood
    • Business
    • Entertainment
    • Sports
    • Lifestyle
    • Fashion
    • food
    • Health
    • Travel
    • Politics
    • Science
    • Tech
  • Multilingual Editorial
    • English Editorials
    • Thai Editorials
    • Hindi Editorials
    • Punjabi Editorials
    • Page3News Special
No Result
View All Result
  • Home
  • Page 3 Family
    • E-Paper
    • E-Magazine
    • Management Team
  • Subscriptions
  • Countries
    • USA
    • Canada
    • India
    • Balochistan
    • Thailand
    • UK
    • Australia
  • Language Wise News
    • Thai News
    • Punjabi News
    • Hindi News
  • Other News
    • World News
    • Latest Movie Reviews
    • Culture
    • Finance
    • Hollywood
    • Business
    • Entertainment
    • Sports
    • Lifestyle
    • Fashion
    • food
    • Health
    • Travel
    • Politics
    • Science
    • Tech
  • Multilingual Editorial
    • English Editorials
    • Thai Editorials
    • Hindi Editorials
    • Punjabi Editorials
    • Page3News Special
No Result
View All Result
Page3News Worldwide
No Result
View All Result
Home Hindi Editorials

लोकसभा:विधानसभा सीटों में आरक्षण बनाम राजनीतिक संगठनों में आरक्षण-महिला आरक्षण का प्रश्न अब सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि सत्ता की संरचना संगठनात्मक ढांचे का प्रश्न बन चुका है- भारतीय लोकतंत्र के नए चरण की निर्णायक बहस-समग्र वैश्विक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
April 20, 2026
in Hindi Editorials
0
0
SHARES
8
VIEWS
Share on FacebookShare on TwitterShare on WhatsappShare on TelegramShare on LineShare on Email

महिला आरक्षण की बहस अब केवल पंचायत, लोकसभा विधानसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक दलों की संरचना,सत्ता के वितरण और लोकतंत्र की गुणवत्ता तक पहुँच चुकी है

RelatedPosts

शिक्षकों को चुनावी प्रक्रिया, जनगणना,आर्थिक सर्वेक्षण, पल्स पोलियो अभियान, स्थानीय निकायों के डाटा संकलन, आवारा कुत्तों की गणना जैसे कार्यों में लगाना- बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप- 31 जुलाई 2026 तक रोक-क्या शिक्षक शिक्षा दें या शासन के गैर- शैक्षणिक कार्य करें? -समग्र व्यापक विश्लेषण

इबोला का नया वैश्विक खतरा- कोरोना के बाद दुनियाँ फिर एक भयावह स्वास्थ्य संकट की दहलीज पर?- डब्ल्यूएचओ ने पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न घोषित किया -भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन 28 से 31 मई,2026 स्थगित-समग्र व्यापक विश्लेषण

सुंदरता बनाम सुरक्षा-औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन (सीडीएससीओ) की सख़्ती- कॉस्मेटिक इंजेक्शन के नाम पर बढ़ते स्वास्थ्य खतरे पर बड़ा प्रहार- समग्र व्यापक विश्लेषण

महिला आरक्षण को केवल महिलाओं का मुद्दा न मानकर लोकतंत्र का मुद्दा माना जाए- जब आधी आबादी को समान अवसर नहीं मिलता,तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अप्रैल 2026 के संसदीय घटनाक्रम ने एक ऐसे विमर्श को जन्म दिया है,जो केवल विधायिका तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना सत्ता के वितरण और लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा तक पहुँच गया है।16 से 17 अप्रैल 2026 के बीच लोकसभा में जो कुछ हुआ,उसने यह स्पष्ट कर दिया कि महिला आरक्षण का प्रश्न अब केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि सत्ता की संरचना का प्रश्न बन चुका है।इसी संदर्भ में एक शिवसेना नेता द्वारा द्वारा 19 अप्रैल को उठाया गया सवाल,कि जब सभी दल 33.33प्रतिशत महिला आरक्षण के पक्ष में थे, तो इसे अलग से सर्वसम्मति से पारित क्यों नहीं किया गया,अब व्यापकजनचर्चा का विषय बन चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह बहस केवल प्रक्रियात्मक या विधायी नहीं है,बल्कि यहलोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को चुनौती देती है,जिसमें प्रतिनिधित्व और सशक्तिकरण के बीच अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। संसद में महिला आरक्षण को परिसीमन जैसे जटिल मुद्दों के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना, कई विश्लेषकों के अनुसार, राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है,लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है,क्या महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक शक्ति देने की इच्छा उतनी ही प्रबल है,जितनी कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देने की?वास्तव में, भारत में महिला आरक्षण की बहस नई नहीं है। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम जरूर उठाया था,लेकिन उसका क्रियान्वयन परिसीमन और जनगणना जैसी शर्तों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि अप्रैल 2026 में जब यह मुद्दा पुनः संसद में आया और अन्य विधेयकों के साथ समाकलित होकर 54 वोटो से गिर गया,तो इससे जनता के मन में संदेह उत्पन्न हुआ।क्या यह वास्तव में महिला सशक्तिकरण का प्रयास है,या फिर राजनीतिक समीकरणों का एक जटिल खेल?इस संदर्भ में संसद में विपक्ष के नेता सहित कई विपक्षी नेताओं ने यह तर्क दिया कि महिला आरक्षण को अलग से पारित किया जा सकता था। वहीं सत्ताधारी पक्ष ने इसे व्यापक सुधारों के पैकेज के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक नए विमर्श को जन्म दिया है,अगर महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण मिल सकता है, तो राजनीतिक दलों के भीतर क्यों नहीं?
साथियों बात अगर हम भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े होने को समझने की करें तो यहाँ महिला प्रतिनिधित्व का प्रश्न मात्र सीटों के आरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि सत्ता की वास्तविक संरचना, निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया और राजनीतिक संस्कृति के पुनर्गठन से जुड़ चुका है। संसद में 54 मतों से गिरे नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने लोकसभा और विधानसभा सीटों में 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्गरोक दिय,किंतु इसके साथ ही यह बहस तेज हो गई कि क्या केवल विधायी सीटों का आरक्षण महिलाओं को वास्तविक सशक्तिकरण दे सकता है, या इसके लिए राजनीतिक दलों और संगठनों के भीतर भी समान अवसर और भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।यही कारण है कि आज यह मुद्दा सीटों के बंटवारे से आगे बढ़कर सत्ता के वितरण औरराजनीतिक शक्ति के पुनर्संतुलन का प्रश्न बन गया है।लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण का मूल उद्देश्य महिलाओं कीसंख्यात्मक उपस्थिति बढ़ाना है,जिससे वे कानून निर्माण में अपनी आवाज़ दर्ज कर सकें।यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत से मेल खाता है,जहाँ समाज के सभी वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए। परंतु अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि केवल सीटों मेंआरक्षण पर्याप्त नहीं होता।कई देशों में यह देखा गया है कि महिलाएँ निर्वाचित तो हो जाती हैं,किंतु वास्तविक शक्ति पार्टी नेतृत्व, नीति-निर्धारण समितियों और संगठनात्मक ढांचे में केंद्रित रहती है, जहाँ उनकी भागीदारी सीमित होती है। इस संदर्भ में रवांडा का उदाहरण महत्वपूर्ण है, जहाँ संसद में महिलाओं की भागीदारी 60 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन यह सफलता केवल संवैधानिक आरक्षण के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचनाओं में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से संभव हुई।
साथियों बात अगर हम भारत में भी यही चुनौती उभर रही है इसको समझने की करें तो यदि राजनीतिक दलों के भीतर टिकट वितरण,संगठनात्मक पदों,और निर्णय लेने वाली समितियों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती,तो आरक्षित सीटों पर चुनी गई महिलाएँ अक्सर प्रॉक्सी प्रतिनिधि बनकर रह जाती हैं,जहाँ वास्तविक नियंत्रण उनके परिवार या पुरुष सहयोगियों के हाथ में होता है।यह स्थिति लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है, क्योंकि इससे मतदाताओं की वास्तविक इच्छा और प्रतिनिधित्व की अवधारणा कमजोर होती है। इसीलिए अब यह मांग उठ रही है कि राजनीतिक दलों को भी आंतरिक रूप से महिला आरक्षण लागू करना चाहिए, ताकि नेतृत्व के हर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे का समाधान अलग-अलग देशों ने विभिन्न तरीकों से किया है। नॉर्वे और स्वीडन जैसे नॉर्डिक देशों में कानूनीआरक्षण की बजाय पार्टी कोटा सिस्टम अपनाया गया है, जहाँ राजनीतिक दल स्वयं अपने उम्मीदवारों में 40-50 प्रतिशत महिलाओं को शामिल करते हैं। इससे न केवल महिलाओं की संख्या बढ़ी, बल्कि उनकी गुणवत्ता, नेतृत्व क्षमता और स्वतंत्रता भी सुनिश्चित हुई। वहीं फ्रांस ने “पैरिटी लॉ” लागू कर राजनीतिक दलों को पुरुष और महिला उम्मीदवारों की समान संख्या देने के लिए बाध्य किया, अन्यथा आर्थिक दंड का प्रावधान रखा गया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और संस्थागत सुधार भी आवश्यक हैं।
साथियों बात अगर हम भारत में राजनीतिक दल लोकतंत्र की रीढ़ माने जाते हैं इसको गहराई से समझने की करें तो इन दलों की आंतरिक संरचना अक्सर संभवतः लोकतांत्रिक नहीं होती,अधिकांश दलों में निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा नेताओं के हाथों में केंद्रित होती है, और महिलाओं की भागीदारी सीमित रहती है। ऐसे में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि यदि विधायिका में 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जा रहा है,तो दलों की कार्यकारिणी, प्रदेश इकाइयों, जिला समितियों और टिकट वितरण में भी समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए।यह बहस इंटरनल पार्टी डेमोक्रेसी यानी आंतरिक लोकतंत्र की अवधारणा को केंद्र में लाती है। कई महिला संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक राजनीतिक दल स्वयं लैंगिक रूप से समावेशी नहीं बनेंगे, तब तक विधायिका में आरक्षण का प्रभाव सीमित रहेगा। यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रश्न है।इस संदर्भ में पंचायत स्तर के अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।महाराष्ट्र, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में 50प्रतिशत तक महिला आरक्षण लागू होने के बाद यह देखा गया है कि महिलाएं न केवल चुनाव जीत रही हैं, बल्कि प्रभावी नेतृत्व भी कर रही हैं। यह तर्क अब राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू किया जा रहा है, अगर जमीनी स्तर पर महिलाएं सफल नेतृत्व कर सकती हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में क्यों नहीं? इसी के साथ एक और दिलचस्प और विवादास्पद विचार सामने आया है उसको समझने की करें तो,प्रधानमंत्री पद में भी रोटेशन के आधार पर महिलाओं को आरक्षण दिया जाए। हालांकि यह प्रस्ताव संवैधानिक दृष्टि से जटिल है, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि महिला सशक्तिकरण की बहस अब केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है,बल्कि सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुँच चुकी है।
साथियों बात अगर हम इस पूरे घटनाक्रम काराजनीतिक प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है, इसको समझने की करें तो 23 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले चुनाव इस बहस का पहला बड़ा परीक्षण माने जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच मुकाबला है,जबकि संसद में दोनों ने महिला आरक्षण से जुड़े संयुक्त विधेयक का विरोध किया था। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या महिला मतदाता इस मुद्दे को चुनाव मेंप्राथमिकता देती हैं।इसी संदर्भ में दिनांक 19 अप्रैल 2026 की प्रधानमंत्री की बंगाल रैली भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है,जिसमें उन्होंने महिला आरक्षण को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला किया। दूसरी ओर विपक्ष का तर्क है कि यदि सत्ताधारी दल वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्ध है,तो उसे अपने संगठनात्मक ढांचे में 33प्रतिशत आरक्षण लागू करना चाहिए।यह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप केवल चुनावी रणनीति नहीं है, बल्कि यह उस गहरे प्रश्न को उजागर करता है,क्या भारत का लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित है,या वहसामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को भी आत्मसात कर सकता है?
साथियों अगर हम इस संपूर्ण मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो कई देशों ने राजनीतिक दलों के भीतर महिला आरक्षण को अनिवार्य किया है। उदाहरण के लिए, कुछ यूरोपीय देशों में पार्टियों को टिकट वितरण में न्यूनतम महिला भागीदारी सुनिश्चित करनी होती है। लैटिन अमेरिका में भी जेंडर कोटा प्रणाली ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में यह बहस अभी प्रारंभिक चरण में है, लेकिन इसकी दिशा स्पष्ट रूप से उसी ओर बढ़ रही है।इस पूरे विमर्श का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महिला आरक्षण को केवल महिलाओं का मुद्दा न मानकर लोकतंत्र का मुद्दा माना जाए। जब आधी आबादी को समान अवसर नहीं मिलता, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि महिला आरक्षण को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के साथ जोड़ा जाए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अप्रैल 2026 की संसदीय घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक नए लोकतांत्रिक मोड़ पर खड़ा है। महिला आरक्षण की बहस अब केवल विधेयकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक दलों की संरचना, सत्ता के वितरण और लोकतंत्र की गुणवत्ता तक पहुँच चुकी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राजनीतिक दल इस चुनौती को स्वीकार करते हैं और स्वयं को अधिक समावेशी बनाते हैं, या फिर यह बहस केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह जाती है।इस प्रश्न का उत्तर ही भारत के लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों को निर्धारित करेगा।

kishan2
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

Get real time update about this post categories directly on your device, subscribe now.

Unsubscribe
Page 3 News International Desk

Page 3 News International Desk

The Page 3 News is a Multilingual Worldwide daily newspaper founded in 2021. It is published in Bangkok, Thailand by the Page 3 News Thai Limited Partnership. Page 3 News is available to the world in all the three formats i.e. e-Paper, digital and print. The Page 3 News is having offices in many countries like Thailand, India, Canada, USA, etc. and is currently published in English, Thai, Hindi and Punjabi languages.

Related Posts

शिक्षकों को चुनावी प्रक्रिया, जनगणना,आर्थिक सर्वेक्षण, पल्स पोलियो अभियान, स्थानीय निकायों के डाटा संकलन, आवारा कुत्तों की गणना जैसे कार्यों में लगाना- बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप- 31 जुलाई 2026 तक रोक-क्या शिक्षक शिक्षा दें या शासन के गैर- शैक्षणिक कार्य करें? -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 24, 2026
0
16

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय शिक्षा की गरिमा, संवैधानिक सीमाओं और विधि के शासन, तीनों की एक साथ रक्षा करने...

इबोला का नया वैश्विक खतरा- कोरोना के बाद दुनियाँ फिर एक भयावह स्वास्थ्य संकट की दहलीज पर?- डब्ल्यूएचओ ने पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न घोषित किया -भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन 28 से 31 मई,2026 स्थगित-समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 23, 2026
0
10

इबोला- दुनियाँ में भय का पर्याय-संक्रमण की बढ़ती रफ्तार, बड़े शहरों तक पहुंचना, अंतरराष्ट्रीय स्तरपर गंभीर चिंता का विषय व...

सुंदरता बनाम सुरक्षा-औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन (सीडीएससीओ) की सख़्ती- कॉस्मेटिक इंजेक्शन के नाम पर बढ़ते स्वास्थ्य खतरे पर बड़ा प्रहार- समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 22, 2026
0
8

सुंदरता की अंधी दौड़ पर सरकार की रोक- औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 और सीडीएससीओ की नई चेतावनी 21...

जातिगत जनगणना पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक मुहर चुनौती याचिका 20 मई 2026 को खारिज- संवैधानिक वैधता, सामाजिक न्याय और भारत की नई नीति- व्यवस्था की दिशा क़ा व्यापक समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 21, 2026
0
10

भारत की जनगणना 2027 डिजिटल इंडिया और डेटा- आधारित गवर्नेंस के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक माना जा...

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख-19 मई 2026 को सभी याचिकाएं खारिज- संविधान के अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या- जनसुरक्षा बनाम पशु अधिकार की बहस में नया मोड़

by Page 3 News International Desk
May 20, 2026
0
14

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 मई 2026 को दिया गया निर्णय आने वाले समय में नगर निकायों, राज्य सरकारों, पशु कल्याण...

अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते। छेत्तुः पार्श्वगताच्छायां नोपसंहरते द्रुमः॥-शत्रु भी यदि अपने घर पर आ जाए तो उसका भी उचित आतिथ्य सत्कार करना चाहिए

by Page 3 News International Desk
May 20, 2026
0
8

आओ रिश्ते,आतिथ्य सत्कार मज़बूती से निभाएं कुछ कह गए कुछ सह गए, कुछ कहते कहते रह गए - मैं सही...

Facebook Twitter Youtube Instagram Tumblr Pinterest

Page 3 News Multilingual Worldwide

The Page 3 News is a Multilingual Worldwide daily newspaper founded in 2021. It is published in Bangkok, Thailand by the Page 3 News Thai Limited Partnership. Page 3 News is available to the world in all the three formats i.e. e-Paper, digital and print.

The Page 3 News is having offices in many countries like Thailand, India, Canada, USA, etc. and is currently published in English, Thai, Hindi and Punjabi languages.

Category

Calanderwise News

May 2026
MTWTFSS
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031
« Apr    

© 2024 Page 3 News - First Multilingual Worldwide Newspaper based in Thailand.

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password? Sign Up

Create New Account!

Fill the forms below to register

*By registering into our website, you agree to the Terms & Conditions and Privacy Policy.
All fields are required. Log In

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • Home
  • E-Magazine
  • Management Team
  • Subscriptions
  • E-Paper
  • World News
  • Balochistan
  • USA
  • India
  • Thailand
  • Canada
  • UK
  • Australia
  • About Us
  • Contact
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer

© 2024 Page 3 News - First Multilingual Worldwide Newspaper based in Thailand.

This website uses cookies. By continuing to use this website you are giving consent to cookies being used. Visit our Privacy and Cookie Policy.