कभी-कभी ठोकरें भी,जीवन में वरदान होती हैं,
बंद आँखों से देखी राहों की,पहचान होती हैं।
जो रास्तों में छिपी रुकावटों का,एहसास करा जाती हैं,
ठोकरें हमें मंज़िल के लिए,पहले से तैयार कर जाती हैं।
हर ठोकर के पीछे छिपा,कोई पैग़ाम होता है,
गिरकर सँभलने वालों के नाम,नया मुक़ाम होता है।
मुश्किलें ही इंसान को,मज़बूत बनाती हैं,
तूफ़ानों में ही हौसलों की,असली पहचान होती है।
गिरते हैं जब अपने,तो अपनों का पता चलता है,
कौन कितना अपना है,हर चेहरे से पर्दा हटता है।
जो हाथ थामकर उठाएँ,वही सच्चे हमदर्द होते हैं,
मुश्किल घड़ी में निभाने वाले,रिश्तों से भी बढ़कर होते हैं।
कुछ हाथ गिरते ही,सहारा देने आ जाते हैं,
कुछ अपने बनकर भी,दूर खड़े नज़र आते हैं।
वक़्त की ठोकरें रिश्तों की,हक़ीक़त बता जाती हैं,
कौन अपना,कौन पराया,सबकी तस्वीर दिखा जाती हैं।
इसलिए ठोकरों से कभी,अपने क़दम न रोकना,
टूटे हुए हौसलों को,निराशा के हवाले न छोड़ना।
किशन राह की रुकावटों से सीखो,अपनों को पहचानो,
गिरकर उठो,सँभलकर चलो,फिर इतिहास नया बनाओ।

