परिवार की जिम्मेदारी से बड़ा कहाँ आध्यात्म है,
कर्तव्य निभाना ही जीवन का सच्चा पुण्य-पथ है।
छोटों-बड़ों की भावनाओं का सम्मान करते चलो,
मनमुटाव दूर रख,हँसते-हँसाते आगे बढ़ते चलो।
बरसों से मंदिर आए,फिर भी मन क्यों प्यासा है,
भक्ति अधूरी क्या,जो मन भीतर से उदासा है?
भगवान ने कहा,दिल को भी संग लेकर आया करो,
केवल शीश नहीं,अपना मन भी प्रभु को चढ़ाया करो।
माँ-बाप की नसीहत अक्सर कड़वी लगती है,
पर उनकी वसीयत हर दिल को मीठी लगती है।
जिनके साए में जीवन ने चलना सीखा है,
उनके सम्मान में ही घर का सुख लिखा है।
रिश्तों में जब लालच की बेल बढ़ने लगती है,
अपनों की ममता भी फिर बिखरने लगती है।
विनाश काले विपरीत बुद्धि,सत्य यही बतलाती है,
स्वार्थ की आँधी सबसे पहले अपनी नींव हिलाती है।
ज़िद को थोड़ा छोड़ो,थोड़ा समझौता अपनाओ,
प्यार की बारिश से सूखे रिश्तों को नहलाओ।
किशन धर्म-संस्कार और स्नेह से परिवार सजाते रहो,
अपनों को बाँधकर नहीं,दिल से निभाते रहो।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
