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52 वां जी-7 शिखर सम्मेलन फ्रांस 15-17 जून 2026- मोदी -ट्रम्प संभावित मुलाकात से क्या बदल सकता है?-व्यापार, एच -1बी वीजा, टैरिफ और रणनीतिक साझेदारी के नए समीकरण?

by Page 3 News International Desk
June 11, 2026
in Hindi Editorials
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जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 केवल वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का मंच नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के लिए अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का भी अवसर

भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, नवाचार और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, इसलिए एच -1बी वीजा व्यवस्था को अत्यधिक प्रतिबंधात्मक बनाना दोनों देशों के हित में नहीं होगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में 52 वां शिखर सम्मेलन 15-17 जून को होने वाले जी-7 के दौरान भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति के बीच संभावित द्विपक्षीय बैठक की संभावना प्रबल मानी जा रही है। हालांकि दोनों देशों की ओर से अभी तक औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार व्यापार, वीजा नीति, ऊर्जा सहयोग और सामरिक साझेदारी जैसे विषय इस मुलाकात के केंद्र में रह सकते हैं।भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में निरंतर मजबूत हुए हैं, किंतु 2026 में यह रिश्ता एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। एक ओर दोनों देश रक्षा, प्रौद्योगिकी इंडो -पैसिफिक सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला सहयोग को आगे बढ़ा रहे हैं,वहीं दूसरी ओर टैरिफ, व्यापार असंतुलन और आव्रजन नीतियों को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं। ऐसे समय में यदि मोदी और ट्रम्प की मुलाकात होती है तो यह केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बैठक नहीं होगी, बल्कि आने वाले वर्षों के भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा निर्धारित करने वाली वार्ता भी साबित हो सकती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत -अमेरिका व्यापार समझौता है। दोनों देशों के बीच पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से व्यापक व्यापार वार्ताएं चल रही हैं और भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने संकेत दिया है कि जुलाई 2026 तक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप दिया जा सकता है। भारत का लक्ष्य अमेरिकी बाजार में अपने उत्पादों के लिए अधिक अनुकूल और प्रतिस्पर्धी शुल्क दरें प्राप्त करना है, जबकि अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार में अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं के लिए सटीकता से अधिक पहुंच उपलब्ध हो।
साथियों, भारत अमेरिका व्यापार के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी टैरिफ नीति है। हाल ही में अमेरिका ने भारत सहित कई देशों के आयात पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि यह कदम श्रम मानकों और व्यापारिक असंतुलन से जुड़े मुद्दों के कारण आवश्यक है,जबकि भारत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वार्ता के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए। यदि जी-7 सम्मेलन के दौरान मोदी और ट्रम्प के बीच सकारात्मक चर्चा होती है तो इन प्रस्तावित टैरिफों में राहत मिलने की संभावना बन सकती है।भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। वस्त्र, औषधि, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं। अतिरिक्त शुल्क लागू होने की स्थिति में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। इसलिए नई दिल्ली की प्राथमिकता यह होगी कि किसी भी संभावित व्यापार समझौते में भारतीय उद्योगों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
साथियों, दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा एच -1बी वीजा है, अमेरिका में काम करने वाले लाखों भारतीय पेशेवरों और आईटी उद्योग के लिए यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा वीजा नियमों को सख्त करने के संकेतों ने भारतीय आईटी कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चिंता पैदा की है। रिपोर्टों के अनुसार प्रधानमंत्री इस विषय को सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति के समक्ष उठा सकते हैं। भारतीय पक्ष का तर्क है कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, नवाचार और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं,इसलिए एच -1बी वीजा व्यवस्था को अत्यधिक प्रतिबंधात्मक बनाना दोनों देशों के हित में नहीं होगा। एच -1बी केवल रोजगार का विषय नहीं है बल्कि यह भारत- अमेरिका तकनीकी संबंधों की आधारशिला भी है। अमेरिका की प्रमुख तकनीकी कंपनियों में हजारों भारतीय इंजीनियर और विशेषज्ञ कार्यरत हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और सेमी कंडक्टर जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में वीजा व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
साथियों, ऊर्जा सहयोग भी संभावित वार्ता का प्रमुख विषय माना जा रहा है। अमेरिका पहले ही भारत के लिए तेल और गैस का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका हैरिपोर्टों के अनुसार दोनों नेता ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से जुड़े ऊर्जा सहयोग के अवसरों पर भी चर्चा कर सकते हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार भू- राजनीतिक तनावों से प्रभावित हैं, भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति पर काम कर रहा है।रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग भी इस मुलाकात का एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है। चीन के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति और उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रतिस्पर्धा ने भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के और निकट लाया है। ट्रम्प प्रशासन भी चीन पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने की नीति पर जोर देता रहा है। इस संदर्भ में भारत एक स्वाभाविक साझेदार के रूप में सटीकता से उभरता है।
साथियों, हालांकि संबंधों में कुछ राजनीतिक संवेदन शीलताएं भी मौजूद हैं। ट्रम्प द्वारा अतीत में भारत- पाकिस्तान तनाव को लेकर किए गए कुछ दावों को भारत ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया था। इसके अतिरिक्त व्यापारिक विवादों और शुल्क संबंधी मतभेदों ने भी दोनों देशों के बीच असहजता पैदा की थी। फिर भी हाल के महीनों में उच्चस्तरीय संपर्कों और कूटनीतिक संवाद ने वातावरण को काफी हद तक सकारात्मक बनाया है। अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा और दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगातार वार्ताओं ने यह संकेत दिया है कि दोनों पक्ष मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के इच्छुक हैं।व्यक्तिगत स्तर पर मोदी और ट्रम्प के संबंध भी चर्चा का विषय रहे हैं। दोनों नेताओं ने अपने पिछले कार्यकालों में कई बार सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की सराहना की है। ट्रम्प ने हाल ही में भी मोदी को अपना “अच्छा मित्र” बताया और भारत के साथ व्यापार समझौते को लेकर आशावाद व्यक्त किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यक्तिगत समीकरण हमेशा निर्णायक नहीं होते, लेकिन वे कठिन वार्ताओं को आसान बनाने में सहायक अवश्य होते हैं।
साथियों, यदि यह बैठक सफल रहती है तो इसके परिणाम कई स्तरों पर दिखाई दे सकते हैं। पहला, व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने की दिशा में गति मिल सकती है। दूसरा, भारतीय पेशेवरों से जुड़े वीजा मुद्दों पर कुछ सकारात्मक संकेत सामने आ सकते हैं। तीसरा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग को नई दिशा मिल सकती है। चौथा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक साझेदारी और अधिक मजबूत हो सकती है। इसके विपरीत यदि टैरिफ और व्यापारिक विवादों पर सहमति नहीं बनती तो संबंधों में तनाव की संभावनाएं भी बनी रह सकती हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 केवल वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का मंच नहीं है,बल्कि भारत और अमेरिका के लिए अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का भी अवसर है। मोदी-ट्रम्प संभावित मुलाकात से यह स्पष्ट हो सकता है कि आने वाले वर्षों में दोनों देशसहयोग प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक साझेदारी के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करेंगे। वर्तमान संकेत बताते हैं कि दोनों पक्ष मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग की राह पर आगे बढ़ना चाहते हैं। इसलिए यह मुलाकात केवल दो नेताओं की भेंट नहीं, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक साझेदारियों में से एक के भविष्य का संकेतक भी हो सकती है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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