हर घर में छोटी-सी बात पर,क्यों झगड़े उठ जाते हैं,
मीठे-मीठे रिश्ते भी,अहंकार में टूट जाते हैं।
बात मामूली होती है,पर स्वाभिमान दीवार बन जाता है,
संवाद जहाँ मौन हो जाए,वहाँ प्रेम भी घुट जाता है।
शब्दों के तीर चलाकर,कौन किसे हराता है,
अपनों के ही दिल पर,घाव गहरा कर जाता है।
जीत भले ही मिल जाए,रिश्ते हार जाते हैं,
अहंकार के आगे अक्सर,अपने बिछड़ जाते हैं।
थोड़ा धैर्य रखकर सुनना,आधे दुख हर लेता है,
प्रेम भरा एक वाक्य भी,मन का बोझ मिटा देता है।
जहाँ सवालों में अपनापन, जवाबों में सम्मान हो,
वहाँ कठिन से कठिन समस्या का, सरल समाधान हो।
नाराज़गी को पालने से,दूरियाँ बढ़ती जाती हैं,
अनकही बातें दिल में रहकरपीड़ा बनती जाती हैं।
मौन की जंजीरें तोड़ो,मन की बात सुनाओ,
गलतफहमियों के बादल हटाकर,रिश्तों में धूप खिलाओ।
छोटी बातों को छोड़कर, प्रेम का दीप जलाएँ,
अहंकार को पीछे रखकर, संवाद का सेतु बनाएँ।
किशन रिश्ते जीतने की खातिर,जिद को हारना होगा
घर को स्वर्ग बनाने,एक-दूसरे को समझना होगा।

