अभिमान चढ़े जब मन में,विवेक का दीप बुझ जाता है,
अपने ही गुणों का मद,इंसान को खुद से दूर कर जाता है।
जो स्वयं को सबसे ऊँचा समझे,वह सीखना भूल जाता है,
ज्ञान का बंद दरवाज़ा,प्रगति की राह रोक जाता है।
विनम्रता जिसकी पहचान,वही जीवन में आगे बढ़ता है,
झुककर जो ज्ञान ग्रहण करे,उसका हर कदम निखरता है।
अभिमान भले पलभर सुख दे,पर भीतर से मन को हरता है
नम्र हृदय ही कठिन राहों में,सफलता का दीप धरता है।
धन,पद,यश और शक्ति का,कभी न करना झूठा अभिमान
आज शिखर पर जो बैठा है,कल बदल सकता है उसका स्थान।
समय किसी के हाथ में नहीं,यही जीवन का सच्चा विधान
विनम्र रहकर कर्म करते चल, यही सफलता का सम्मान।
जो दूसरों को छोटा समझे,वह खुद भी छोटा हो जाता है,
अभिमान का ऊँचा महल,एक दिन धूल में मिल जाता है।
ज़ो सबके गुण को मान दे,उसका बढ़ता सम्मान
मीठे बोल और नम्र व्यवहार से,हर दिल में बढ़ता मांन
अभिमान छोड़,विनम्रता ओढ़,यही उन्नति की सच्ची राह है
सीखते रहना,झुकते रहना,जीवन की सुंदर चाह है।
किशन मन में अहंकार नहीं,उसके आगे हर मंज़िल अथाह
अभिमान उन्नति की रुकावट है,विनम्रता ही विकास की राह
