माथे पर तिलक लगाने से,हर मन निर्मल नहीं होता,
माला के मनके फेरने से,हर पाप विरल नहीं होता।
ईश्वर उस हृदय में बसता,जहाँ छल-कपट का वास नहीं
पूजा वही पूर्ण कहलाती,जहाँ कर्मों में विश्वास सही।
केवल दीप जलाने से,जीवन में उजियारा नहीं आता,
दूसरों के आँसू पोंछे बिना,पुण्य का फूल नहीं खिलता
जो भूखे को अन्न दे,वही सच्चा प्रसाद चढ़ाता है,
जो दुख में साथ निभाए,उसमें ही ईश्वर मुस्कुराता है।
मंदिर की चौखट चूमकर,यदि मन में अहंकार पलता है,
तो समझो श्रद्धा का दीपक,भीतर ही भीतर जलता है।
वाणी में मधुरता,व्यवहार में करुणा का प्रकाश रहे,
हर प्राणी के प्रति प्रेम हो,यही सच्ची उपासना रहे।
न मन में द्वेष की अग्नि हो,न कर्मों में अन्याय रहे,
न स्वार्थ की कोई दीवार हो,न भावों में अभिमान रहे।
सोच पवित्र,कर्म निष्कलंक और हृदय निष्कपट हो जाए
बिना बुलाए भी ईश्वर,जीवन का पथप्रदर्शक बन जाए
भक्ति का अर्थ झुकना नहीं,किसी को उठाना भी है,
ईश्वर के चरणों में ही नहीं,मानव में उसे पाना भी है।
किशन जहाँ मन,कर्म और भाव की त्रिवेणी निर्मल बहे
वहीं सच्ची पूजा होती है,वहीं ईश्वर की उपस्थिति रहे
