हे मनुष्य!सफेद पोश में छिपकर,क्यों करता है कपट,
समझता है कोई देख न पाए,मिट जाएगा हर एक झपट।
चेहरे पर रख ले लाख मुखौटे,सच से बचना मुश्किल है,
ऊपर वाला सब देख रहा है,उसका न्याय अटल है।
लाखों आँखों से देख रहा वह,तेरी हर एक चाल,
करोड़ों कैमरों में दर्ज हो रहा,तेरा हर कर्म-विचार।
दुनियाँ से चाहे बच भी जाए,उससे कैसे बचेगा तू,
भीतर तक पढ़ लिया तुझको,उससे क्या छिपेगा तू?
उसके खाते में दर्ज है हर कर्म,हर पल और हर बात,
अच्छे कर्मों की खुशियाँ देगा,बुरे कर्मों की सौगात।
आज भले तू हँसता फिरता,कल हिसाब चुकाना है,
जैसा बीज तू बोएगा,वैसा ही फ़ल पाना है।
धन-दौलत और ऊँची कुर्सी,सत्य नहीं खरीद सकती,
चतुराई की कोई दीवार भी,न्याय की राह रोक न सकती।
समय भले कुछ देर लगाए,न्याय कभी सोता नहीं,
कर्मों का फल लौटकर आता,कोई कर्म खोता नहीं।
इसलिए मनुष्य!संभल जा अब,छोड़ अधर्म की राह,
साफ़ रख अपना मन और जीवन,सत्य को बना पनाह।
किशन ऊपर वाले के दरबार में,न कोई पर्दा टिकता है,
हर कर्म का पूरा हिसाब वहाँ,ब्याज सहित मिलता है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
