भारत में ज़ेन ज़ेड का उदय, राजनीति की नई करवट: 2027 में पांच राज्यों व 2029 में करोड़ों युवा तय करेंगे दिल्ली की सत्ता?
2027 में विधानसभाओं व 2029 में लोकसभा का असली किंगमेकर कौन? -संसद में मुट्ठीभर, मतपेटी में करोड़ों: ज़ेन ज़ेड -आखिर 2029 में किसकी सरकार बनाएगा? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 9 अगस्त 2026 की स्थिति को आधार बनाकर देखें तो भारत की राजनीति में एक ऐसा पीढ़ीगत बदलाव दिखाई देने लगा है,जिसे अब केवल युवा मतदाता कहकर टालना संभव नहीं है। जेन-ज़ेड आमतौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि इसका राजनीतिक व्यवहार परंपरागत राजनीतिक निष्ठाओं, जातीय समीकरणों और दलगत पहचान से आगे बढ़कर रोजगार,शिक्षा, पारदर्शिता परीक्षा व्यवस्था, डिजिटल स्वतंत्रता और जवाबदेही जैसे प्रत्यक्ष मुद्दों से जुड़ता दिखाई दे रहा है। हालांकि एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है,जेन-ज़ेड कोई आधिकारिक चुनावी श्रेणी नहीं है और इसकी आयु -सीमा पर पूर्ण सहमति भी नहीं है;इसलिए भारत में इसके मतदाताओं की सटीक संख्या बताने के बजाय आयु-समूह और मतदाता- आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाना अधिक वैज्ञानिक है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र ज़ेन ज़ेड क़ी स्थिति पर लगातार नजर गड़ाए हुए हूँ और यह मानता हूं क़ि, भारत में 2026 के परीक्षा-पत्र लीक और परीक्षा- व्यवस्था के विरुद्ध हुए युवा आंदोलन ने इस बदलाव को असाधारण रूप से सामने ला दिया।हजारों-लाखोंयुवाओं की नाराजगी केवल एक परीक्षा या एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने मेहनत का निष्पक्ष परिणाम, व्यवस्था की जवाबदेही और भविष्य की सुरक्षा जैसे व्यापक सवालों को राजनीतिक विमर्श में ला दिया। आगामी विधानसभा चुनावों (उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि) में ज़ेन ज़ी की स्थिति और उनके 5 प्रतिशत वोट के प्रभाव से संभोग तो गणित बिगाड़ सकता है।जुलाई 2026 में युवा प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा -पत्र लीक को लेकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की और सरकार के साथ बातचीत भी हुई। 9 अगस्त की स्थिति में उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में इस आंदोलन को भारत में युवा असंतोष के बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम को केवल भारत की सीमा के भीतर देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। दक्षिण एशिया के तीन पड़ोसी देशों, श्रीलंका,बांग्लादेश और नेपाल में पिछले कुछ वर्षों में युवा-प्रधान जनआंदोलनों ने सत्ता की स्थिरता को सीधे चुनौती दी। श्रीलंका में 2022 का व्यापक जनआंदोलन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़ने की स्थिति तक ले गया। बांग्लादेश में 2024 के छात्र- नेतृत्व वाले आंदोलन ने प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को गिरा दिया। नेपाल में सितंबर 2025 में भ्रष्टाचार, राजनीतिक विशेषाधिकार और सामाजिक- मीडिया प्रतिबंधों के विरोध में शुरू हुए युवा आंदोलन ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के इस्तीफे का रास्ता बनाया। इन तीनों घटनाओं में परिस्थितियां अलग थींऔर इन्हें पूरी तरह एक ही जेन-ज़ेड क्रांति कहना अतिसरलीकरण होगा,लेकिन एक साझा संदेश स्पष्ट है डिजिटल रूप से संगठित युवा असंतोष अब राजनीतिक सत्ता को चुनौती देने की क्षमता रखता है।
साथियों, यही वह बिंदु है जहां भारतीय पीएम की सोशल -मीडिया रणनीति में दिखाई देने वाला बदलाव महत्वपूर्ण हो जाता है। राजनीति में लंबे समय तक संदेश मुख्यतः भाषणों रैलियों, टेलीविजन और संगठित कार्यकर्ता नेटवर्क के माध्यमसे पहुंचाया जाता था।लेकिन अब इंस्टाग्राम रील,यूट्यूब शॉर्ट्स, छोटे वीडियो,मीम- संस्कृति और प्रत्यक्ष डिजिटल संवाद उस राजनीतिक भाषा का हिस्सा बन गए हैं जिसे युवा प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं। हाल के दिनों में मोदी और भाजपा से जुड़े डिजिटल संचार में युवाओं के अनुकूल छोटे और अधिक अनौपचारिक प्रारूपों पर ध्यान बढ़ने की चर्चा हुई है। हालांकि इसे केवल परीक्षा आंदोलन की प्रतिक्रिया कहना अभी जल्दबाजी होगी; यह व्यापक डिजिटल राजनीतिक परिवर्तन का हिस्सा है।दूसरी ओर विपक्ष के नेता ने भी जेन-ज़ेड के साथ अपेक्षाकृत अनौपचारिक डिजिटल संवाद का रास्ता अपनाया है।उनके सोशल- मीडिया संवाद में राजनीति के साथ फिटनेस, व्यक्तिगत अनुभव,युवा भाषा और सीधे संवाद को जोड़ा जा रहा है। 2025 में उनके आधिकारिक डिजिटल संवाद में जेन-ज़ेड की राजनीतिक ऊर्जा पर सीधे बात भी दिखाई दी, जबकि अगस्त 2026 में उनकी फिटनेस संबंधी पोस्ट को भी जेन-ज़ेड से जुड़ने की रणनीति के रूप में रिपोर्ट किया गया।इसी प्रकार भारत की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था के सरसंघ चालक द्वारा जेन-ज़ेड से संवाद और युवा आंदोलनों को समझने की आवश्यकता पर दिया गया जोर यह बताता है कि यह बदलाव केवल चुनावी दलों तक सीमित नहीं है। हालिया टिप्पणी में भागवत ने युवा आंदोलनों को स्वतः राष्ट्र-विरोधी मानने के बजाय नई पीढ़ी के साथ संवाद और परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। इसका व्यापक राजनीतिक अर्थ यह है कि भारतीय राजनीति की पारंपरिक संस्थाएं अब समझ रही हैं कि नई पीढ़ी को केवल भाषण देकर प्रभावित नहीं किया जा सकता; उसके सवालों के सटीकता से उत्तर भी देने होंगे।
साथियों, यही कारण है कि भाजपा से कांग्रेस,क्षेत्रीय दलों से लेकर विभिन्न सामाजिक- राजनीतिक संगठनों तक सभी के सामने एक समान चुनौती खड़ी हो गई है जेन -ज़ेड को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि संवाद- साझेदार कैसे बनाया जाए। आज का युवा पार्टी कार्यालय में आने से पहले पार्टी का इंस्टाग्राम देखता है, भाषण सुनने से पहले उसका छोटा वीडियो देखता है और नेता के दावे को स्वीकार करने से पहले अनेक डिजिटल स्रोतों से उसकी जांच कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि जेन-ज़ेड पारंपरिक राजनीति को पूरी तरह अस्वीकार कर देगा; बल्कि इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक विश्वसनीयता बनाने का रास्ता बदल रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल है भारत में जेन-ज़ेड की राजनीतिक शक्ति कितनी बड़ी है? यहां 38 करोड़ जेन- ज़ेड मतदाता कहना सटीक नहीं होगा।लगभग 38 करोड़ का आंकड़ा भारत के व्यापक युवा वर्ग के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा सकता है,लेकिन जेन-ज़ेड की पूरी जनसंख्या और उसके पात्र मतदाताओं को एक ही संख्या मानना गलत होगा। हालिया रिपोर्टों में भारत की 15-29 वर्ष आयु वाली युवा आबादी लगभग 37 करोड़ बताई गई है। इनमें सभी जेन-ज़ेड नहीं हैं और सभी मतदाता भी नहीं हैं। इसलिए आपके दिए गए 38 करोड़ के आंकड़े को युवा वर्ग की व्यापक क्षमता के संकेतक के रूप में देखना चाहिए,न कि जेन-ज़ेड के प्रमाणित मतदाता आंकड़े के रूप में।
साथियों, फिर भी राजनीतिक गणित को समझने के लिए एक सरल उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यापक युवा मतदाता समूह में केवल 5 प्रतिशत लोग चुनाव- दर-चुनाव अपना राजनीतिक रुझान बदलते हैं और यह संख्या लगभग 1.9 करोड़ तक पहुंचती है, तो यह कई निर्वाचन क्षेत्रों में परिणाम बदलने के लिए पर्याप्त प्रभाव पैदा कर सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि 1.9 करोड़ मतदाता अकेले केंद्र सरकार बना या गिरा देंगे।भारत की चुनावी राजनीति सीट-दर-सीट जीत-हार, मतदान प्रतिशत, क्षेत्रीय वितरण, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करती है। इसलिए जेन-ज़ेड की असली शक्ति उसकी कुल संख्या से अधिक उसके स्विंग फैक्टर में हो सकती है।यही कारण है कि 2029 का चुनाव जेन-ज़ेड के लिए विशेष महत्व रखेगा। आज 2026 में लगभग 18 वर्ष का युवा 2029 में लगभग 21 वर्ष का होगा। लगभग 25 वर्ष का युवा तब 28 वर्ष का होगा। यानी 2029 तक जेन-ज़ेड का बड़ा हिस्सा केवल पहली बार मतदान करने वाला युवा नहीं रहेगा,बल्कि कॉलेज सेनिकल चुका, नौकरी खोज रहा, प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले रहा, स्टार्टअप शुरू कर रहा, एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अवसर तलाश रहा या शहरों में स्वतंत्र जीवन की लागत से जूझ रहा नागरिक होगा। उसके सामने राजनीतिक प्रश्न भी अधिक ठोस होंगे।
साथियों, इस पीढ़ी के संभावित प्रमुख मुद्दों में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, पेपर लीक, शिक्षा की गुणवत्ता, बेरोजगारी कौशल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप अवसर, महंगाई, आवास और शहरों में जीवन- यापन की लागत, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता,डिजिटल स्वतंत्रता राजनीतिक जवाबदेही, पर्यावरण और मानसिक- सामाजिक दबाव प्रमुख हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि जाति, धर्म या क्षेत्रीय पहचान समाप्त हो जाएगी। भारत जैसे विविध समाज में ये तत्व महत्वपूर्ण बने रहेंगे। लेकिन इनके साथ मुद्दा- आधारित मतदान का महत्व बढ़ सकता है।यहीं से भारतीय राजनीति में एक नया समीकरण बन सकता है- पहचान + मुद्दा + डिजिटल प्रभाव । पारंपरिक राजनीति में जातीय समीकरण और संगठन चुनावी सफलता के महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। डिजिटल युग में इनके साथ एक चौथा तत्व जुड़ रहा है किसी मुद्दे को कितनी तेजी से राष्ट्रीय विमर्श में बदला जा सकता है। जेन-ज़ेड इसी चौथे तत्व का सबसे शक्तिशाली वाहक हो सकता है।
साथियों, फिर भी सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जेन-ज़ेड की सामाजिक और संभावित चुनावी ताकत बड़ी है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद छोटा है। 2024 की 18वीं लोकसभा में निर्वाचित सांसदों की औसत आयु 56 वर्ष थी। केवल 11 प्रतिशत सांसद 40 वर्ष या उससे कम आयु के थे, जबकि लगभग 52 प्रतिशत सांसद 55 वर्ष से अधिक आयु के थे। 2024 में 25 वर्ष की आयु में लोकसभा पहुंचने वाले चार युवा सांसद- शांभवी चौधरी, संजना जाटव, पुष्पेंद्र सरोज और प्रिया सरोज नई पीढ़ी की उपस्थिति का प्रतीक बने। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि 25 वर्ष के सांसद और जेन-ज़ेड सांसद समान अवधारणाएं नहीं हैं; पीढ़ी की पहचान जन्म-वर्ष से होती है।विधायिकाओं में भी स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है, लेकिन अभी भी युवा प्रतिनिधित्व सीमित है।तमिलनाडु की 2026विधानसभा में ही 25-30 वर्ष आयु के सात विधायक और 31-40 वर्ष के 42 विधायक चुने गए, जिससे पता चलता है कि कुछ राज्यों में युवा प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है। फिर भी उसी विधानसभा में 71-80 वर्ष आयु के 19 विधायक भी हैं।
साथियों, इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि भारत की राजनीति में युवा मतदाता तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन युवा सत्ता-प्रतिनिधित्व उसी गति से नहीं बढ़ा है।यही विरोधाभास राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यदि किसी पार्टी का औसत नेतृत्व-चेहरा 50 या 60 वर्ष से अधिक आयु का है, जबकि उसका महत्वपूर्ण नया मतदाता वर्ग 18 से 28 वर्ष का है, तो केवल सोशल मीडिया पर युवा भाषा अपनाने से दूरी समाप्त नहीं होगी। जेन-ज़ेड पूछ सकता है आप हमारे लिए बोलते हैं, लेकिन हमारे बीच से कितने लोगों को टिकट देते हैं? आप रोजगार की बात करते हैं, लेकिन परीक्षा व्यवस्था की जवाबदेही कौन लेगा? आप डिजिटल भारत की बात करते हैं, लेकिन डिजिटल स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर आपकी नीति क्या है?इसलिए 2029 तक राजनीतिक दलों के सामने केवल प्रचार की चुनौती नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की चुनौती भी होगी। बूथ-स्तरीय संगठन महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन उसके साथ इंस्टाग्राम, यूट्यूब, शॉर्ट-वीडियो संस्कृति, डिजिटल समुदाय, प्रभावशाली व्यक्तित्व और प्रत्यक्ष संवाद भी जरूरी होंगे। आने वाले चुनाव में वह दल अधिक प्रभावशाली हो सकता है जो जेन-ज़ेड को केवल रील देखने वाला मतदाता न समझे, बल्कि नीति-निर्माण का सहभागी बनाए।
साथियों, फिर प्रश्न आता है, भारत की राजनीति का अगला किंगमेकर कौन? इसका उत्तर अभी जेन-ज़ेड नहीं है। 2026 में जेन-ज़ेड इतना संगठित, एकजुट और चुनावी रूप से समरूप समूह नहीं है कि उसे स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में निर्णायक कहा जा सके। जेन- ज़ेड के भीतर ही विचारधारा, जाति, क्षेत्र, भाषा, वर्ग, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के बड़े अंतर हैं। लेकिन यही समूह 2029 तक संभावित किंगमेकर बनने की क्षमता जरूर रखता है।असल चुनौती यह नहीं होगी कि जेन-ज़ेड किस पार्टी को वोट देगा?, बल्कि यह होगी कि कौन-सी पार्टी जेन-ज़ेड के मुद्दों को सबसे विश्वसनीय ढंग से अपने राजनीतिक एजेंडे में बदल पाएगी। जो दल रोजगार को केवल नारा नहीं बल्कि अवसर में बदलने की विश्वसनीय योजना देगा, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता स्थापित करेगा, पेपर लीक पर कठोर जवाबदेही सुनिश्चित करेगा, शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोड़ेगा,एआई युग में युवाओं को अवसर देगा और डिजिटल संवाद को एकतरफा प्रचार के बजाय दोतरफा संवाद बनाएगा, वह इस पीढ़ी में दीर्घकालिक विश्वास सटीकता से पैदा कर सकता है।
साथियों, इसलिए 2026 का जेन-ज़ेड आंदोलन किसी एक दल के लिए केवल चुनावी खतरे का संकेत नहीं है। यह पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए चेतावनी है कि नई पीढ़ी केवल सरकार से लाभ लेने वाला नागरिक नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछने वाला नागरिक है। वह आंदोलन कर सकता है, हैशटैग बना सकता है, वीडियो वायरल कर सकता है, डेटा खोज सकता है, राजनीतिक दावों की जांच कर सकता है और अंततः मतदान केंद्र तक अपनी नाराजगी ले जा सकता है,2029 में जेन-ज़ेड एक साथ मतदाता, नौकरी तलाशने वाला, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी, डिजिटल नागरिक, उपभोक्ता, करदाता बनने की राह पर युवा और पहली बार स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय लेने वाला नागरिक होगा। यही उसका वास्तविक राजनीतिक महत्व है। इसलिए 2029 की सबसे बड़ी पीढ़ीगत लड़ाई शायद यह नहीं होगी कि कौन-सी पार्टी सबसे ज्यादा रैलियां करती है, बल्कि यह होगी कि कौन-सी पार्टी इस पीढ़ी की आकांक्षाओं को सबसे अधिक समझती है और कौन उसे केवल वोट बैंक समझती है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

