भारतीय झोला नारी डॉ. अनुभा पुंडीर का जनआंदोलन—जो पर्यावरण, परिवार और भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ रहा है
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” — अथर्ववेद
अर्थात् यह धरती हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यदि यह भाव प्रत्येक भारतीय के जीवन में पुनः जागृत हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण किसी कानून का विषय नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक आचरण बन जाएगा.
आज प्लास्टिक प्रदूषण केवल नदियों, पर्वतों और समुद्रों की समस्या नहीं रह गया है। यह हमारी जीवनशैली, हमारी संस्कृति और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। ऐसे समय में एक साधारण-सा कपड़े का झोला एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभर रहा है।
झोला—एक वस्तु नहीं, भारतीय संस्कृति का प्रतीक
भारतीय जीवन में झोले का इतिहास सदियों पुराना है। वह केवल सामान रखने का साधन नहीं था; वह सादगी, स्वावलंबन, पुनः उपयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक था।
महात्मा बुद्ध का संदेश “अप्प दीपो भव” हमें प्रेरित करता है कि परिवर्तन स्वयं से आरम्भ करें। बुद्ध का मध्यम मार्ग संयम, संतुलन और आवश्यकता भर उपभोग की शिक्षा देता है। यही झोला अभियान का मूल दर्शन है।
भारतीय ज्ञान परंपरा हमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है। यदि पृथ्वी हमारा परिवार है, तो उसका संरक्षण हमारा नैतिक दायित्व भी है।
पिछले 14 वर्षों से रघुकुल आर्यावर्त के माध्यम से डॉ. अनुभा पुंडीर, जिन्हें “भारतीय झोला नारी” तथा “भारतीय झोला क्वीन” के नाम से जाना जाता है, इस अभियान का नेतृत्व कर रही हैं।
उन्होंने “10 परिवार – 10 झोला वॉरियर्स” का अभिनव अभियान प्रारम्भ किया है। जो व्यक्ति अपने साथ दस परिवार जोड़ता है, उसे अभियान की ओर से निःशुल्क कपड़े के झोले प्रदान किए जाते हैं। इस पहल ने हजारों परिवारों को पर्यावरण संरक्षण की साझा मुहिम से जोड़ दिया है।
डॉ. अनुभा पुंडीर का अनुभव एविएशन, कॉर्पोरेट प्रशिक्षण और शिक्षा जगत तक फैला हुआ है। वे भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) को शिक्षा से जोड़ते हुए विद्यार्थियों में नेतृत्व, संस्कार और पर्यावरण चेतना का विकास कर रही हैं।
वे एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय एवं लोकनृत्य कलाकार भी हैं। देशभर में अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से वे झोला अभियान का संदेश जन-जन तक पहुँचा रही हैं।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः।
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिः।
आइए संकल्प लें—
- प्लास्टिक की थैलियों का त्याग करेंगे।
- प्रत्येक परिवार कम से कम एक कपड़े का झोला सदैव साथ रखेगा।
- दस नए परिवारों को झोला वॉरियर बनाएँगे।
- बुद्ध की करुणा, भारतीय संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को जीवन का हिस्सा बनाएँगे।
एक झोला केवल वस्तु नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है।

