ऊर्जा संकट की नई चुनौती- भारत को तात्कालिक समाधान नहीं, दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर भी निरंतर कार्य करना होगा
महंगाई का सबसे तीव्र आघात निश्चित आय वाले मध्यम वर्ग, वेतनभोगी कर्मचारी, पेंशनभोगी छोटे व्यापारी और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया- वैश्विक स्तर पर इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक विश्व अर्थव्यवस्था के लिए जितना अवसरों का युग सिद्ध हो रहा है,उतना ही अनिश्चितताओं औरबहुआयामी चुनौतियों का भी। कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था ने पुनरुद्धार की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए,लेकिन रूस-यूक्रेन संघर्ष, ईरान अमेरिका युद्ध पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, समुद्री व्यापार मार्गों पर सुरक्षा संबंधी जोखिम,ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता तथा विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों की सख्त मौद्रिक नीतियों ने विश्व आर्थिक व्यवस्था को फिर से कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि आज महंगाई केवल किसी एक देश की घरेलू समस्या नहीं रह गई है,बल्कि यह एक वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौती बन चुकी है, जिसका प्रभाव विकसित और विकासशील दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ईरान अमेरिका समझौता टूटने से आज 9 जुलाई 2026 को दोनों ने एक दूसरे के ऊपर भयंकर हमले किए हैं,स्पष्ट है कि अमेरिका-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है,बल्कि उसका प्रभाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, वित्तीय बाजारों और भारत जैसे उभरते देशों की विकास यात्रा पर पड़ता है। इसलिए भारत के लिए समय की मांग केवल तात्कालिक संकट प्रबंधन नहीं, बल्कि ऐसी दीर्घकालिक आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति तैयार करना है जो बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भी देश की विकास गति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को बनाए रख सके। भारत इस वैश्विक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण इन घटनाक्रमों से अछूता नहीं रह सकता।भारत विश्व के सबसे बड़े कच्चा तेल आयात करने वाले देशों में शामिल है। देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ी-सी वृद्धि भी भारत के आयात बिल, व्यापार घाटे और राजकोषीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।यदि तेल महंगा होता है तो परिवहन लागत बढ़ती है, उद्योगों का उत्पादन महंगा होता है, कृषि क्षेत्र में डीजल और उर्वरकों का खर्च बढ़ता है तथा अंततः खाद्य वस्तुओं और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम बढ़ने लगते हैं। यही वह श्रृंखला है, जो महंगाई को केवल आर्थिक शब्द नहीं रहने देती, बल्कि प्रत्येक परिवार के मासिक बजट और जीवन स्तर से सीधे जोड़ देती है।
साथियों, कृषि क्षेत्र भी इन वैश्विक परिस्थितियों से पूरी तरह अछूता नहीं है। भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन खेती में डीजल, उर्वरक, सिंचाई, परिवहन और भंडारण की लागत लगातार बढ़ने पर किसानों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। यदि मौसम की अनिश्चितता भी साथ जुड़ जाए, तो खाद्यान्न उत्पादन और आपूर्ति दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है, जिसका सीधा प्रभाव आम नागरिकों की रसोई पर पड़ता है। यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा,कृषि सुधार आधुनिक भंडारण व्यवस्था और आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाना आज केवल कृषि नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
साथियों, महंगाई का सबसे अधिक प्रभाव निश्चित आय वाले वर्ग पर पड़ता है। मध्यम वर्ग, वेतनभोगी कर्मचारी, पेंशनभोगी, छोटे व्यापारी और निम्न आय वर्ग के परिवार तब सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जब उनकी आय की तुलना में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली, गैस और आवास जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर होने वाला खर्च परिवारों के मासिक बजट को असंतुलित कर देता है। यदि ब्याज दरें भी ऊँची बनी रहती हैं तो गृह ऋण, वाहन ऋण और व्यापारिक ऋण की मासिक किस्तें बढ़ सकती हैं। इस प्रकार महंगाई केवल आर्थि सूचकांक नहीं रहती,बल्कि प्रत्येकपरिवार के जीवन स्तर और भविष्य की योजनाओं को प्रभावित करने वाला वास्तविक सामाजिक प्रश्न बन जाती है।
साथियों, आज विश्व व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ आर्थिक शक्ति, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी श्रेष्ठता और भू-राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। अमेरिका अपनी मौद्रिक नीति, तकनीकी नवाचार और डॉलर की वैश्विक भूमिका के माध्यम से आर्थिक नेतृत्व बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।चीन विनिर्माण, निर्यात, दुर्लभ खनिजों, हरित प्रौद्योगिकी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर कार्य कर रहा है।यूरोपीय संघ ऊर्जा विविधीकरण हरित अर्थव्यवस्था और डिजिटल परिवर्तन पर बल दे रहा है,जबकि जापान तकनीकी नवाचार, उच्च उत्पादकता और ऊर्जा दक्षता के माध्यम से अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। इन परिस्थितियों में भारत केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभर रहा है।
साथियों, भारत के पास आज विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी,तेजी से बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढाँचा, विशाल घरेलू बाजार, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, मजबूत बैंकिंग प्रणाली,व्यापक भुगतान नेटवर्क, तेजी से विकसित हो रहा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र और आधारभूत संरचना में निरंतर निवेश जैसी अनेक शक्तियाँ हैं। यही कारण है कि वैश्विक कंपनियाँ आज चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करते हुए भारत को दीर्घकालिक विनिर्माण, अनुसंधान, डिजिटल सेवाओं और वैश्विक आपूर्ति शृंखला के विश्वसनीय साझेदार के रूप में देखने लगी हैं। यदि भारत इन अवसरों का सही उपयोग करता है तो वर्तमान वैश्विक संकट भी उसके लिए दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।हालाँकि अवसरों के साथ चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। यदि वैश्विक महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतें ऊँचे स्तर पर बनी रहती हैं या समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान आता है, तो भारत के आयात बिल, चालू खाते के घाटे, राजकोषीय प्रबंधन और महंगाई नियंत्रण पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, असामान्य मानसून, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में बढ़ती संरक्षणवादी नीतियाँ भी भविष्य की आर्थिक रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए भारत को केवल तात्कालिक समाधान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर भी निरंतर कार्य करना होगा।
साथियों, ऐसी परिस्थितियों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होनी चाहिए। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, परमाणु ऊर्जा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार देश को भविष्य के ऊर्जा संकटों से अपेक्षाकृत सुरक्षित बना सकता है। इसके साथ-साथ रेलवे, जलमार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, कोल्ड स्टोरेज, डिजिटल अवसंरचना और स्मार्ट विनिर्माण में निवेश उत्पादन लागत कम करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।यदि भारत अनुसंधान एवं विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा विनिर्माण और उच्च तकनीक उद्योगों में अपनी क्षमता को और मजबूत करता है,तो वह केवलउपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में भी स्थापित हो सकता है।
साथियों, वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ यह भी स्पष्ट कर रही हैं कि आधुनिक अर्थव्यवस्था केवल घरेलू नीतियों से संचालित नहीं होती। किसी भी देश में होने वाला युद्ध, प्रतिबंध, समुद्री मार्गों में व्यवधान, ऊर्जा संकट या मुद्रा बाजार में अस्थिरता कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। वैश्वीकरण के इस युग में देशों की आर्थिक नियति पहले की तुलना में कहीं अधिक परस्पर जुड़ चुकी है। इसलिए भारत जैसे तेजी से उभरते राष्ट्र के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह केवल घरेलू मांग और उत्पादन पर ही ध्यान न दे, बल्कि वैश्विक घटनाक्रमों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए अपनी आर्थिक, व्यापारिक और ऊर्जा रणनीतियों को समयानुकूल बनाता रहे।ऊर्जा संकट का महत्वपूर्ण प्रभाव भारतीय रुपये पर पड़ सकता है। जब आयात बिल बढ़ता है तो विदेशी मुद्रा की मांग भी बढ़ती है। यदि निर्यात उसी अनुपात में नहीं बढ़ते, तो रुपये पर दबाव आ सकता है। कमजोर रुपया एक ओर निर्यातकों के लिए कुछ अवसर पैदा करता है, लेकिन दूसरी ओर पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुओं को महंगा बना देता है। इससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। इसलिए भारतीय रिज़र्व बैंक को विदेशी मुद्रा भंडार, विनिमय दर और मौद्रिक नीति के बीच अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण सटिका से अपनाना पड़ता है।
साथियों, विश्व राजनीति के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनका प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल देती हैं। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता (जेसीपीओए) भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक व्यवस्था थी। इस समझौते का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना था। किंतु समझौते के प्रभावी ढंग से लागू न रह पाने, उसके बाद बढ़ते प्रतिबंधों, अविश्वास, सैन्य तनाव और समय-समय पर दोनों देशों के बीच टकराव ने पश्चिम एशिया को फिर से वैश्विक अस्थिरता के केंद्र में ला खड़ा किया। परिणामस्वरूप ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी, तेल आपूर्ति को लेकर आशंकाएँ गहराईं और पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं के सामने आर्थिक जोखिम बढ़ने लगे।
साथियों, विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितताओं का सबसे त्वरित प्रभाव वित्तीय बाजारों पर दिखाई देता है। निवेशकों का विश्वास, पूंजी का प्रवाह, विदेशी संस्थागत निवेश, मुद्रा विनिमय दर और ब्याज दरों की दिशा ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव आता है या महंगाई नियंत्रण से बाहर जाने की आशंका पैदा होती है, तब सबसे पहले शेयर बाजार इसकी प्रतिक्रिया देता है। भारत का शेयर बाजार भी आज वैश्विक पूंजी प्रवाह का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसलिए न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो, दुबई या सिंगापुर में होने वाली आर्थिक हलचल का प्रभाव कुछ ही घंटों में मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर दिखाई देने लगता है। यही वैश्वीकरण की वास्तविकता है, जहाँ पूंजी सीमाओं से अधिक गति से चलती है और निवेशक जोखिम के अनुसार अपनी रणनीति सटीकता से बदलते रहते हैं।
साथियों, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊँची बनी रहती हैं और महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो भारतीय शेयर बाजार में क्षेत्रवार अलग-अलग प्रभाव देखने को मिल सकता है। तेल एवं गैस, ऊर्जा, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा तथा कुछ निर्यात आधारित कंपनियों को अपेक्षाकृत लाभ मिल सकता है,जबकि विमानन, परिवहन,रसायन, प्लास्टिक, ऑटोमोबाइल, सीमेंट तथा ऊर्जा-निर्भर उद्योगों की लागत बढ़ने से उनके लाभांश पर दबाव आ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर भी वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारतीय आईटी उद्योग का बड़ा हिस्सा अमेरिका और यूरोप से आने वाली परियोजनाओं पर आधारित है। यदि विकसित देशों में निवेश और कॉरपोरेट खर्च धीमा पड़ता है, तो भारतीय आईटी कंपनियों की वृद्धि की गति भी प्रभावित हो सकती है।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

