जब तक समाज में जुगाड़ और काम निकालने की मानसिकता बनी रहेगी,तब तक भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता?
नक्सलवाद के खिलाफ़ जैसे जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई गई, वैसे ही भ्रष्टाचार व नशाखोरी के खिलाफ़ भी एक सख्त और समयबद्ध रणनीति बनाई जाने की खास जरूरत है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत के समकालीन राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहे नक्सलवाद के लगभग अंत की घोषणा के साथ अब राष्ट्रीय एजेंडा एक नए लक्ष्य की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है,भ्रष्टाचार मुक्त भारत। यह केवल एक नारा या राजनीतिक संकल्प नहीं, बल्कि शासन- प्रणाली, विकास मॉडल और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की परीक्षा है। जिस प्रकार नक्सल मुक्त भारत के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित कर व्यापक रणनीति के साथ कार्य किया गया,उसी प्रकार अब यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक ठोस डेडलाइन तय की जानी चाहिए?मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि,अब भारतीय नक्सलवाद क़ा अध्याय लगभग समाप्ति की ओर है,तो स्वाभाविक रूप से ध्यान देश की दूसरी बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की ओर जा रहा है।भ्रष्टाचार जो न केवल आर्थिक संसाधनों की बर्बादी करता है,बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है,आज विकास की राह में सबसे बड़ा अवरोध बन चुका है। सरकारी योजनाओं का लाभ अक्सर अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि बीच में बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों का एक जाल सक्रिय रहता है। ऐसे में यह विचार तेजी से उभर रहा है कि जैसे नक्सलवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई गई, वैसे ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक सख्त और समयबद्ध रणनीति बनाई जानी चाहिए।सरकारी पैसा सीधे जनता की जेब में यह विचार केवल एक नारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार का एक महत्वपूर्णसिद्धांत है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जिससे लाखों लोगों को बिना किसी बिचौलिए के सीधे लाभ मिला है। लेकिन इसके बावजूद भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।फाइलों को जानबूझकर अटकाना, रिश्वत की मांग करना और जांच प्रक्रियाओं को लंबित रखना सबसे बड़ी बात ऊपरी लेवल तक ठेको सहित अन्य करों में 40-50 परसेंट का लेनदेन आज भी आम समस्याएं हैं। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए स्पष्ट समय- सीमा तय की जाए और उसमें देरी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
साथियों बात अगर हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल कानून और दंड तक सीमित नहीं हो सकती इसको समझने की करें तो, इसके लिए एक व्यापक संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है,जिसमें पारदर्शिता,जवाबदेही और नागरिक भागीदारी को प्राथमिकता दी जाए।
शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा और त्वरित न्याय का भरोसा देना भी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अक्सर देखा गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को ही प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, जिससे अन्य लोग आगे आने से डरते हैं। यदि इस भय को समाप्त नहीं किया गया, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी अभियान अधूरा रहेगा।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखा जाए तो जिन देशों ने भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण पाया है,उन्होंने सख्त कानूनों के साथ- साथ तकनीकी नवाचार और संस्थागत सुधारों को अपनाया है।सिंगापुर और स्कैंडिनेवियाई देशों के उदाहरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं, जहां पारदर्शिता और जवाबदेही को शासन की आधारशिला बनाया गया है। भारत में भी डिजिटल इंडिया, आधार और ई-गवर्नेंस जैसी पहलें इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इनका पूर्ण लाभ तभी मिलेगा जब इन्हें एक व्यापक रणनीति के तहत लागू किया जाए।यह भी महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार को केवल एक प्रशासनिक समस्या के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे एक सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती के रूप में भी समझा जाए। जब तक समाज में जुगाड़ और काम निकालने की मानसिकता बनी रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा, जागरूकता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।जनता की अपेक्षाएं भी अब बदल रही हैं। लोग केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे परिणाम देखना चाहते हैं। नक्सलवाद के खिलाफ सफलता ने यह विश्वास पैदा किया है कि यदि सरकार ठान ले, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का समाधान संभव है। यही विश्वास अब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी दिखाई दे रहा है।
साथियों बात अगर हम नक्सलवाद समाप्ति टारगेट 31 मार्च 2026 की करें तो भारत में नक्सलवाद का इतिहास 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ, जब एक छोटे किसान आंदोलन ने हिंसक विद्रोह का रूप ले लिया। प्रारंभ में यह आंदोलन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाने का माध्यम था, लेकिन समय के साथ यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन गया। करीब छह दशकों तक चले इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, जिनमें सुरक्षा बलों के जवान और आम नागरिक दोनों शामिल थे। लेकिन 2024 में एक निर्णायक मोड़ आया, जब देश के गृह मंत्री ने नक्सलवाद के अंत के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की। इसके बाद सुरक्षा बलों, खुफिया एजेंसियों और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों ने रेड कॉरिडोर के विस्तार को तेजी से सीमित कर दिया। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाए गए, नक्सली नेतृत्व को कमजोर किया गया और हजारों कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। बस्तर जैसे क्षेत्र, जो कभी नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे, वहां अब स्कूल, सड़कें और राशन की दुकानें खुलने लगी हैं। यह परिवर्तन केवल सुरक्षा की दृष्टि से नहीं, बल्किसामाजिक और आर्थिक विकास के संकेत के रूप में भी महत्वपूर्ण है।हालांकि, इस उपलब्धि पर राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। जहां एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं विपक्ष ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा इस मुद्दे पर बहस की चुनौती यह दर्शाती है कि नक्सलवाद का पूर्ण अंत अभी भी एक बहस का विषय है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि नक्सलवाद का प्रभाव पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और देश ने इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
साथियों बात अगर हम नक्सलवाद और भ्रष्टाचार के बीच एक महत्वपूर्ण समानता को समझने की करें तो वह यह है कि दोनों ही विकास और सुशासन के लिए बाधक हैं। जहां नक्सलवाद ने देश के कुछ हिस्सों को विकास की मुख्यधारा से अलग कर दिया, वहीं भ्रष्टाचार ने पूरे देश में संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को प्रभावित किया। इसलिए यदि नक्सलवाद के अंत को एक नई आज़ादी के रूप में देखा जा रहा है, तो भ्रष्टाचार से मुक्ति को वास्तविक आज़ादी की दिशा में अगला कदम माना जा सकता है।अब सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक निश्चित डेडलाइन तय की जा सकती है? यह एक जटिल प्रश्न है, क्योंकि नक्सलवाद की तरह यह एक स्पष्ट और सीमित क्षेत्र में फैली समस्या नहीं है। यह समाज और व्यवस्था के हर स्तर पर मौजूद है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि इसके खिलाफ ठोस और समयबद्ध कार्रवाई संभव नहीं है। यदि स्पष्ट लक्ष्यों, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रभावी कार्यान्वयन के साथ एक रणनीति बनाई जाए, तो निश्चित रूप से इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की जा सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नक्सल मुक्त भारत से भ्रष्टाचार मुक्त भारत की यात्रा केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय परिवर्तन का संकेत है। यह यात्रा आसान नहीं होगी, लेकिन यदि इसे सही दिशा और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो यह भारत को एक नए युग में प्रवेश कराने का माध्यम बन सकती है एक ऐसा युग जहां विकास समावेशी हो, शासन पारदर्शी हो और नागरिकों का विश्वास अटूट हो।
