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कानूनी मापन (सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र) संशोधन नियम, 2026 लागू- सीएनजी, एलपीजी और हाइड्रोजन पंपों पर नहीं होगी माप-तौल में हेराफेरी :कानूनी मापन व्यवस्था में बड़े सुधार की ओर भारत का निर्णायक कदम -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 25, 2026
in Hindi Editorials
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कानूनी मापन (सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र) संशोधन नियम, 2026 केवल एक तकनीकी संशोधन नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा, उपभोक्ता संरक्षण और प्रशासनिक सुधार यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव

पेट्रोल से लेकर हाइड्रोजन तक सभी प्रमुख ईंधन वितरण प्रणालियों को वैज्ञानिक सत्यापन ढांचे में शामिल करना भविष्य की अर्थव्यवस्था पारदर्शिता, तकनीकी सटीकता व उपभोक्ता विश्वास पर आधारित होनें क़ा स्पष्ट संकेत -एडवोकेट किशन षणमुख दास भावनी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में ईंधन वितरण प्रणाली लंबे समय से उपभोक्ता विश्वास, पारदर्शिता और माप- तौल की सटीकता से जुड़ा एक संवेदनशील विषय रही है। पेट्रोल पंपों पर कम ईंधन देने की शिकायतें हों या उभरते स्वच्छ ईंधन क्षेत्रों,सीएनजी, एलपीजी,एलएनजी और हाइड्रोजन, में मानकीकरण की चुनौती, सरकार के सामने एक ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता थी जो उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करने के साथ- साथ आधुनिक ऊर्जा अर्थव्यवस्था की जरूरतों को भी पूरा कर सके। इसी दिशा में केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले विभाग,उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा कानूनी मापन (सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र) संशोधन नियम, 2026 लागू किए गए हैं,जो 8 मई 2026 को राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही पूरे देश में तत्काल प्रभाव से लागू हो गए, जिसके लिए विधि मापन संबंधी सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र संशोधन नियम, 2026 के मसौदे पर हितधारकों से टिप्पणियाँ 1 से 31 जनवरी 2026 तक आमंत्रित की गई थीं।इस संशोधन का मूल उद्देश्य भारत की कानूनी मापन प्रणाली को अधिक पारदर्शी,वैज्ञानिक, तकनीक-सक्षम और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना है। नए नियमों के अंतर्गत पहली बार पेट्रोल/डीजल डिस्पेंसर, सीएनजी डिस्पेंसर, एलपीजी डिस्पेंसर, एलएनजी डिस्पेंसर और हाइड्रोजन डिस्पेंसर को सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र (जीएटीसी) ढांचे में शामिल किया गया है। इसका अर्थ यह है कि अब इन ईंधन वितरण प्रणालियों का सत्यापन और पुनःसत्यापन अधिक व्यवस्थित तेज और व्यापक स्तर पर हो सकेगा। यह कदम न केवल उपभोक्ताओं को सही मात्रा में ईंधन सुनिश्चित करेगा बल्कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, हरित ईंधन अवसंरचना और डिजिटल प्रशासन को भी नई मजबूती प्रदान करेगा। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत में लीगल मेट्रोलॉजी अर्थात कानूनी मापन व्यवस्था का महत्व केवल व्यापारिक लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता संरक्षण,निष्पक्ष बाजार व्यवस्था और आर्थिक विश्वसनीयता की आधारशिला भी है। जब कोई उपभोक्ता पेट्रोल,सीएनजी या एलपीजी खरीदता है, तो वह वस्तुतः मात्रा और मूल्य के बीच एक कानूनी अनुबंध कर रहा होता है।यदि माप में गड़बड़ी होती है तो यह सीधा आर्थिक शोषण माना जाता है। इसी कारण दुनियाँ के विकसित देशों में ईंधन वितरण प्रणालियों के लिए अत्यंत कठोर सत्यापन मानक लागू किए जाते हैं। भारत में भी लंबे समय से विधिक मापन अधिनियम और संबंधित नियम लागू हैं, किंतु बदलती तकनीकों और ऊर्जा प्रणालियों के विस्तार के कारण नई चुनौतियां सामने आ रही थीं।विशेष रूप से सीएनजी और हाइड्रोजन जैसे गैसीय ईंधनों के वितरण में उच्च तकनीकी सटीकता की आवश्यकता होती है। ऐसे में सरकार द्वारा जीएटीसी ढांचे का विस्तार करना एक समयोचित और दूरदर्शी निर्णय माना जा रहा है।
साथियों, यह संशोधन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूरे भारत में एक समान रूप से लागू होने वाला केंद्रीय नियम है। यानी 8 मई 2026 से देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह व्यवस्था प्रभावी हो चुकी है। हालांकि, केंद्र सरकार ने राज्यों को भी पर्याप्तलचीलापन दिया है। संशोधन के अंतर्गत राज्य सरकारों को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वे अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और औद्योगिक जरूरतों के आधार पर अतिरिक्त श्रेणियों के वजन एवं माप उपकरणों को सत्यापन के लिए अधिसूचित कर सकें। इससे संघीय ढांचे और स्थानीय प्रशासनिक जरूरतों के बीच संतुलन स्थापित होता है। उदाहरण के लिए, जिन राज्यों में प्राकृतिक गैस आधारित परिवहन अधिक है, वहां सीएनजी डिस्पेंसरों के सत्यापन पर विशेष ध्यान दिया जा सकेगा, जबकि औद्योगिक राज्यों में एलएनजी या हाइड्रोजन आधारित
अवसंरचना को प्राथमिकता दी जा सकती है।
साथियों बात अगर हम संशोधित नियमों का सबसे बड़ा प्रभाव को समझने की करेंतो सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्रों अर्थात जीएटीसी की भूमिका में दिखाई देगा। जीएटीसी वे संस्थान हैं जिन्हें सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त होती है और जिनके पास वजन और मापउपकरणों के सत्यापन के लिए आवश्यक तकनीकी विशेषज्ञता,परीक्षणप्रयोगशालाएं और प्रमाणन क्षमता उपलब्ध होती है। अब तक इन केंद्रों के माध्यम से 18 श्रेणियों के उपकरणों का सत्यापन किया जाता था, लेकिन नए संशोधन के बाद पांच नई श्रेणियों को जोड़कर कुल संख्या 23 कर दी गई है। इससे देशभर में सत्यापन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। पहले जहां कई क्षेत्रों में परीक्षण और सत्यापन के लिए सरकारी विभागों पर अत्यधिक दबाव रहता था, वहीं अब निजी क्षेत्र की तकनीकी प्रयोगशालाओं और अनुमोदित संस्थानों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करके क्षमता का विकेंद्रीकरण किया गया है। इससे समय की बचत होगी, सेवाएं अधिक सुलभ होंगी और प्रमाणन प्रक्रिया में तेजी आएगी।
साथियों, नई जोड़ी गई श्रेणियों में पेट्रोल/डीजलडिस्पेंसर सीएनजी डिस्पेंसर, एलपीजी डिस्पेंसर, एलएनजी डिस्पेंसर और हाइड्रोजन डिस्पेंसर शामिल हैं। यह सूची इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल पारंपरिक ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहता,बल्कि वह भविष्य की हरित ऊर्जा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नियामक ढांचा विकसित कर रहा है। विशेष रूप से हाइड्रोजन डिस्पेंसरों को शामिल करना अत्यंत दूरदर्शी कदम माना जा रहा है। दुनिया भर में ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है और भारत भी राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से इस क्षेत्र में तेजी से निवेश कर रहा है। ऐसे में यदि वितरण प्रणाली का सत्यापन वैज्ञानिक और पारदर्शी नहीं होगा तो भविष्य में बड़े स्तर पर उपभोक्ता विवाद और तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं। सरकार ने समय रहते इस दिशा में नियामक ढांचे को मजबूत कर दिया है।सीएनजी, एलएनजी और हाइड्रोजन जैसे ईंधनों का वितरण सामान्य तरल ईंधनों की तुलना में कहीं अधिक जटिल होता है। इनमें दबाव, तापमान और गैस घनत्व जैसे कई वैज्ञानिक कारक शामिल होते हैं। यदि माप उपकरणों का समय पर अंशांकन और सत्यापन न किया जाए तो वितरण में बड़ी त्रुटियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसका प्रभाव केवल उपभोक्ता के आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सुरक्षा जोखिम भी बढ़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है और इसकी आपूर्ति में तकनीकी मानकों की अनदेखी गंभीर दुर्घटनाओं को जन्म दे सकती है। इसलिए इन नई श्रेणियों को कानूनी मापन ढांचे में शामिल करना ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक सुरक्षा दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
साथियों, सरकार द्वारा सत्यापन शुल्क भी स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिया गया है। संशोधित नियमों के अनुसार पेट्रोल और डीजल डिस्पेंसरों के सत्यापन शुल्क को 5,000 रुपये प्रति नोजल तथा सीएनजी, एलपीजी, एलएनजी और हाइड्रोजन डिस्पेंसरों के लिए 10,000 रुपये प्रति नोजल निर्धारित किया गया है। पहली नजर में यह शुल्क कुछ संचालकों को अधिक लग सकता है, लेकिन यदि इसे उपभोक्ता संरक्षण और तकनीकी विश्वसनीयता के संदर्भ में देखा जाए तो यह निवेश दीर्घकालिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा। सही सत्यापन व्यवस्था उपभोक्ता विवादों को कम करेगी,ईंधन चोरी और माप-तौल में हेराफेरी पर अंकुश लगाएगी तथा व्यवसायों की विश्वसनीयता बढ़ाएगी।इस संशोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना भी है। नियमों में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों को विशेष शक्तियां प्रदान की गई हैं ताकि अनुमोदन और संबंधित प्रशासनिक मामलों का त्वरित निपटान हो सके। भारत जैसे विशाल देश में अक्सर तकनीकी स्वीकृतियों और प्रमाणन प्रक्रियाओं में देरी एक बड़ी समस्या रही है। यदि सत्यापन और अनुमोदन समय पर नहीं हो पाते, तो उद्योगों की लागत बढ़ती है और उपभोक्ताओं को भी असुविधा होती है। इसलिए यह संशोधन केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि प्रशासनिक सुधार भी है।
साथियों, यह पहल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। जब सत्यापन सेवाएं अधिक उपलब्ध और तेज होंगी, तो उद्योगों को संचालन में आसानी होगी। इससे ईंधन वितरण नेटवर्क के विस्तार में तेजी आएगी। विशेष रूप से सीएनजी और एलएनजी आधारित परिवहन अवसंरचना को इससे बड़ा लाभ मिलेगा। भारत पहले ही प्राकृतिक गैस आधारित अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है और अनेक शहरों में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का विस्तार हो रहा है। ऐसे में सत्यापन क्षमता का विस्तार ऊर्जा क्षेत्र के विकास को प्रत्यक्ष रूप से समर्थन देगा।उपभोक्ताओं के दृष्टिकोण से देखें तो यह संशोधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में लंबे समय से ईंधन पंपों पर कम मात्रा में ईंधन देने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई बार इलेक्ट्रॉनिक छेड़छाड़, गलत अंशांकन या तकनीकी गड़बड़ियों के कारण उपभोक्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता था। अब अधिक संख्या में सत्यापन केंद्र उपलब्ध होने से नियमित जांच और पुनः सत्यापन संभव होगा। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं का विश्वास मजबूत होगा। इसके अतिरिक्त राज्य के विधिक माप विभाग अब सत्यापन संबंधी कार्यभार से कुछ हद तक मुक्त होकर निरीक्षण, प्रवर्तन और उपभोक्ता शिकायत निवारण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिक ध्यान सटीकता से केंद्रित कर सकेंगे।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी यह कदम महत्वपूर्ण है। दुनिया के अधिकांश विकसित देश अपने कानूनी मापन ढांचे को अंतरराष्ट्रीय विधिक मापन संगठन यानी ओआईएमएल की सिफारिशों के अनुरूपविकसित कर रहे हैं। भारत का यह संशोधन भी वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप माना जा रहा है। इससे भारतीय मापन प्रणाली की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता बढ़ेगी और वैश्विक व्यापार में भी लाभ मिलेगा। विशेष रूप से जब भारत स्वच्छ ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और वैकल्पिक ईंधनों के क्षेत्र में वैश्विक निवेश आकर्षित करना चाहता है, तब एक मजबूत और वैज्ञानिक मापन प्रणाली निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने में सटीकता से महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
साथियों कानूनी मापन प्रणाली का महत्व केवल व्यापारिक पारदर्शिता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक आर्थिक शासन का भी हिस्सा है। यदि किसी देश में माप-तौल की प्रणाली विश्वसनीय नहीं होती, तो बाजार में उपभोक्ता विश्वास कमजोर पड़ता है और आर्थिक गतिविधियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए विकसित अर्थव्यवस्थाएं इस क्षेत्र में अत्यधिक निवेश करती हैं। भारत द्वारा जीएटीसी ढांचे का विस्तार इसी दिशा में एक संरचनात्मक सुधार है जो भविष्य में डिजिटल मापन तकनीकों, स्मार्ट डिस्पेंसर और एआई आधारित निगरानी प्रणालियों के लिए भी आधार तैयार करेगा।यह संशोधन आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से भी जुड़ा हुआ है। जब देश अपनी ऊर्जा अवसंरचना , सत्यापन क्षमता और तकनीकी मानकीकरण को मजबूत करता है, तो वह आयातित प्रणालियों पर निर्भरता कम करता है। साथ ही घरेलू उद्योगों और तकनीकी प्रयोग शालाओं को नए अवसर भी प्राप्त होते हैं। जीएटीसी ढांचे में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि कहा जा सकता है कि कानूनी मापन (सरकारी अनुमोदित परीक्षण केंद्र) संशोधन नियम, 2026 केवल एक तकनीकी संशोधन नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा, उपभोक्ता संरक्षण और प्रशासनिक सुधार यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। पेट्रोल से लेकर हाइड्रोजन तक सभी प्रमुख ईंधन वितरण प्रणालियों को वैज्ञानिक सत्यापन ढांचे में शामिल करके सरकार ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था पारदर्शिता, तकनीकी सटीकता और उपभोक्ता विश्वास पर आधारित होगी। आने वाले वर्षों में जब भारत स्वच्छ ऊर्जा आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करेगा, तब यह कानूनी और संस्थागत ढांचा उसकी विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार बनेगा।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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