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शिक्षकों को चुनावी प्रक्रिया, जनगणना,आर्थिक सर्वेक्षण, पल्स पोलियो अभियान, स्थानीय निकायों के डाटा संकलन, आवारा कुत्तों की गणना जैसे कार्यों में लगाना- बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप- 31 जुलाई 2026 तक रोक-क्या शिक्षक शिक्षा दें या शासन के गैर- शैक्षणिक कार्य करें? -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 24, 2026
in Hindi Editorials
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बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय शिक्षा की गरिमा, संवैधानिक सीमाओं और विधि के शासन, तीनों की एक साथ रक्षा करने वाला ऐतिहासिक कदम

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक अंतरिम राहत नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की मूल आत्मा की रक्षा का प्रयास- अदालत क़ा स्पष्ट संदेश कि शिक्षक केवल प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय धुरी हैं सराहनीय -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तर पर भारत में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि शिक्षकों का मूल दायित्व बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना है या फिर उन्हें चुनाव, जनगणना, सर्वेक्षण, पशुगणना,सामाजिक योजनाओं के सत्यापन,मतदाता सूची पुनरीक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगातार लगाया जाना चाहिए। देश के लगभग हर राज्य में समय- समय पर शिक्षकों को चुनावी प्रक्रिया, जनगणना,आर्थिक सर्वेक्षण, पल्स पोलियो अभियान, स्थानीय निकायों के डाटा संकलन,यहां तक कि आवारा कुत्तों की गणना जैसे कार्यों में भी लगाया गया है।सरकारी व्यवस्था का तर्क हमेशा यह रहा कि शिक्षक पढ़े -लिखे, अनुशासित और प्रशासनिक रूप से भरोसेमंद कर्मचारी होते हैं, इसलिए वे ऐसे कार्यों के लिए उपयुक्त हैं। जबकि मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र नें ख़ुद सैकड़ो आर्टिकलों के जरिए हर प्रदेश की इस शासन व्यवस्था का विरोध दर्ज कराते रहता हूं ,कई बार मैंने शिक्षकों से ग्राउंड रिपोर्टिंग करके पूछा है तो उन्होंने इस विषय पर गहरी संवेदना भी व्यक्त की है, परंतु मेरी हसते लेखनी तथा इन ग्राउंड रिपोर्ट क़े विचारों को शासन ने अभी तक महत्व नहीं दिया है।दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों,अभिभावकों और स्वयं शिक्षकों का लगातार यह कहना रहा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होती है, विद्यार्थियों का अध्ययन बाधित होता है और शिक्षकों की ऊर्जा तथा समय शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के बजाय गैर- शैक्षणिक गतिविधियों में खर्च हो जाता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर देशभर की अदालतों में अनेक याचिकाएं दायर होती रही हैं।इसी पृष्ठभूमि में अब अनएडेड स्कूल्ज फोरम & अदर्स वर्सस स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र एंड अदर्स केस नम्बर रिट पीटिशन नम्बर 15009/ 2026 मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 22 मई 2026 को दिया गयाअंतरिम आदेश अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।अदालत ने महाराष्ट्र में निजी गैर-सहायता प्राप्त तथा अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को जनगणना कार्य में अनिवार्य रूप से तैनात करने पर 31 जुलाई 2026 तक रोक लगा दी।यह निर्णय केवलप्रशासनिक आदेश पर रोक भर नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के अधिकार, शिक्षक की भूमिका, वैधानिक सीमाओं और राज्य की शक्तियों की सटीक संवैधानिक समीक्षा भी है।
साथियों, सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत में किन कानूनों के अंतर्गत शिक्षकों से चुनावी या जनगणना संबंधी कार्य लिए जाते रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया के संदर्भ में मुख्य प्रावधान रिप्रेजेन्टेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट , 1950 तथा रिप्रेजेन्टेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट ,1951 में निहित हैं।विशेष रूप सेजनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13सीसी तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 159 के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों को निर्वाचन संबंधी कार्यों के लिए उपलब्ध कराने का अधिकार चुनाव आयोग को प्राप्त है। इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत व्यापक संवैधानिक शक्तियां भी प्राप्त हैं। इसी आधार पर सरकारी स्कूलों के शिक्षक अक्सर चुनाव ड्यूटी, मतदाता सूची पुनरीक्षण और मतदान प्रक्रिया में नियुक्त किए जाते रहे हैं।वहीं जनगणना संबंधी कार्यों के लिए मुख्य कानून सेंसेक्स,एक्ट 1948 है। इस अधिनियम की धारा 4 केंद्र सरकार को जनगणना आयुक्त तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार देती है। धारा 4ए के अंतर्गत स्थानीय प्राधिकरण को अपनेकर्मचारियों को जनगणना कार्य हेतुउपलब्ध कराने का दायित्व सौंपा जा सकता है। इसी प्रावधान की व्याख्या को लेकर वर्तमान विवाद खड़ा हुआ। राज्य सरकार का तर्क था कि निजी सहायता प्राप्त अथवा गैर- सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षक भी व्यापक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और उन्हें जनगणना कार्य में लगाया जा सकता है। जबकि याचिका कर्ताओं ने कहा कि निजी स्कूल स्थानीय प्राधिकरण की परिभाषा में नहीं आते और इसलिए उनके कर्मचारियों पर ऐसी बाध्यता नहीं थोपी जा सकती।
साथियों, अनएडेड स्कूल्ज फोरम & अदर्स वर्सस स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र एंड अदर्स केस नम्बर रिट पीटिशन नम्बर 15009/2026 मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 22 मई 202 की सुनवाई जस्टिस गौतम अंखड और जस्टिस संदेश पाटिल की अवकाशकालीन पीठ के समक्ष हुई। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि जनगणना अधिनियम और उससे संबंधित नियमों में कहीं भी ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो निजी गैर-सहायता प्राप्त और अल्पसंख्यक स्कूलों को अपने शिक्षकों एवं कर्मचारियों को जनगणना कार्य के लिए उपलब्ध कराने हेतु बाध्य करता हो। अदालत का यह अवलोकन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग तभी वैध माना जाता है जब उसके पीछे स्पष्ट वैधानिक आधार हो।राज्य सरकार ने अदालत के सामने यह भी तर्क रखा कि राइट ऑफ़ चिल्ड्रन टू फ़्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन एक्ट , 2009 अर्थात आरटीई अधिनियम की धारा 27शिक्षकों को गैर- शैक्षणिक कार्यों में लगाने की अनुमति देती है। धारा 27 वास्तव में कहती है कि शिक्षकों को सामान्यतः गैर- शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाएगा,सिवाय जनगणना चुनाव और आपदा राहत जैसे सीमित कार्यों के। राज्य सरकार ने इसी अपवाद का सहारा लिया। परंतु बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि धारा 27 स्वयं में शक्ति का स्वतंत्र स्रोत नहीं है। यह केवल गैर-शैक्षणिक कार्यों पर लगी सामान्य रोक के अपवादों को दर्शाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य को स्वतः किसी भी निजी स्कूल के शिक्षक को अनिवार्य रूप से बुलाने का असीमित अधिकार मिल जाता है।
साथियों, अदालत ने आरटीई अधिनियम की धारा 24(1)(एफ) और धारा 38 का भी विस्तृत विश्लेषण किया। न्यायालय ने कहा कि यदि शिक्षकों पर अतिरिक्त दायित्व डालना है तो उसके लिए नियमों का स्पष्ट वैधानिक समर्थन आवश्यक है। अदालत के समक्ष ऐसा कोई नियम प्रस्तुत नहीं किया गया जो निजी गैर- सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना कार्य में अनिवार्य रूप से लगाने की अनुमति देता हो। इस प्रकार न्यायालय ने प्रशासनिक सुविधा और वैधानिक अधिकार के बीच स्पष्ट सीमा रेखा खींच दी।इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा के अधिकार को लेकर अदालत की चिंता रही। अदालत ने कहा कि शिक्षकों को बड़े पैमाने पर जनगणना कार्य में लगाने से नियमित शैक्षणिक गतिविधियां बाधित होती हैं और विद्यार्थियों के निर्बाध शिक्षा पाने के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के अंतर्गत शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार है। यदि शिक्षक लगातार गैर- शैक्षणिक कार्यों में व्यस्त रहेंगे तो कक्षा शिक्षण प्रभावित होना स्वाभाविक है। अदालत ने इसी संवैधानिक दृष्टिकोण को महत्व देते हुए कहा कि राज्य को प्रशासनिक आवश्यकताओं और बच्चों के शैक्षणिक हितों के बीच सटीकता से संतुलन बनाना होगा।
साथियों, राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि ये कार्य गर्मियों की छुट्टियों के दौरान कराए जा रहे हैं,इसलिए पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी। लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के आधार पर माना कि बड़ी संख्या में शिक्षकों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण तथा अन्य जनगणना प्रक्रियाओं में शामिल किया जा रहा था, जिससे शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका वास्तविक थी। अदालत ने यह भी कहा कि जनगणना जैसे कार्य सरकारी तंत्र, स्थानीय निकायों और सहायता प्राप्त संस्थानों के माध्यम से भी कराए जा सकते हैं। इसलिए निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थानों पर अनिवार्य बोझ डालना आवश्यक नहीं है।इस मामले का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों से भी जुड़ा है। संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार देता है। यदि राज्य बार-बार ऐसे संस्थानों के कर्मचारियों को गैर-शैक्षणिक सरकारी कार्यों में लगाएगा तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि अदालत ने इस पहलू को भी गंभीरता से देखा।
साथियों, यह पहला अवसर नहीं है जब अदालतों ने शिक्षकों की अनिवार्य जनगणना ड्यूटी पर प्रश्न उठाया हो। इससे पहले नागपुर खंडपीठ ने भी सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों के शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को राहत प्रदान की थी। सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन से संबद्ध स्कूलों के कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी में लगाए जाने के खिलाफ याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें जबरन इस कार्य में लगाना मनमाना है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 21 का उल्लंघन है। अदालत ने प्रारंभिक स्तर पर इस दलील को गंभीर मानते हुए संबंधित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि न्यायपालिका अब शिक्षा व्यवस्था पर गैर-शैक्षणिक बोझ को लेकर अधिक संवेदनशील होती जा रही है।दरअसल भारत में शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों में लगाने की परंपरा काफी पुरानी है। चुनावों के दौरान लाखों शिक्षक मतदान अधिकारी, प्रेक्षक, बूथ लेवल अधिकारी और गणना कर्मी के रूप में नियुक्त किए जाते हैं। कई बार यह तर्क दिया जाता है कि चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है और उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु शिक्षकों का सहयोग आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा व्यवस्था को लगातार बाधित करके ही प्रशासनिक कार्य पूरे किए जाएंगे? विकसित देशों में शिक्षकों को मुख्यतः शैक्षणिक गतिविधियों तक सीमित रखा जाता है। वहां प्रशासनिक और सांख्यिकीय कार्यों के लिए पृथक कैडर विकसित किए गए हैं। भारत में भी अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या जनगणना, सर्वेक्षण और अन्य सरकारी कार्यों के लिए अलग प्रशासनिक संसाधन विकसित किए जाने चाहिए।इस निर्णय के व्यापक सामाजिक प्रभाव भी हैं। निजी और गैर-सहायता प्राप्त स्कूल अक्सर सीमित संसाधनों में संचालित होते हैं। यदि उनके शिक्षक और कर्मचारी लंबे समय तक सरकारी कार्यों में लगाए जाते हैं तो संस्थान की अकादमिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं। छोटे विद्यालयों में तो एक-दो शिक्षकों की अनुपस्थिति भी पूरे शैक्षणिक ढांचे को बाधित कर देती है। इससे विद्यार्थियों का सीखने का स्तर गिरता है और अभिभावकों में असंतोष बढ़ता है।
साथियों, कानूनी दृष्टि से यह मामला वैधानिकप्राधिकरण की सीमा का उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है। भारतीय प्रशासनिक कानून का मूल सिद्धांत है कि कोई भी सरकारी प्राधिकारी केवल वही कार्य कर सकता है जिसकी अनुमति कानून स्पष्ट रूप से देता हो। यदि कानून में अस्पष्टता है तो राज्य अपनी सुविधा के आधार पर नागरिकों या संस्थाओं पर दायित्व नहीं थोप सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश इसी सिद्धांत की पुनर्पुष्टि करता है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि अदालत ने केवल शिक्षकों ही नहीं बल्कि गैर-शिक्षण कर्मचारियों की तैनाती पर भी रोक लगाई है। इसका अर्थ यह है कि विद्यालय एक स्वतंत्र शैक्षणिक इकाई है और उसके प्रशासनिक ढांचे को भी अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप से संरक्षित किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी भी शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ जनगणना कार्य न करने पर दंडात्मक अथवा किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
साथियों, अब 31 जुलाई 2026 को होने वाली विस्तृत सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। यदि अंतिम निर्णय भी इसी दिशा में आता है तो यह भारत की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्रणाली दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। संभव है कि भविष्य में राज्य सरकारों को जनगणना और चुनावी कार्यों के लिए अलग मानव संसाधन तंत्र विकसित करना पड़े। यह भी संभव है कि संसद या राज्य विधानसभाओं को इस विषय में स्पष्ट कानून बनाने पड़ें ताकि प्रशासनिक आवश्यकता और शिक्षा के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक अंतरिम राहत नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की मूल आत्मा की रक्षा का प्रयास प्रतीत होता है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि शिक्षक केवल प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय धुरी हैं। यदि उन्हें लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझाया जाएगा तो उसका सीधा प्रभाव आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा और देश के भविष्य पर पड़ेगा। इसलिए यह निर्णय शिक्षा की गरिमा, संवैधानिक सीमाओं और विधि के शासन—तीनों की एक साथ रक्षा करने वाला ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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