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विज़न 2047 और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का संकल्प:आदर्श और यथार्थ के बीच खड़ा धारा 17-ए का सवाल-ईमानदारी की ढाल या भ्रष्टाचार का हथियार-एक समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
January 18, 2026
in Hindi Editorials
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आज की दुनियाँ में पैसा अतिआवश्यक है। लेकीन मन का संतोष, प्रसन्नता उससे भी अधिक आवश्यक है,

सफ़लता का सिद्धांत-कम बोलिए सोच समझ कर बोलिए ऐसे शब्द बोलिए कि सामने वाला इंप्रेस हो जाए

विकसित भारत 2047 और सुशासन का संकट: -निर्धारित ड्रेसकोड पहचान पत्र नदारद- अनुशासन,जवाबदेही और प्रशासनिक संस्कृति का वैश्विक परिप्रेक्ष्य -एक समग्र विश्लेषण

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में वर्ष 2018 में केंद्र सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण संशोधन कर धारा 17-ए जोड़ी गई हैं

आधुनिक लोकतंत्रों में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार संभवतःनीतिगत फैसलों टेंडर और ठेके,लाइसेंस और अनुमति,खनन,भूमि बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ,रक्षा और सार्वजनिक खरीद में हैं,यदि इन्हीं फैसलों को जांच से बाहर कर दिया जाए,तो भ्रष्टाचार कानून का अस्तित्व ही सीमित हो जाता है -एडवोकेट किशन षणमुख दास भवानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया वैश्विक स्तरपर भारत जब अपनी आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब विज़न 2047 के तहत एक ऐसा राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया गया है जहाँ भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता केवल नारा नहीं, बल्कि शासन का मूल चरित्र हो। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में नीतिगत संकल्प तभी सफ़ल होते हैं, जब उन्हें लागू करने वाले कानूनी ढाँचे में विरोधाभास न हों।आज भारत में यही विरोधाभास भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-ए के रूप में सामने खड़ा है, जो एक ओर ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा का दावा करती है,तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार- मुक्त शासन के लक्ष्य को कमजोर करती प्रतीत होती है।मैं एडवोकेट किशन भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भ्रष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए केवल आर्थिक नुकसान का कारण नहीं होता,बल्कि यह जनता केविश्वास संस्थाओं की साख और कानून के राज को भीतर से खोखला कर देता है। विश्व बैंक, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच बार-बार यह रेखांकित कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार सीधे तौर पर गरीबी, असमानता और सामाजिक अशांति को बढ़ाता है।भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में,जहाँ करोड़ों लोग सरकारी योजनाओं और निर्णयों पर निर्भर हैं, वहाँ भ्रष्टाचार का प्रभाव और भी विनाशकारी हो जाता है।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 को इसी पृष्ठभूमि में बनाया गया था। इसका मूलउद्देश्य था लोकसेवकों को जवाबदेह बनाना रिश्वत,पद के दुरुपयोग और सत्ता के दुराचार को आपराधिक कृत्य घोषित करना,जनता के संसाधनों और अधिकारों की संवैधानिक रक्षा करना।इस अधिनियम की आत्मा यह मानकर चलती थी कि लोकसेवक का पद एक ट्रस्ट है, न कि विशेषाधिकार।वर्ष 2018 में केंद्र सरकार द्वारा इस अधिनियम में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया, जिसके तहत धारा 17-ए जोड़ी गई। इस धारा के अनुसार, किसी भी लोकसेवक के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या की गई सिफारिशों के संबंध में बिना पूर्व अनुमति कोई जांच, पूछताछ या एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती,यह अनुमति संबंधित सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी जानी होती है।सरकार का तर्क है कि हर दिन अधिकारी ऐसे निर्णय लेते हैं जिनका प्रभाव करोड़ों लोगों पर पड़ता है,हर निर्णय सभी को पसंद नहीं आता,यदि हर असंतुष्ट व्यक्ति एफआईआर दर्ज करा सके, तो इससे प्रशासन ठप हो जाएगा।अधिकारी भय के माहौल में काम करेंगे, जिससे विकास की गति धीमी होगी।सरकार के अनुसार, धारा 17-ए ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध से बचाने की एक आवश्यक ढाल है।लेकिन मूल प्रश्न: क्या सुरक्षा के नाम पर जांच पर ताला?यहीं से विवाद शुरू होता है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्वतंत्रता होती है। यदि जांच शुरू करने के लिए भी उसी शासन से अनुमति लेनी पड़े, जिसके खिलाफ जांच संभावित है, जिसकी नीतियों और फैसलों में भ्रष्टाचार की आशंका है,तो क्या यह व्यवस्था जांच को निष्पक्ष बना सकती है?आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान जांच एजेंसियों को नाममात्र की स्वतंत्रता देता है और उन्हें कार्यपालिका के अधीन कर देता है।
साथियों बात कर हम नीतिगत भ्रष्टाचार:सबसे बड़ा और सबसे अदृश्य खतरा इसको समझने की करें तो भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने तक सीमित नहीं है।आधुनिक लोकतंत्रों में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार नीतिगत फैसलों में होता है, टेंडर और ठेके,लाइसेंस और अनुमति,खनन, भूमि, बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ,रक्षा और सार्वजनिक खरीद यदि इन्हीं फैसलों को जांच से बाहर कर दिया जाए, तो भ्रष्टाचार कानून का अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है।राजनीतिक संरक्षण और हितों का टकराव-धारा 17-ए का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह राजनीतिक संरक्षण को संस्थागत रूप दे सकती है। यदि किसी मामले में सरकार स्वयं शामिल हो,या उच्च स्तर पर मिलीभगत हो,तो अनुमति मिलने की संभावना न के बराबर रह जाती है। यह स्थिति हितों के टकराव का क्लासिक उदाहरण है।
साथियों बात अगर हम सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर की गई जनहित याचिका को समझने की करें तो इसी चिंता को लेकर सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने इस17 ए धारा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हैं।याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (न्यायपूर्ण प्रक्रिया) के खिलाफ है।यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करता है।जांच में देरी से साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं,गवाह प्रभावित हो सकते हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है।जैसे-जैसे समय बीतता है,फाइलें बदली जा सकती हैं दस्तावेज गायब हो सकते हैं,डिजिटल सबूत मिटाए जा सकते हैं,गवाहों पर दबाव डाला जा सकता है।यदि जांच शुरू होने में ही महीनों लग जाएं, तो सच्चाई तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है।शिकायत करने वाले के भीतर डर का माहौल पैदा किया जाता है तो ईमानदार नागरिक भी चुप हो जाता है,इस कानून का एक अप्रत्यक्ष लेकिन गहरा प्रभाव यह भी है कि,ईमानदार अधिकारी, पत्रकार,सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के खिलाफ़ शिकायत करने से पहले सौ बार सोचने लगते हैं।यह स्थिति व्हिसलब्लोअर संस्कृति को खत्म कर देती है, जो किसी भी पारदर्शी लोकतंत्र की रीढ़ होती है।
साथियों बात अगर हम 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में खंडित फैसला सुनाए जाने को समझने की करें तो,एक माननीय जस्टिस ने धारा 17-ए को असंवैधानिक बताते हुए इसे रद्द करने की राय दी।जबिक दूसरे माननीय जस्टिस ने इसे ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हुए वैध ठहराया लेकिन लोकपाल/लोकायुक्त की भूमिका के साथ।यह विभाजन अपने आप में बताता है कि यह मुद्दा कितना जटिल और संवेदनशील है।जब सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की राय अलग-अलग होती है, तो मामला चीफ जस्टिस के पास जाता है। अब यह विषय बड़ी पीठ तय करेगी किसंविधान का कौन-सा पक्ष अधिक मजबूत है,और लोकतंत्र की दीर्घकालिक ज़रूरत क्या है।
साथियों बात अगर हम इन तीन संभावित रास्तों को समझने की करें तो पहला, धारा 17-ए को पूरी तरह रद्द कर दिया जाए।दूसरा, इसे संशोधित कर सीमित रूप में लागू किया जाए। तीसरा, एक नया संतुलित मॉडल विकसित किया जाए, जिसमें, जांच की स्वतंत्रता भी बनी रहे, और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
साथियों बातें अगर हम इस मामले परवैश्विक दृष्टिकोण: दुनियाँ क्या करती है इसको समझने की करें तो अमेरिका ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे देशों में लोकसेवकों के खिलाफ़ जांच के लिए कार्यपालिका की पूर्व अनुमति की शर्त नहीं होती।स्वतंत्र अभियोजन और न्यायिक निगरानी को प्राथमिकता दी जाती है।यही कारण है कि वहाँ नीतिगत भ्रष्टाचार पर भी कार्रवाई संभव हो पाती है।
साथियों बात कर हम विजन 2047 और आगे का रास्ता क्या और कैसे होगा इसको समझने की करेंतो,यदि भारत वास्तव में विज़न 2047 के तहत भ्रष्टाचार- मुक्त, पारदर्शी और जवाबदेह शासन चाहता है, तो उसे धारा 17-ए जैसी लीकेजेस को बंद करना होगा,जांच एजेंसियों को वास्तविक स्वतंत्रता देनी होगी, और राजनीतिकइच्छाशक्ति को कानूनी ढांचे में बदलना होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सुरक्षा और जवाबदेही का संतुलन-ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर जांच को बंधक बनाना लोकतंत्र के लिए घातक है।भ्रष्टाचार से लड़ाई में कानून को ढाल नहीं, तलवार बनना होगा। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ पर हैं,जिसका फैसला न केवल धारा 17-ए का भविष्य तय करेगा,बल्कि यह भी बताएगा कि भारत का लोकतंत्र 2047 की ओर किस दिशा में बढ़ेगा।

kishan2
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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