शब्दों की शक्ति,विचारों की परिपक्वता और सफलता का शाश्वत सिद्धांत
इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक युद्ध तलवारों से नहीं, बल्कि शब्दों से प्रारंभ हुए हैं और अनेक संघर्ष संवाद से समाप्त हुए हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय। संत कबीर का यह दोहा केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सफल जीवन का मूलमंत्र है। मानव जीवन में सफलता केवल ज्ञान, धन, पद या प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होती है कि व्यक्ति अपने विचारों को किस प्रकार व्यक्त करता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक युद्ध तलवारों से नहीं, बल्कि शब्दों से प्रारंभ हुए हैं और अनेक संघर्ष संवाद से समाप्त हुए हैं। इसलिए शब्दों को सृजन और विनाश दोनों का आधार माना गया है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत अपनी बेबाक अभिव्यक्ति, संवाद संस्कृति और विचारशील परंपरा के लिए जाना जाता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत की कोई भी राय केवल एक राष्ट्र की राय नहीं होती, बल्कि करोड़ों नागरिकों की सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति होती है। यही कारण है कि विश्व समुदाय भारत के विचारों को गंभीरता से सुनता और उनका विश्लेषण करता है। किंतु आज के तीव्र गति वाले डिजिटल युग में बिना सोचे- समझे प्रतिक्रिया देना, अधूरी जानकारी पर राय बना लेना और भावनाओं के प्रभाव में शब्दों का प्रयोग करना एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। परिणामस्वरूप अनेक छोटी-छोटी बातें बड़े विवादों का रूप धारण कर लेती हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम किसी भी विषय पर राय बनाने से पहले तथ्यों का विवेकपूर्ण अध्ययन करें, परिस्थितियों का मूल्यांकन करें और फिर संतुलित शब्दों में अपनी बात रखें।
साथियों, हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अथवा पारिवारिक विषयों पर विचारों की विविधता लोकतंत्र की आत्मा है। किंतु राय बनाना केवल प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाना भी है। अक्सर देखा जाता है कि लोग अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं और बाद में वही निष्कर्ष विवादों का कारण बन जाते हैं। सोशल मीडिया के युग में यह समस्या और भी गंभीर हो गई है, जहाँ एक समाचार, एक वीडियो या एक कथन को बिना सत्यापन के स्वीकार कर लिया जाता है और उस पर तुरंत प्रतिक्रिया दे दी जाती है। विवेकशील व्यक्ति किसी भी विषय को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखता है, तथ्यों का परीक्षण करता है और उसके बाद अपनी राय व्यक्त करता है। यही परिपक्वता व्यक्ति को भीड़ से अलग पहचान दिलाती है।
साथियों, सफल व्यक्तित्वों में एक विशेष गुण पाया जाता है,वे आवश्यकता से अधिक नहीं बोलते। वे जानते हैं कि कम शब्दों में कही गई सारगर्भित बात का प्रभाव अधिक होता है। कम बोलना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसंयम और बुद्धिमत्ता का परिचायक है। जो व्यक्ति हर विषय पर बिना सोचे बोलता है, उसकी बातों का महत्व धीरे-धीरे कम हो जाता है, जबकि जो व्यक्ति सोच-समझकर बोलता है, उसकी प्रत्येक बात को गंभीरता से सुना जाता है। वास्तव में बुद्धिमान व्यक्ति प्रतिक्रिया देने से पहले परिस्थिति को समझता है, जबकि अपरिपक्व व्यक्ति परिस्थिति को समझने से पहले प्रतिक्रिया दे देता है। यही अंतर सफलता और असफलता के बीच की दूरी सटीकता से तय करता है।
साथियों, व्यक्ति के शब्द उसके व्यक्तित्व का दर्पण होते हैं। हमारी भाषा, हमारे संस्कारों, विचारों और भावनाओं का परिचय देती है। जीवन में हम अनेक प्रकार की परिस्थितियों से गुजरते हैं पारिवारिक संवाद, सामाजिक संबंध, व्यावसायिक बैठकें, सार्वजनिक मंच, मित्रों के साथ बातचीत और मतभेद की स्थितियाँ। प्रत्येक स्थान पर शब्दों का चयन हमारी छवि का निर्माण करता है। एक ही बात को दो अलग-अलग तरीकों से कहा जा सकता है। पहला तरीका सामने वाले को आहत कर सकता है, जबकि दूसरा तरीका उसी बात को सम्मानपूर्वक स्वीकार्य बना सकता है। इसलिए बोलने से पहले स्वयं से यह पूछना चाहिए कि जो मैं कहने जा रहा हूँ, क्या वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है? क्या उसे और बेहतर तरीके से कहा जा सकता है? और क्या उससे किसी की गरिमा को ठेस तो नहीं पहुँचेगी? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हों, तभी शब्दों को वाणी का रूप देना उचित होगा।
साथियों,मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य यह भी है कि शारीरिक घाव समय के साथ भर जाते हैं, लेकिन कटु शब्दों के घाव वर्षों तक स्मृति में बने रहते हैं। कई बार मजाक, व्यंग्य, क्रोध अथवा आवेश में कहे गए शब्द किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचा देते हैं। बाद में चाहे कितनी भी सफाई दी जाए, उन शब्दों का प्रभाव समाप्त नहीं होता। विशेष रूप से क्रोध की अवस्था में बोले गए शब्द अक्सर जीवनभर के पछतावे का कारण बनते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति में क्रोध के समय मौन रहने और धैर्यपूर्वक विचार करने की सलाह दी गई है। यदि किसी को सलाह दी जाए तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमारे शब्दों से उसके आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचे। सही शब्दों का चयन आदेश को भी निवेदन में परिवर्तित कर सकता है और बिना किसी के अहं को आहत किए कार्य संपन्न करा सकता है।
साथियों, संवाद की सफलता केवल बोलने में नहीं, बल्कि सुनने में भी निहित होती है। आज अधिकांश लोग समझने के लिए नहीं, बल्कि उत्तर देने के लिए सुनते हैं। यही अनेक विवादों की जड़ है। जब हम किसी की बात पूरी सुने बिना निष्कर्ष निकाल लेते हैं, तब गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं। प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले लोग पहले ध्यानपूर्वक सुनते हैं, फिर विचार करते हैं और उसके बाद अपनी बात रखते हैं। सुनना केवल शब्दों को ग्रहण करना नहीं है, बल्कि सामने वाले की भावनाओं, परिस्थितियों और दृष्टिकोण को समझने की प्रक्रिया है। यही गुण संवाद को विवाद बनने से रोकता है और संबंधों को सटीकता से मजबूत बनाता है।
साथियों, हर व्यक्ति के पास विचार होते हैं, किंतु हर व्यक्ति उन्हें प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाता। यही कारण है कि कुछ लोग भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, जबकि कुछ लोग भीड़ का नेतृत्व करने लगते हैं। प्रभावशाली राय रखने वाले लोग अपनी बात तथ्यों, तर्कों और संतुलित भाषा के साथ प्रस्तुत करते हैं। वे किसी को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करते, बल्कि समझाने का प्रयास करते हैं। उनकी भाषा में आक्रामकता नहीं, आत्मविश्वास होता है; अहंकार नहीं, विनम्रता होती है; और शोर नहीं, स्पष्टता होती है। यही गुण उन्हें सम्मान और स्वीकार्यता दिलाते हैं।
साथियों, संत कबीर की वाणी और भारतीय महाकाव्य महाभारत दोनों हमें शब्दों की शक्ति का महत्व समझाते हैं। इतिहास और साहित्य इस बात के साक्षी हैं कि शब्द संबंधों को जोड़ भी सकते हैं और तोड़ भी सकते हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है—”शब्द तीर की तरह होते हैं, एक बार निकल जाएँ तो वापस नहीं आते।” इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि शब्दों को बोलने से पहले परखा जाए, क्योंकि बाद में उन्हें वापस लेना संभव नहीं होता। हम अक्सर बिना पूरी बात समझे किसी की बात को गलत कह देते हैं, क्योंकि हम समझने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने के लिए सुनते हैं। यह प्रवृत्ति हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है कि हम अपने संवाद को अधिक परिपक्व और सकारात्मक बनाएं।आज का युग वैश्विक संचार का युग है। एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात कुछ ही क्षणों में पूरी दुनिया तक पहुँच सकती है। ऐसे समय में शब्दों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। सोशल मीडिया, सार्वजनिक मंचों और निजी जीवन में कही गई बातें व्यक्ति की प्रतिष्ठा, संगठन की छवि और कभी-कभी राष्ट्र की गरिमा तक को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए संयमित, तथ्यपरक और सकारात्मक संवाद समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। हमें अपने कहे गए शब्दों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। यदि हमारी किसी बात से किसी की भावनाएँ आहत होती हैं तो हमें बहाने बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। यही व्यवहार हमें सम्मान और विश्वास का पात्र बनाता है।
अतः यदि हम सम्पूर्ण विश्लेषण का सार निकालें तो स्पष्ट होता है कि सफलता का सबसे प्रभावी सिद्धांत है-कम बोलना, सोच-समझकर बोलना और ऐसे शब्दों का चयन करना जो सम्मान, विश्वास और सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करें। किसी भी विषय पर राय बनाने से पहले विवेकपूर्ण चिंतन, तथ्यों का परीक्षण और परिस्थितियों का सम्यक मूल्यांकन आवश्यक है। छोटी-सी असावधानी कई बार बड़े विवादों का कारण बन जाती है, जबकि कुछ क्षणों का धैर्य और विचारशीलता जीवनभर के सम्मान का आधार बन सकती है। इसलिए बोलने से पहले सोचिए, सोचने से पहले समझिए और समझने से पहले सुनिए। यही सफल संवाद, प्रभावशाली व्यक्तित्व और श्रेष्ठ जीवन का शाश्वत मार्ग है। वास्तव में वाणी वह आभूषण है जो बिना मूल्य के प्राप्त होता है, किंतु उसका सही उपयोग व्यक्ति को अमूल्य बना देता है।
