मनुष्य तृष्णा में जीता है,फिर भी सुख को खोजता है,
हाथों में सब कुछ होते हुए,मन खाली-खाली सोचता है।
एक इच्छा पूरी होती है,दूसरी जन्म ले जाती है,
इसी अंतहीन चाहत में,जीवन की खुशी खो जाती है।
धन आया तो यश की चाह,यश मिला तो मान की चाह,
मान मिला तो सत्ता की चाह,फिर भी मन में रहती आह।
जिसे मिला उसे कम समझा,जो नहीं मिला वही प्यारा,
तृष्णा ने सुख छीन लिया,दुःख ने मन को घेरा सारा।
महल मिले तो और बड़ा हो,साधन मिले तो और मिले,
मन की प्यास बुझती नहीं,चाहे कितने सुख साथ चले।
कल की चिंता,आज की चाहत,बीते कल का पछतावा,
इंसान स्वयं ही ढोता रहता,इच्छाओं का भारी बंधावा।
संतोष जहाँ ठहर जाता है,वहीं खुशी मुस्काती है,
छोटी-सी रोटी भी फिर अमृत बनकर मन को भाती है।
जो मिला उसे प्रसाद समझकर,जिसने चाहत को थाम लिया
उसने थोड़े में सुख पाया,जीवन का अर्थ जान लिया।
तृष्णा को जितना सींचोगे,उतनी ही वह बढ़ती जाएगी,
मन की धरती सूखती जाएगी,प्यास कभी न मिट पाएगी।
किशन सुख वस्तुओं में नहीं छिपा,बात अगर मन मान ले,
सब कुछ होते भी दुखी इंसान,संतोष से सुख पहचान ले।
