आओ मन के विकार दूर करें,हृदय पवित्र करें,
ईर्ष्या-द्वेष की कालिख मिटाकर,अंतर्मन उज्ज्वल करें।
क्रोध-अहंकार को त्यागकर,प्रेम की गंगा बहाएँ,
अपने भीतर दीप जलाकर,जीवन को निर्मल बनाएँ।
लोभ-मोह की बेड़ियाँ तोड़ें,सत्य का दामन थामें,
झूठ-कपट से दूर रहें,नेक कर्मों को नामें।
मन में दया,वाणी में मधुरता,व्यवहार में अपनापन हो,
हर धड़कन में प्रेम बहे और हर चेहरे पर मुस्कान हो।
मन मंदिर है,इसे मैला करने वाले भाव मिटाएँ,
दुःख देने वाले शब्दों की जगह,मधुर वचन अपनाएँ।
दूसरों की खुशियों में खुश हों,परहित को धर्म बनाएँ,
जिस राह से प्रेम मिले जग को,उसी पर कदम बढ़ाएँ।
मन निर्मल होगा तो जीवन में सच्चा प्रकाश आएगा,
अंदर का अंधकार मिटेगा,हर पल विश्वास जगाएगा।
किशन क्षमा को शक्ति बनाएँ,करुणा को गहना करें
नफ़रत की दीवारें तोड़कर,प्रेम का बसेरा करें।
