भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में लीकेज का प्रश्न: कालाहांडी उड़ीसा के आईएएस अधिकारी धीमान चकमा की पुर्निनियुक्ति व इंजीनियर बैकुंठ नाथ बेहरा के मामलों से उठते गंभीर सवाल?
भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रमुख कानूनी अधिनियमों नियमों विनिममों क़े ढांचे में अभियोजन स्वीकृति, धाराओं में लीकेज से निलंबन समाप्त, सेवा बहाल लाभ गंभीर त्रुटियां-जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए कठोर संशोधन अनिवार्य? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतांत्रिक शासन की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार जनता का सरकार तथा प्रशासनिक तंत्र पर विश्वास होता है।जब कोई सरकारी अधिकारी या लोकसेवक भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार होता है, उसके खिलाफ जांच होती है, अदालतों में मामला चलता है, और फिर वर्षों बाद तकनीकीआधारों प्रक्रियागत कमियों या साक्ष्यों की कमजोरियों के कारण वह दंडित होने के बजाय पुनःसेवा में लौट आता है, या फ़िर अधिनियमों नियमों विनियमों सेवा शर्त अधिनियम में ही ऐसी धाराएं उल्लेखित हो जिसमें कुछ समय के बाद उसकी फ़िर नियुक्ति संभव हो जाती है तब आम नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भ्रष्टाचार-विरोधी व्यवस्था वास्तव में प्रभावी है? आज हम यह प्रश्न इसीलिए उठा रहे हैं क्योंकि जून माह के प्रथम सप्ताह में ओडिशा के दो चर्चित भ्रष्टाचार मामलों ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली और उसकी कानूनी सीमाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद अंतिम दोषसिद्धि नहीं हो सकी अथवा अभियोजन प्रक्रिया कमजोर पड़ गई। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं एक वकील होने के नाते लंबे समय से यह महसूस कर रहा हूं तथा केंद्र व राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि इससे यह धारणा मजबूत होती ज़ा रही है कि वर्तमान भ्रष्टाचार- निरोधी कानूनों, नियमों,विनियमों तथा सेवा अनुशासन संबंधी प्रावधानों में अनेक प्रक्रियात्मक कमियां और कानूनी लीकेज मौजूद हैं, जिनका लाभ आरोपी अधिकारियों को मिल जाता है।इसलिए समय की मांग है कि भ्रष्टाचार विरोधी लंबी लंबी बातें करने जनजागरण जनजाग़रण करने अनेक सभाओं में भ्रष्टाचार को समाप्त करने की डीगें हाकने के बजाय इन कानूनों और नियमों की व्यापक समीक्षा कर उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप अधिक कठोर, पारदर्शी और परिणामोन्मुख तथा पिछले जजमेंट, जिसमें भ्रष्टाचार के आरोपी छूट गए हैं उन कमियों का अध्ययन कर उसके आधार पर विभिन्न नियमों व नियमों धाराओं के लीकेज को संशोधित कर आधुनिक डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक युग के अनुसार बनाया जाए ताकि भ्रष्टाचार में फंसे व्यक्ति को छूटने यानें एक्विट्टल होने की कोई उम्मीद ना बचे।
साथियों मीडिया में आई रिपोर्ट्स के अनुसार ओडिशा के दो चर्चित भ्रष्टाचार मामलों ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली और उसकी कानूनी सीमाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।पहला मामला 2021 बैच के आईएएस अधिकारी एवं तत्कालीन धर्मगढ़ उपजिलाधिकारी धीमान चकमा का है, जिन्हें जून 2025 में ओडिशा विजिलेंस विभाग ने कथित रूप से एक व्यवसायी से 10 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों के अनुसार उन पर कुल 20 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप था तथा गिरफ्तारी के बाद उनके सरकारी आवास से लगभग 47 लाख रुपये की अतिरिक्त नकदी भी बरामद की गई।गिरफ्तारी के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज हुआ। इसके बावजूद न्यायिक प्रक्रिया लंबित रहने तथा अंतिम दोषसिद्धि न होने के कारण बाद में उन्हें पुनः सेवा में बहाल कर राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग में उप सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है दूसरा मामला सहायक कार्यपालक अभियंता बैकुंठ नाथ बेहरा का है, जिनके विरुद्ध 2026 में आय से अधिक संपत्ति की जांच के दौरान ओडिशा विजिलेंस ने कई स्थानों पर छापेमारी की। जांच में उनके पास से 2 करोड़ रुपये से अधिक नकदी, सैकड़ों ग्राम सोना,अनेक बैंक जमा, पांच बहुमंजिला इमारतें तथा 13 से अधिक भूखंड मिलने के आरोप सामने आए। बताया गया कि उन्होंने 1999 में मात्र 6000 रुपये मासिक वेतन पर जूनियर इंजीनियर के रूप में सेवा शुरू की थी, जबकि छापों में करोड़ों रुपये की संपत्तियों का खुलासा हुआ।बाद में उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और मामले की जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद भारतीय सेवा नियमों में अंतिम न्यायिक निर्णय से पहले अधिकारियों को स्थायी रूप से सेवा से पृथक करना कठिन क्यों है तथा क्या वर्तमान व्यवस्था में ऐसे प्रक्रियागत छिद्र मौजूद हैं जिनका लाभ आरोपी अधिकारी सटीकता से उठा सकते हैं।
साथियों भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रमुख कानूनी ढांचा मुख्यतःभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (प्रेवेंशन ऑफ़ कर्रप्शन एक्ट,1988), लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013, केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003, केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, विभिन्न राज्य सेवा नियम, ऑल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स,1969,भारतीय न्याय संहिता (पूर्व में भारतीय दंड संहिता), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023) आदि से मिलकर बनता है। इन सभी का उद्देश्य लोकसेवकों को जवाबदेह बनाना और भ्रष्टाचार को दंडित करना है। किंतु व्यवहार में देखा गया है कि दोषसिद्धि की दर अपेक्षाकृत कम रहती है, जिसके कारण इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
साथियों, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में सबसे अधिक चर्चा अभियोजन स्वीकृति (सेंशनस फॉर प्रोसेक्युशन) से जुड़ी रही है। किसी लोकसेवक के विरुद्ध मुकदमा चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है। मूल उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाना था,किंतु अनेक मामलों में यह प्रावधान संभवत मिली भगत से मुकदमा चलाने में देरी या अवरोध का कारण बनता है। कई बार स्वीकृति देने में महीनों अथवा वर्षों का समय लग जाता है, जिससे साक्ष्य कमजोर हो जाते हैं और जांच प्रभावित होती है। सुधार के रूप में यह विचार किया जा सकता है कि निर्धारित समय-सीमा के भीतर स्वीकृति न मिलने पर उसे स्वीकृत माना जाए तथा स्वीकृति प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए।दूसरी बड़ी समस्या जांच और अभियोजन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। कई मामलों में जांच एजेंसी द्वारा एकत्रित साक्ष्य न्यायालय में अभियोजन के दौरान प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किए जा पाते। गवाह मुकर जाते हैं, दस्तावेजी श्रृंखला टूट जाती है या तकनीकी त्रुटियों के कारण साक्ष्य स्वीकार्य नहीं रह जाते। परिणामस्वरूप आरोपी को संदेह का लाभ मिल जाता है।इसलिए विशेष भ्रष्टाचार न्यायालयों में प्रशिक्षित अभियोजकों, डिजिटल साक्ष्य विशेषज्ञों और वित्तीय जांच विशेषज्ञों की नियुक्ति आवश्यक है।
साथियों, ऑल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स,1969 तथा अन्य सेवा नियमों का उद्देश्य प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखना है। किंतु इन नियमों में भी कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिनके कारण विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमा अलग- अलग दिशाओं में चलते हैं। कई बार आपराधिक मुकदमा लंबित होने के बावजूद अधिकारी विभागीय प्रक्रिया में राहत प्राप्त कर लेते हैं। कुछ परिस्थितियों में निलंबन समाप्त हो जाता है, पदोन्नति पर विचार किया जाता है या सेवा लाभ बहाल हो जाते हैं। यद्यपि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हो सकता है, लेकिन जनता की दृष्टि में यह संदेश जाता है कि गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारी को लाभ मिल रहा है। इसलिए आवश्यक है कि गंभीर भ्रष्टाचार मामलों में अंतिम निर्णय तक पदोन्नति और संवेदनशील पदों पर नियुक्ति के संबंध में अधिक स्पष्ट और सटीकता से कठोर दिशानिर्देश बनाए जाएं।
साथियों, भ्रष्टाचार मामलों में एक अन्य प्रमुख समस्या मुकदमों का अत्यधिक लंबा चलना है। कई मामलों में जांच, आरोपपत्र, सुनवाई और अंतिम निर्णय में दस से पंद्रह वर्ष तक लग जाते हैं। इस अवधि में गवाहों की स्मृति कमजोर हो जाती है, कुछ गवाह उपलब्ध नहीं रहते और साक्ष्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है। न्यायिक विलंब अंततः आरोपी और अभियोजन दोनों के लिए समस्या बन जाता है। इसलिए विशेष भ्रष्टाचारन्यायालयों को समयबद्ध सुनवाई की कानूनी बाध्यता दी जानी चाहिए, जैसा कि कुछ अन्य विशेष कानूनों में किया गया है।संपत्ति के अनुपातहीन अर्जन (डिस्प्रिपोरशनेट एसेट्स) के मामलों में भी कई बार तकनीकी विवाद उत्पन्न हो जाते हैं।आय के स्रोतों की व्याख्या, पारिवारिक संपत्ति, उपहार, निवेश तथा अन्य वित्तीय लेन-देन को लेकर लंबी बहस चलती है।आधुनिक वित्तीय अपराधों को देखते हुए वित्तीय फॉरेंसिक ऑडिट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित लेन-देन विश्लेषण और डिजिटल संपत्ति ट्रैकिंग को कानूनी रूप से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। इससे भ्रष्टाचार के जटिल मामलों में जांच अधिक प्रभावी हो सकती है।
साथियों, भ्रष्टाचार के मामलों में गवाह संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण विषय है। कई बार शिकायतकर्ता या गवाह दबाव, भय या प्रलोभन के कारण अपने बयान बदल देते हैं। यदि गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा, पहचान की गोपनीयता और कानूनी संरक्षण मिले तो अभियोजन की सफलता की संभावना बढ़ सकती है।विकसित देशों में व्हिसलब्लोअर संरक्षण प्रणाली ने भ्रष्टाचार उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में भी इस क्षेत्र में और अधिक मजबूती की आवश्यकता है।लोकपाल, लोकायुक्त और सतर्कता संस्थाओं की स्वतंत्रता भी भ्रष्टाचार-विरोधी व्यवस्था की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। यदि जांच एजेंसियां प्रशासनिक या राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं होंगी, तो जनता का विश्वास प्रभावित होगा। इसलिए इन संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन, तकनीकी क्षमता और संस्थागत स्वतंत्रता प्रदान करना आवश्यक है।यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल आरोप लगना और दोषसिद्धि होना दो अलग-अलग बातें हैं। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और निर्दोष माने जाने का अधिकार देता है। इसलिए किसी भी सुधार का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करना नहीं होना चाहिए। कठोरता और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि केवल जनभावना के आधार पर दंडात्मक व्यवस्था बनाई जाएगी तो निर्दोष अधिकारियों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए सुधारों का आधार प्रमाण, पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया होना चाहिए।
साथियों,भविष्य की भ्रष्टाचार- विरोधी नीति में तकनीक का उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ई- गवर्नेंस,डिजिटल फाइल ट्रैकिंग, ब्लॉकचेन आधारित रिकॉर्ड प्रबंधन, ऑनलाइन निविदा प्रणाली, रियल-टाइम ऑडिट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जोखिम विश्लेषण भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम कर सकते हैं। विश्व के कई देशों ने मानव विवेकाधिकार को सीमित करके और प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाकर भ्रष्टाचार में उल्लेखनीय कमी की है।यदि भारत को 21वीं सदी की वैश्विक आर्थिक शक्ति बनना है, तो केवल नए कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, लोकपाल व्यवस्था, सतर्कता तंत्र, सेवा अनुशासन नियमों तथा ऑल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1969 की व्यापक समीक्षा की जाए। अभियोजन स्वीकृति, विभागीय कार्रवाई, पदोन्नति, निलंबन, गवाह संरक्षण, डिजिटल साक्ष्य, समयबद्ध न्याय और संपत्ति जब्ती जैसे क्षेत्रों में आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधन किए जाएं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक दंड न मिले और दोषी व्यक्ति कानूनी तकनीकीताओं का अनुचित लाभ लेकर बच न सके।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल कानूनों की कठोरता से नहीं जीती जा सकती, बल्कि उनकी प्रभावी क्रियान्वयन क्षमता, त्वरित न्याय, निष्पक्ष जांच और जनता के विश्वास से जीती जाती है। जब आम नागरिक यह महसूस करेगा कि भ्रष्टाचार का आरोपी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के समक्ष उत्तरदायी होगा और दोष सिद्ध होने पर निश्चित दंड प्राप्त करेगा, तभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास मजबूत होगा। इसलिए वर्तमान समय में भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों, नियमों, विनियमों और सेवा नियमों की गहन समीक्षा तथा आवश्यक संशोधन केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और सुशासन की अनिवार्य शर्त बन चुके हैं।
