मन ही सबसे बड़ा न्यायालय,
यहीं सत्य का फैसला होता है,
दुनियाँ चाहे कुछ भी कह दे,
मन सब सच पहचानता है।
अंतरात्मा जब प्रश्न उठाए,
झूठ कहाँ फिर टिक पाता है,
सही-गलत की हर परछाईं,
मन के दर्पण में दिख जाती है।
धन-दौलत से न्याय न खरीदें,
पद से सत्य नहीं बदलता है,
मन के भीतर बैठा न्यायाधीश,
हर कर्म का लेखा रखता है।
दुनियाँ से हम छिपा सकें तो,
मन से कैसे छिप पाएँगे,
कर्मों की हर एक कहानी,
मन के सम्मुख दोहराएँगे।
इसलिए मन को निर्मल रखना,
सत्य-धर्म की राह चलाएँ,
किशन सबसे बड़ा न्यायालय मन है,
इसका फैसला शिरोधार्य बनाएँ।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

