कर्मों का बोझ जब दिल को सताता है,
हर रास्ता धुंधला-सा नज़र आता है,
सतगुरु की रहमत जब सिर पर बरसती है,
भारी से भारी गठरी भी हल्की हो जाती है।
मन के अंधेरों में जब दीप जलाते हैं,
अपने भीतर के दोष नज़र आते हैं,
सतगुरु की कृपा जब राह दिखाती है,
भटकी हुई आत्मा मंज़िल पा जाती है।
न दौलत काम आती,न जग का सहारा,
जब कर्मों का हिसाब हो सबसे न्यारा,
सतगुरु की शरण में जो शीश झुकाता है,
वह रहमत से जीवन का भार घटाता है।
गलतियों का बोझ दिल से उतर जाता है,
अहंकार का पर्दा धीरे-धीरे हट जाता है,
जिस हृदय में सतगुरु का नाम बस जाता है,
उसका हर कर्म सेवा बन जाता है।
न माँगूँ मैं दुनियाँ,न सुखों का खज़ाना,
बस चरणों में मिले सतगुरु का ठिकाना,
किशन रहमत यूँ ही सबके जीवन पर बरसती रहे,
कर्मभार हल्का हो,आत्मा निर्मल होती रहे।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

