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पश्चिम बंगाल प्रथम चरण चुनाव 2026-केवल एक राज्य का चुनाव नहीं बल्कि यह लोकतांत्रिक भागीदारी, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक गतिशीलता का एक जीवंत प्रयोग बन चुका है।

by Page 3 News International Desk
April 25, 2026
in Hindi Editorials
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पश्चिम बंगाल चुनाव में साइलेंट वोटर का प्रभाव भी चर्चा- ये वे मतदाता,जो सार्वजनिक रूप से अपनीराजनीतिक पसंद व्यक्त नहीं करते,मतदान के दिन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

पश्चिम बंगाल में लगभग 93 प्रतिशत औसत मतदान व कई विधानसभा क्षेत्रों में 98 प्रतिशत तक मतदान केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं बल्कि यह लोकतांत्रिक ऊर्जा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और मतदाताओं की असाधारण सक्रियता का संकेतक है- एडवोक़ेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही तीव्र भावनाओं,जटिल सामाजिक समीकरणों और उच्च स्तर की जनभागीदारी के लिए जानी जाती रही है,लेकिन 23 अप्रैल 2026 को हुए मतदान और 24 अप्रैल 2026 को सामने आए पहले चरण के मतदान के आंकड़ों ने इस परंपरा को एक नए शिखर पर पहुंचा दिया है। लगभग 93 प्रतिशत औसत मतदान और कई विधानसभा क्षेत्रों में 98 प्रतिशत से अधिक मतदान केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक ऊर्जा,राजनीतिक ध्रुवीकरण और मतदाताओं की असाधारण सक्रियता का संकेतक है।इस अभूतपूर्व मतदान ने न केवल राज्य के भीतर राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया है,बल्कि राष्ट्रीय स्तरपर भी चुनावी विश्लेषकों, राजनीतिक दलों और नीति निर्माताओं के बीच गहन चर्चा को जन्म दिया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि सबसे पहले इस रिकॉर्ड मतदान के स्वरूप को समझना आवश्यक है।2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लगभग 83.2 प्रतिशत मतदान हुआ था,जिसे उस समय भी उच्च माना गया था। इसके मुकाबले 2026 में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि केवल प्राकृतिक उतार-चढ़ाव नहीं मानी जा सकती।यह वृद्धि संकेत देती है कि इसबार क़ा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बनाए रखने का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं के लिए पहचान,सुरक्षा विकास और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा व्यापक जनमत संग्रह बन चुका है। जब मतदान प्रतिशत 90 के पार जाता है, तो आमतौर पर यह माना जाता है कि समाज के वे वर्ग भी मतदान में शामिल हुए हैं, जो सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं।
साथियों बात अगर हम इस बढ़ी हुई भागीदारी के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं इसको समझने की करें तो पहला और सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक ध्रुवीकरण। पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से वैचारिक और सामाजिक विभाजन तीखा हुआ है, उसने मतदाताओं को निष्क्रिय रहने की गुंजाइश नहीं छोड़ी। दूसरा कारक है महिला मतदाताओं की अभूतपूर्व भागीदारी। रिपोर्ट्स के अनुसार कई क्षेत्रों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा,जो यह संकेत देता है कि कल्याणकारी योजनाएं, सुरक्षा का मुद्दा और सामाजिक सम्मान जैसे विषय निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। तीसरा महत्वपूर्ण तत्व है प्रशासनिक सख्ती और सुरक्षा व्यवस्था,जिसे इलेक्शन कमिशन ऑफ़ इंडिया ने लागू किया। केंद्रीय बलों की तैनाती, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और बूथ स्तर पर पारदर्शिता ने मतदाताओं में विश्वास बढ़ाया।अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस बंपर मतदान का राजनीतिक लाभ किसे मिल सकता है। पारंपरिक चुनावी विश्लेषण कहता है कि जब मतदान प्रतिशत बढ़ता है, तो यह अक्सर सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) का संकेत होता है। इसका कारण यह है कि असंतुष्ट मतदाता अधिक संख्या में मतदान के लिए बाहर निकलते हैं। यदि इस सिद्धांत को लागू किया जाए, तो विपक्षी दलों को इसका लाभ मिल सकता है। लेकिन पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य इतना सरल नहीं है। यहां सत्तारूढ़ दल की जमीनी पकड़, संगठनात्मक ताकत और लाभार्थी योजनाओं का प्रभाव भी सटीक रूप से अत्यंत गहरा है।
साथियों बात अगर हम इसको उदाहरण के रूप में समझने की करें तो उदाहरण के लिए, यदि ग्रामीण क्षेत्रों और महिला मतदाताओं में वृद्धि अधिक है, तो इसका लाभ सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है,क्योंकि ये वर्ग अक्सर सरकारी योजनाओं से सीधे प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर, यदि शहरी क्षेत्रों, युवा मतदाताओं और पहली बार वोट देने वालों की भागीदारी में अधिक वृद्धि हुई है, तो यह विपक्ष के पक्ष में जा सकता है, क्योंकि ये वर्ग परिवर्तन की मांग अधिक करते हैं। इस प्रकार, केवल उच्च मतदान प्रतिशत को देखकर किसी एक पार्टी के पक्ष में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।क्षेत्रीय विश्लेषण भी बेहद महत्वपूर्ण है। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में उच्च मतदान यह संकेत दे सकता है कि अल्पसंख्यक समुदाय ने रणनीतिक रूप से मतदान किया है। यह मतदान किस दिशा में गया, यह परिणामों में स्पष्ट होगा, लेकिन यह तय है कि इन क्षेत्रों का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक रहेगा। दूसरी ओर,दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी जैसे उत्तर बंगाल के क्षेत्रों में उच्च मतदान क्षेत्रीय मुद्दों,पहचान कीराजनीति और विकास के सवालों को प्रमुखता देता है।इस चुनाव में साइलेंट वोटर का प्रभाव भी चर्चा का विषय है। ये वे मतदाता होते हैं जो सार्वजनिक रूप से अपनी राजनीतिक पसंद व्यक्त नहीं करते, लेकिन मतदान के दिन निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उच्च मतदान अक्सर इस वर्ग की सक्रियता को दर्शाता है। यही कारण है कि चुनावी पंडित इस बार के परिणामों को लेकर असमंजस में हैं।
साथियों बात अगर हम अब एक और महत्वपूर्ण दावा जो सामने आ रहा है, वह यह है कि क्या इसको समझने की करें तो इलेक्शन कमिशन ऑफ़ इंडिया ने प्रत्येक चुनाव में 10 प्रतिशत अधिक मतदान सुनिश्चित करने में सफलता प्राप्त की है। इस दावे को तथ्यों की कसौटी पर परखना आवश्यक है। चुनाव आयोग ने पिछले कुछ वर्षों में मतदाता जागरूकता अभियान, डिजिटल रजिस्ट्रेशन, बूथ सुविधाओं में सुधार और महिलाओं व दिव्यांग मतदाताओं के लिए विशेष प्रबंध जैसे कई कदम उठाए हैं।इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से देखा गया है, लेकिन हर चुनाव में 10 प्रतिशत की वृद्धि एक सामान्य पैटर्न नहीं है। यह वृद्धि स्थानीयराजनीतिक परिस्थितियों,मुद्दों औरप्रतिस्पर्धा की तीव्रता पर अधिक निर्भर करती है।इसी संदर्भ में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न देने की मांग का मुद्दा भी चर्चा में है। यह मांग मुख्यतः भावनात्मक और राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आई है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए व्यापक, दीर्घकालिक और बहुआयामी योगदान का मूल्यांकन किया जाता है। केवल एक चुनाव में उच्च मतदान प्रतिशत को इस सम्मान का आधार बनाना संस्थागत दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि, यह तथ्य अवश्य है कि यदि चुनाव आयोग ने निष्पक्षता, पारदर्शिता और भागीदारी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तो उसकी सराहना की जानी चाहिए।
साथियों बात अगर हम इस पूरे परिदृश्य का अंतरराष्ट्रीय महत्व भी कम नहीं है इसको समझने की करें तो,यदि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान लगातार होने लगे,तो यह विश्व लोकतंत्र के लिए एक मिसाल बन सकता है।कई विकसित लोकतंत्रों में भी मतदान प्रतिशत 60-70 के बीच रहता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल का यह अनुभव वैश्विक स्तर पर अध्ययन का विषय बन सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि, यह कहना उचित होगा कि पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक भागीदारी, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक गतिशीलता का एक जीवंत प्रयोग बन चुका है। 93 प्रतिशत का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उस ऊर्जा का प्रतीक है जो भारतीय लोकतंत्र को जीवित और सक्रिय रखती है। अब सबकी निगाहें मतगणना के दिन पर टिकी हैं, जब यह स्पष्ट होगा कि इस ऐतिहासिक मतदान ने सत्ता की दिशा किस ओर मोड़ी है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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