खुलकर हंसना,मुस्कुराना और प्रसन्न रहना चाहिए -मन की प्रसन्नता स्वयं सृजित की हुई दवा के समान है
वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल आर्थिक समृद्धि नहीं,बल्कि प्रसन्न मन, संतुलित जीवन, स्वस्थ संबंध, पड़ोस में अपनापन,परिवार में संवाद और छोटी-छोटी उपलब्धियों में आनंद है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल धन-संपत्ति, ऊंचा पद, प्रसिद्धि, भौतिक सुविधाएं या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इन सबके बीच मन की शांति, संतोष, स्वस्थ शरीर और प्रसन्नचित्त जीवन बनाए रखना है। आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संचार और आर्थिक प्रगति के ऐसे युग में प्रवेश कर चुका है, जहां उसके पास पहले की तुलना में अधिक सुविधाएं हैं, लेकिन अनेक परिस्थितियों में उसके पास स्वयं के लिए समय, सहज मुस्कान,पारिवारिक संवाद और मानसिक संतोष कम होता जा रहा है। यही कारण है कि पहले के युग की प्रसन्नता और वर्तमान युग की प्रसन्नता के बीच अंतर पर विचार करना आवश्यक हो गया है। पहले जीवन साधनों की दृष्टि से सीमित था, किंतु संबंधों में आत्मीयता,पड़ोस में अपनापन,परिवार में संवाद और छोटी-छोटी उपलब्धियों में आनंद अधिक दिखाई देता था। आज जीवन के साधन बढ़े हैं, लेकिन अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा, तुलना और मानसिक दबाव भी बढ़े हैं। इसलिए मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि प्रसन्न मन,संतुलित जीवन, स्वस्थ संबंध और संतोषपूर्ण चेतना है।
साथियों, लेकिन यदि उसके मन में संतोष नहीं है, तो वह अपने जीवन की उपलब्धियों का आनंद भी पूर्ण रूप से नहीं ले सकता।इसके विपरीत सीमित साधनों वाला व्यक्ति यदि स्वस्थ, संतुष्ट, प्रसन्न और संबंधों से समृद्ध है, तो उसका जीवन अधिक आनंदमय हो सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि धन जीवन की आवश्यकता है, लेकिन संतोष जीवन की समृद्धि है; स्वास्थ्य जीवन की शक्ति है और प्रसन्नता जीवन की वास्तविक सुंदरता है।पहले के युग में जीवन अपेक्षाकृत सरल था। संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन और अन्य परिजन एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे।भोजन केवल पोषण का साधन नहीं, बल्कि परिवार को एक साथ बैठाने का अवसर था। शाम के समय घरों के आंगन में बातचीत, बच्चों का खेलना, पड़ोसियों का मिलना और सामाजिक अवसरों पर सामूहिक सहभागिता जीवन में सहज प्रसन्नता का निर्माण करती थी।लोगों के पास आज की तरह अत्याधुनिक उपकरण नहीं थे, लेकिन संवाद के लिए समय था। मनोरंजन के साधन सीमित थे, परंतु संबंधों में निकटता अधिक थी। आज डिजिटल तकनीक ने दूर बैठे व्यक्ति को जोड़ दिया है, लेकिन कई बार एक ही घर में रहने वाले लोगों के बीच संवाद कम कर दिया है। मोबाइल फोन ने सूचना का विस्तार किया है, किंतु निरंतर तुलना, त्वरित प्रतिक्रिया और आभासी जीवन की प्रतिस्पर्धा ने मन की शांति को चुनौती भी दी है।
साथियों, वर्तमान युग की प्रसन्नता को समझने के लिए यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक जीवन स्वयं में न तो पूर्णतः अच्छा है और न बुरा। तकनीक ने शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, संचार और प्रशासन में अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान को व्यापक बनाया है और दुनिया को अधिक जुड़ा हुआ बनाया है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुविधा आवश्यकता से आगे बढ़कर निर्भरता बन जाती है और तुलना आत्मविश्वास को कमजोर करने लगती है। सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियों, यात्राओं, संपत्ति और आकर्षक जीवन की निरंतर तस्वीरें देखकर व्यक्ति अपने वास्तविक जीवन को कमतर समझने लगता है। वह यह भूल जाता है कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर चयनित क्षणों का प्रदर्शन होता है, संपूर्ण वास्तविकता नहीं। इसलिए वर्तमान युग में प्रसन्न रहने के लिए डिजिटल संतुलन, आत्मस्वीकृति और वास्तविक संबंधों को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है।
प्रसन्नता केवल चेहरे की मुस्कान नहीं, बल्कि मन की सकारात्मक और संतुलित अवस्था है। खुलकर हंसना, मुस्कुराना और प्रसन्न रहना मनुष्य की आंतरिक शक्ति को बढ़ाता है। मन की प्रसन्नता को स्वयं सृजित की हुई दवा के समान कहा जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रसन्न व्यक्ति के जीवन में दुख, संघर्ष या कठिनाइयां नहीं आतीं। वास्तविक प्रसन्नता कठिनाइयों से आंखें चुराना नहीं, बल्कि चुनौतियों के बीच आशा, धैर्य और विवेक बनाए रखने की क्षमता है। प्रसन्न व्यक्ति समस्याओं को नकारता नहीं, बल्कि उनका समाधान खोजने का प्रयास करता है। उसका मन अधिक स्थिर रहता है, निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है और वह असफलता को जीवन का अंतिम सत्य मानने के बजाय सीखने का अवसर समझता है।
साथियों, प्रसन्नता व्यक्ति के व्यक्तित्व को चुंबकीय बनाती है। एक मुस्कुराता हुआ, विनम्र और सकारात्मक व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों, सहकर्मियों और समाज पर अनुकूल प्रभाव डालता है। उसकी उपस्थिति से वातावरण में सहजता आती है। प्रसन्नता की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि इसे बांटने से यह कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना, किसी जरूरतमंद की सहायता करना, किसी की उपलब्धि पर हृदय से प्रसन्न होना, बच्चों के साथ समय बिताना, बुजुर्गों का सम्मान करना और किसी से मधुर शब्दों में बात करना ये सभी प्रसन्नता के छोटे किंतु शक्तिशाली स्रोत हैं। इसलिए प्रसन्नता को केवल व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि सामाजिक ऊर्जा भी कहा जा सकता है।
साथियों, आज की दुनिया में वह व्यक्ति वास्तव में सबसे अधिक समृद्ध है, जिसके पास मन की शांति, संतोषपूर्ण विचार, स्वस्थ शरीर और प्रेमपूर्ण संबंध हैं। धन आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, भोजन और सम्मानजनक जीवन के लिए आर्थिक संसाधन चाहिए। लेकिन धन को जीवन का अंतिम लक्ष्य बना देने से इच्छाओं की कोई सीमा नहीं रहती। एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा उत्पन्न होती है और व्यक्ति लगातार अधिक पाने की दौड़ में लगा रहता है। यदि उसके भीतर संतोष का भाव नहीं है, तो उपलब्धियां भी अधूरी लग सकती हैं। इसलिए जीवन में प्रगति और संतोष का संतुलन आवश्यक है। हमें आगे बढ़ना चाहिए, लक्ष्य बनाना चाहिए और सफलता के लिए परिश्रम करना चाहिए, लेकिन अपनी उपलब्धियों की तुलना हर समय दूसरों से करके अपने मन की शांति नहीं खोनी चाहिए। स्वास्थ्य भी प्रसन्नता की सबसे बड़ी पूंजी है। स्वस्थ शरीर व्यक्ति को कार्य करने की क्षमता देता है और स्वस्थ मन जीवन का आनंद लेने की शक्ति प्रदान करता है। जब शरीर अस्वस्थ होता है, तब बड़ी से बड़ी संपत्ति भी सीमित लग सकती है।इसलिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, प्रकृति के संपर्क, सकारात्मक विचार और तनाव से बचने की आदतें जीवन में महत्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य और प्रसन्नता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रसन्न मन व्यक्ति को सक्रिय और आशावादी बनाता है, जबकि स्वस्थ शरीर जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता करता है।अतः व्यक्तिगत जीवन की समृद्धि का वास्तविक सूत्र धन, स्वास्थ्य, संतोष और प्रसन्नता के संतुलन में सटीकता से निहित है।
साथियों,प्रसन्नता का निर्माण केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपने घर से प्रसन्नता की संस्कृति विकसित कर सकता है। परिवार में संवाद बढ़ाना, बच्चों को केवल अंक और प्रतिस्पर्धा के आधार पर नहीं आंकना, बुजुर्गों को समय देना, पति-पत्नी के बीच सम्मान और सहयोग बनाए रखना तथा पारिवारिक मतभेदों का समाधान शांतिपूर्ण संवाद से करना आवश्यक है। परिवार यदि प्रसन्न और संतुलित होगा, तो समाज में सहयोग और सद्भाव बढ़ेगा। समाज में विश्वास बढ़ेगा तो राष्ट्र अधिक मजबूत बनेगा। इस प्रकार व्यक्तिगत प्रसन्नता से पारिवारिक समृद्धि पारिवारिक समृद्धि से सामाजिक सद्भाव और सामाजिक सद्भाव से राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण होता है।प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए बड़े अवसरों की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है। सुबह की ताजी हवा, प्रकृति का सौंदर्य, परिवार के साथ भोजन, किसी मित्र से आत्मीय बातचीत किसी जरूरतमंद की सहायता, अपने कार्य को ईमानदारी से पूरा करना और दिन के अंत में अपने पास उपलब्ध चीजों के प्रति कृतज्ञ होना ये सभी जीवन में प्रसन्नता ला सकते हैं। हमें छोटी-छोटी बातों में आनंद खोजने की आदत विकसित करनी चाहिए। शिकायतों की संख्या कम करके कृतज्ञता की भावना बढ़ानी चाहिए। दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय प्रेरणा लेनी चाहिए। अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और स्वयं को निरंतर दोष देने के बजाय सुधार का अवसर देना चाहिए।
साथियों, प्रसन्न व्यक्ति का अर्थ यह नहीं कि वह हर समय हंसता रहे या दुख को छिपाए। वास्तविक प्रसन्नता भावनाओं के संतुलन का नाम है। दुख आए तो उसे स्वीकार करना, आवश्यकता हो तो अपने विश्वसनीय व्यक्ति से बात करना और कठिन समय में सहायता लेना भी जीवन की परिपक्वता है। प्रसन्नता का अर्थ कृत्रिम सकारात्मकता नहीं बल्कि वास्तविकता को स्वीकार करते हुए आशा और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। व्यक्ति यदि अपने मन की स्थिति को समझता है, अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है और अपने जीवन के मूल्यों के अनुसार कार्य करता है, तो उसके भीतर स्थायी संतोष विकसित होता है।
साथियों आध्यात्मिकता उदारता परोपकार सहनशीलता और सहिष्णुता भी मन की प्रसन्नता के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। आध्यात्मिकता व्यक्ति को अपने भीतर झांकना सिखाती है। परोपकार उसे दूसरों के दुख से जोड़ता है। उदारता संबंधों में प्रेम बढ़ाती है और सहिष्णुता मतभेदों के बीच सम्मान बनाए रखती है। जब व्यक्ति केवल अपने लाभ के बारे में सोचता है, तो उसका जीवन सीमित हो सकता है; लेकिन जब वह समाज और राष्ट्र के हित में योगदान देता है, तो उसे उद्देश्यपूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होती है। किसी की सहायता करना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि आंतरिक आनंद का स्रोत भी है।
साथियों, आज के युग में व्यक्तिगत जीवन, परिवार समाज और राष्ट्र को समृद्ध बनाने के लिए प्रसन्नचित्त रहना समय की मांग है। तनाव, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और डिजिटल व्यस्तता के बीच यदि व्यक्ति अपने मन की शांति खो देता है, तो बाहरी उपलब्धियां भी अधूरी लग सकती हैं। इसलिए हमें अपने जीवन में मुस्कान, संवाद, संतोष, स्वास्थ्य और सेवा के लिए स्थान बनाना होगा। हमें अपने बच्चों को केवल सफल नहीं,बल्कि अधिक संवेदनशील और प्रसन्न बनाना होगा। हमें परिवारों को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि प्रेम और सहयोग का केंद्र बनाना होगा। समाज को केवल विकास की गति नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों की गुणवत्ता भी बढ़ानी होगी।
अतः यदि हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन और विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट होता है कि पहले के युग की सहजता और वर्तमान युग की सुविधाओं के बीच संतुलन स्थापित करना ही आधुनिक जीवन की बड़ी आवश्यकता है। खुलकर हंसना, मुस्कुराना और प्रसन्न रहना चाहिए, क्योंकि मन की प्रसन्नता स्वयं सृजित की हुई दवा के समान है। धन आवश्यक है, लेकिन मन का संतोष उससे भी अधिक मूल्यवान है; सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन मन की शांति उससे अधिक स्थायी है; और अच्छी सेहत जीवन की ऐसी पूंजी है, जिसके बिना अन्य उपलब्धियों का आनंद अधूरा रह सकता है। वास्तव में आज की दुनिया में वही व्यक्ति सबसे अधिक खुश और समृद्ध है, जिसके पास प्रसन्नता, मन की शांति, संतोष से भरा हृदय, स्वस्थ शरीर और प्रेमपूर्ण संबंध हैं। प्रसन्नता को अपने तक सीमित न रखें इसे बांटिए, क्योंकि यह ऐसा अनमोल खजाना है जो जितना बांटा जाता है, उतना ही बढ़ता चला जाता है।दुनिया में मन का संतोष, प्रसन्नता, खुशी और अच्छी सेहत ही सबसे बड़ी पूंजी है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
