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Home Hindi Editorials

मोबाइल के बढ़ते नेटवर्क बनाम दिलों के घटते कनेक्शन -रिश्तों की खुशबू बचाने का समय अब है- समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
June 21, 2026
in Hindi Editorials, Hindi News
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रिश्तों की खुशबू बनाम डिजिटल दूरी : प्रेम, विश्वास और संवाद की नई चुनौती

दिल के रिश्ते तोड़ने से भी नहीं टूटते, दिमाग के रिश्ते जोड़ने से भी नहीं जुड़ते: डिजिटल युग में रिश्तों का बदलता स्वरूप और मानवीय संवेदनाओं की चुनौती -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी का वर्तमान दौर विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और डिजिटल क्रांति का युग है। दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक जुड़ गई है। एक क्लिक पर हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से संवाद संभव है। वीडियो कॉल, मैसेजिंग ऐप्स और सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म ने भौगोलिक दूरियों को समाप्त कर दिया है। परंतु विडंबना यह है कि जितनी तेजी से तकनीक ने लोगों को ऑनलाइन जोड़ा है, उतनी ही तेजी से दिलों के बीच की दूरी भी बढ़ी है। आज मनुष्य के पास सैकड़ों डिजिटल संपर्क हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे सुनने और समझने वाले कुछ ही लोग बचे हैं। यही कारण है कि आधुनिक समाज में रिश्तों का संकट वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि रिश्ते मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। मनुष्य जन्म लेते ही अनेक रिश्तों से जुड़ जाता है। माता-पिता, भाई-बहन,मित्र,गुरु,जीवनसाथी और समाज के अन्य संबंध उसके जीवन को अर्थ प्रदान करते हैं। ये रिश्ते केवल सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं होते, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, मानसिक संतुलन और जीवन की खुशियों का आधार भी होते हैं। जब व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, तब धन, पद और प्रतिष्ठा से अधिक उसके रिश्ते ही उसके साथ खड़े होते हैं। इसलिए कहा जाता है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि बैंक खाते में नहीं, बल्कि दिलों में बसे रिश्तोंमें होतीहै।
साथियों डिजिटल युग ने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ अनेक नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। आज परिवार के सदस्य एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन की दुनिया में खोए रहते हैं। भोजन की मेज पर संवाद की जगह मोबाइल फोन ने ले ली है। परिवारों में साथ बैठकर बातचीत करने की परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है। बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद कम हो रहा है। पति- पत्नी के बीच भी समय का अभाव और डिजिटल व्यस्तता संबंधों में दूरी पैदा कर रही है। परिणामस्वरूप भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होता जा रहा है।
साथियों, विश्व के अनेक देशों में किए गए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि अत्यधिक डिजिटल निर्भरता अकेलेपन, अवसाद और सामाजिक अलगाव को बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर हजारों मित्र होने के बावजूद व्यक्ति भीतर से अकेला महसूस कर रहा है। वह अपनी वास्तविक भावनाओं को साझा करने के बजाय एक आभासी छवि प्रस्तुत करने में व्यस्त रहता है। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की संख्या को लोकप्रियता का पैमाना मान लिया गया है, जबकि वास्तविक रिश्ते विश्वास, समय, त्याग और संवेदनशीलता पर आधारित होते हैं।
साथियों, आधुनिक जीवन की एक बड़ी विडंबना यह है कि लोग संवाद तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन संप्रेषण कम हो रहा है। संदेशों का आदान-प्रदान बढ़ा है, परंतु भावनाओं का आदान- प्रदान घटा है। छोटी-छोटी गलत फहमियाँ बड़े विवादों का रूप ले रही हैं क्योंकि लोग आमने- सामने बैठकर बातचीत करने के बजाय अनुमान और धारणाओं के आधार पर निर्णय लेने लगे हैं। रिश्तों में जो गर्मजोशी कभी एक मुस्कान, एक स्पर्श या एक आत्मीय मुलाकात से मिलती थी, उसे डिजिटल माध्यम पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकते।बदलते समय में रिश्तों के टूटने का एक प्रमुख कारण बढ़ता हुआ व्यक्तिवाद भी है। आज सफलता, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत उपलब्धियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। व्यक्ति अपने करियर, आर्थिक विकास और व्यक्तिगत लक्ष्यों में इतना व्यस्त हो गया है कि रिश्तों को समय देना कठिन लगने लगा है। जबकि हर रिश्ता समय और समर्पण मांगता है। जिस प्रकार पौधे को नियमित जल और देखभाल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार रिश्तों को भी प्रेम, विश्वास और संवाद की आवश्यकता होती है। उपेक्षा किसी भी संबंध को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है।
साथियों, वैश्विक स्तर पर परिवार संस्था में आ रहेबदलाव भी रिश्तों की प्रकृति को प्रभावित कर रहे हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। रोजगार और शिक्षा के कारण लोग अपने घरों और समुदायों से दूर रहने लगे हैं। प्रवासन ने आर्थिक अवसर तो दिए हैं, लेकिन भावनात्मक दूरी भी बढ़ाई है। कई बार माता-पिता एक देश में होते हैं और बच्चे दूसरे देश में। ऐसे में डिजिटल माध्यम संपर्क बनाए रखने में सहायक तो हैं, परंतु वे शारीरिक उपस्थिति और आत्मीयता का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते।
साथियों,रिश्तों के कमजोर होने का एक अन्य कारण अपेक्षाओं का बढ़ना भी है। आधुनिक समाज में लोग अक्सर दूसरों से अधिक अपेक्षाएँ रखते हैं, लेकिन स्वयं उतना योगदान देने के लिए तैयार नहीं होते। जब अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तब निराशा और तनाव पैदा होता है। स्वस्थ रिश्तों की नींव अधिकारों पर नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों पर टिकी होती है। जहाँ केवल लेने की इच्छा हो और देने की भावना न हो, वहाँ संबंध लंबे समय तक टिक नहीं सकते।डिजिटल युग में गलत सूचनाएँ, अफवाहें और अधूरी जानकारियाँ भी रिश्तों को प्रभावित कर रही हैं। सोशल मीडिया पर देखी गई किसी पोस्ट, फोटो या संदेश के आधार पर लोग निष्कर्ष निकाल लेते हैं। कई बार बिना सत्यता जाने आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। विश्वास की कमी रिश्तों की सबसे बड़ी शत्रु है। एक बार विश्वास टूट जाए तो उसे पुनः स्थापित करने में लंबा समय लगता है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में संवाद और समझदारी का मार्ग अपनाया जाए।इसके विपरीत, सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाए तो डिजिटल तकनीक रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम भी बन सकती है। विदेश में रहने वाला पुत्र प्रतिदिन अपने माता-पिता से वीडियो कॉल पर बात कर सकता है। मित्र दूर रहते हुए भी संपर्क बनाए रख सकते हैं। परिवार के सदस्य महत्वपूर्ण अवसरों को ऑनलाइन साझा कर सकते हैं। अर्थात समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के तरीके में है। यदि तकनीक का उपयोग संवेदनशीलता और संतुलन के साथ किया जाए तो यह रिश्तों को सटीक रूप सेसशक्त बना सकती है।
साथियों रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है – संवाद। खुलकर बात करना, एक-दूसरे की भावनाओं को सुनना और समझना हरw संबंध की आवश्यकता है। जब व्यक्ति अपने प्रियजनों को समय देता है, उनकी समस्याओं को सुनता है और उनकी खुशियों में सहभागी बनता है, तब संबंधों में गहराई आती है। संवाद की कमी ही अधिकांश गलतफहमियों की जड़ होती है। इसलिए व्यस्त जीवन में भी परिवार और मित्रों के लिए समय निकालना आवश्यक है।मधुर वाणी रिश्तों की सुगंध है। कठोर शब्द वर्षों पुराने संबंधों को क्षणभर में आहत कर सकते हैं, जबकि प्रेमपूर्ण शब्द टूटते हुए रिश्तों को भी जोड़ सकते हैं। भारतीय संस्कृति सदैव “प्रिय वचन” बोलने की शिक्षा देती रही है। विश्व की सभी महान सभ्यताओं और धर्मों ने करुणा, सहानुभूति और सम्मान को संबंधों का आधार माना है। जब व्यक्ति दूसरों का सम्मान करता है, उनकी भावनाओं की कद्र करता है और विनम्रता अपनाता है, तब रिश्ते स्वाभाविक रूप से मजबूत होते हैं।
साथियों, क्षमा का गुण भी रिश्तों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। हर इंसान से गलतियाँ होती हैं। यदि हम हर छोटी भूल को दिल से लगा लें, तो कोई रिश्ता लंबे समय तक नहीं चल सकता। क्षमा करना और क्षमा मांगना दोनों ही परिपक्वता के संकेत हैं। कई बार एक सच्चा “मुझे माफ कर दीजिए” वर्षों से चली आ रही दूरी को समाप्त कर देता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच संतुलन स्थापित करें। तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा बने, लेकिन हमारे रिश्तों पर हावी न हो। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है परिवार के साथ बैठना, मित्रों से मिलना, बुजुर्गों का सम्मान करना और बच्चों के साथ समय बिताना।यही वे छोटे-छोटे प्रयास हैं जो रिश्तों में नई ऊर्जा और नई खुशबू भर सकते हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यदि हम वर्तमान परिस्थितियों का गहन विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि आधुनिक डिजिटल युग में रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि संवेदनाओं का क्षरण है। दिल से जुड़े रिश्ते केवल संपर्क सूची में दर्ज नाम नहीं होते, बल्कि विश्वास, प्रेम, त्याग, सम्मान और अपनत्व की जीवंत अभिव्यक्ति होते हैं। सच ही कहा गया है कि दिल के रिश्ते तोड़ने से भी नहीं टूटते और दिमाग के रिश्ते जोड़ने से भी नहीं जुड़ते। रिश्तों की वास्तविक शक्ति भावनात्मक जुड़ाव में निहित होती है। इसलिए आइए, डिजिटल युग की भागदौड़ के बीच कुछ पल अपने प्रियजनों के लिए निकालें, संवाद की डोर को मजबूत करें, अहंकार को त्यागें और प्रेम, विश्वास तथा संवेदनशीलता की खुशबू से अपने जीवन को महकाएँ। यही सफल, सुखी और सार्थक जीवन जीने की सच्ची कला है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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