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मिडिल-ईस्ट में महायुद्ध की आहट?- वैश्विक शक्ति -संतुलन, आपातकालीन एडवाइजरी और तीसरे विश्वयुद्ध की आशंकाओं का समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
March 4, 2026
in Hindi Editorials
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विश्व एक अत्यंत अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुका है- आपातकालीन एडवाइजरी, उड़ानों का रद्द होना, सैन्य अभियानों की अवधि बढ़ाने की घोषणा और क्षेत्रीय संगठनों की सक्रियता ये सभी स्पष्ट संकेत?

क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका वास्तविक है? इतिहास गवाह है कि विश्वयुद्ध अचानक घोषित नहीं होते, बल्कि क्षेत्रीय संघर्षों की श्रृंखला के रूप में विकसित होते हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया एक बार फिर इतिहास के सबसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। क्षेत्र में तेज़ी से बदलते सैन्य समीकरण, मिसाइल और ड्रोन हमलों की नई लहरें,और महाशक्तियों की खुली भागीदारी ने हालात को अत्यंत गंभीर बना दिया है। ईरान इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ता प्रत्यक्ष और परोक्ष टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा बन चुका है।अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की परतें हटती दिख रही हैं और सैन्य रणनीति खुले मैदान में उतर आई हैअमेरिका द्वारा अपने नागरिकों को खाड़ी और युद्धग्रस्त देशों से तुरंत निकलने की सलाह देना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि स्थिति सामान्य राजनयिक तनाव से कहीं आगे बढ़ चुकी है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि जब कोई महाशक्ति अपने नागरिकों को एक साथ अनेक देशों से तत्काल प्रस्थान का निर्देश देती है,तो यह केवल सावधानी नहीं बल्कि संभावित बड़े सैन्य विस्तार की पूर्व चेतावनी भी माना जाता है।अमेरिकी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अभियान कुछ हफ्तों तक चल सकता है और आवश्यकता पड़ने पर इसे और लंबा किया जा सकता है। घोषित उद्देश्यों में ईरान की मिसाइल क्षमताओं को निष्क्रिय करना,उसकी नौसेना को कमजोर करना, परमाणु हथियार प्राप्त करने की संभावनाओं को समाप्त करना और उसके सहयोगी समूहों,जैसे हिज़्बुल्लाह को समर्थन से वंचित करना शामिल है।यह रणनीति केवल सैन्य नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक पुनर्संरचना का प्रयास प्रतीत होती है। यदि ईरान की क्षेत्रीय शक्ति को निर्णायक रूप से कमजोर किया जाता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। किंतु इसके प्रतिउत्तर में ईरान समर्थक समूहों द्वारा असममित युद्ध की रणनीति अपनाई जा सकती है, जिससे संघर्ष का दायरा और विस्तृत हो सकता है।क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका वास्तविक है?इतिहास गवाह है कि विश्वयुद्ध अचानक घोषित नहीं होते, बल्कि क्षेत्रीय संघर्षों की श्रृंखला के रूप में विकसित होते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध बाल्कन क्षेत्र के एक सीमित संघर्ष से शुरू हुआ था। वर्तमान परिस्थिति में यदि खाड़ी के देश प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में उतरते हैं, यदि क्षेत्रीय संगठन सक्रिय सैन्य भूमिका निभाते हैं, या यदि बड़ी शक्तियाँ रूस, चीन या यूरोपीय संघ किसी पक्ष में खुलकर शामिल होते हैं, तो स्थिति वैश्विक टकराव की ओर बढ़ सकती है।हालांकि, यह भी उतना ही सत्य है कि आधुनिक विश्व परस्पर निर्भरता से बंधा हुआ है।ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार, वित्तीय नेटवर्क और बहुपक्षीय संस्थाएँ किसी भी पूर्ण विश्वयुद्ध को अत्यंत महंगा बना देती हैं। इसलिए अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना भले ही चर्चा में हो, परंतु महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष वैश्विक युद्ध से बचने की पूरी कोशिश करेंगी।
साथियों बात अगर हम 15 देशों के लिए आपातकालीन चेतावनी: कूटनीतिक भाषा में छिपा संदेश इसको समझने की करें तो,अमेरिकी विदेश विभाग की एडवाइजरी में जिन देशों का उल्लेख हुआ,उनमें खाड़ी के प्रमुख राष्ट्र सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान शामिल हैं।युद्धग्रस्त या सीधे टकराव में घिरे क्षेत्रों में लेबनान,इराक, यमन, सीरिया के साथ-साथ वेस्ट बैंक और गाज़ा जैसे क्षेत्र भी आते हैं। इसके अतिरिक्त पड़ोसी देश मिस्र और जॉर्डन भी इस चेतावनी के दायरे में हैं।इन देशों में से कई विशेषकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अब तक अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर माने जाते रहे हैं। ऐसे में वहाँ से भी तत्काल निकासी की अपील यह संकेत देती है कि संघर्ष सीमित दायरे में रहने वाला नहीं है। हवाई मार्ग बंद होने की आशंका, बड़ी एयरलाइंस द्वारा उड़ानों का रद्द किया जाना और समुद्री मार्गों पर खतरे का बढ़ना ये सभी संकेत व्यापक सैन्य उथल- पुथल की ओर सटीक इशारा करते हैं।
साथियों बात अगर हम संघर्ष की जड़ें और विस्तार का स्वरूप इसको समझने की करें तो, ईरान और इज़राइल के बीच दशकों से वैचारिक और सामरिक शत्रुता रही है। परमाणु कार्यक्रम,मिसाइल तकनीक, और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को समर्थन ये सभी मुद्दे लंबे समय से तनाव के केंद्र में रहे हैं। जब अमेरिका खुलकर इज़राइल के साथ खड़ा दिखाई देता है और संयुक्त सैन्य ऑपरेशन की बात सामने आती है, तो यह टकराव सीधे महाशक्ति बनाम क्षेत्रीय शक्ति का रूप ले लेता है।इस संघर्ष की एक विशेषता यह है कि यह पारंपरिक युद्ध की सीमाओं को पार कर चुका है।ड्रोन,साइबर अटैक, लंबी दूरी की मिसाइलें और समुद्री नाकेबंदी ये सभी आधुनिक युद्ध के उपकरण एक साथ सक्रिय हैं। यदि यह टकराव लंबा खिंचता है, तो ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार मार्ग और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
साथियों बात अगर हम भारत पर प्रभाव: कूटनीति, अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा इसको समझने की करें तो, भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल एक भू- राजनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि ऊर्जा, प्रवासी भारतीयों और व्यापार का प्रमुख केंद्र है। लाखों भारतीय खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। यदि वहां व्यापक युद्ध होता है, तो निकासी अभियान, ऊर्जा कीमतों में उछाल और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी चुनौतियाँ सामने सटीक रूप से आ सकती हैं।दिल्ली एयरपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का रद्द होना, खाड़ी देशों से भारतीयों की वापसी की शुरुआत, और सीबीएसई द्वारा बहरीन, यूएई तथा सऊदी अरब में परीक्षाएँ स्थगित करना ये घटनाएँ बताती हैं कि संघर्ष का प्रभाव सीधे भारत तक पहुंच चुका है। भारतीय विदेश मंत्रालय अलर्ट मोड में है और विभिन्न देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास तेज़ किए गए हैं।
साथियों बात अगर हम जम्मू- कश्मीर और आंतरिक संवेदन शीलता को समझने की करें तो,पश्चिम एशिया में किसी बड़े इस्लामी नेता की मृत्यु या बड़े सैन्य टकराव का असर भारत के संवेदनशील क्षेत्रों विशेषकर जम्मू कश्मीर में दिखाई दे सकता है। घाटी में बढ़ते प्रतिबंध और प्रदर्शनों की खबरें यह दर्शाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ स्थानीय भावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। 2019 के बाद इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन देखे जाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर संकेत है।भारत सरकार के लिए चुनौती दोहरी है,एक ओर बाहरी भू-राजनीतिक संकट, दूसरी ओर आंतरिक कानून-व्यवस्था की स्थिरता बनाए रखना। किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक या राजनीतिक उग्रता को नियंत्रित करना इस समय अत्यंत आवश्यक है।ऊर्जा,अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार यदि खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हो सकती है।भारत जैसे ऊर्जा- आयातक देश के लिए यह आर्थिक दबाव बढ़ाने वाला होगा। महंगाई, चालू खाता घाटा और मुद्रा विनिमय दर पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक स्तर पर शेयर बाजारों में अस्थिरता और सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों की मांग में वृद्धि सटीक रूप से देखी जा सकती है।
साथियों बात अगर हम कूटनीतिक संतुलन की आवश्यकता को समझने की करें तो, भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से संतुलन पर आधारित रही है ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध, इज़राइल के साथ रणनीतिक सहयोग और अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी। वर्तमान संकट में यह संतुलन बनाए रखना कठिन किन्तु आवश्यक होगा। खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकता है।संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर शांति की अपील, मानवीय सहायता और निकासी अभियानों में सक्रिय भूमिका ये भारत की प्राथमिकताएँ हो सकती हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अनिश्चितता के युग में संयम की आवश्यकता,पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति विस्फोटक है, परंतु इसे सीधे तीसरे विश्वयुद्ध की घोषणा कहना जल्दबाजी होगी। इतिहास यह सिखाता है कि बड़े युद्ध अक्सर गलत आकलनों और कूटनीतिक विफलताओं का परिणाम होते हैं। यदि संवाद की संभावनाएँ जीवित रखी जाती हैं और क्षेत्रीय शक्तियाँ संयम बरतती हैं, तो व्यापक वैश्विक युद्ध टाला जा सकता है।फिर भी, आपातकालीन एडवाइजरी, उड़ानों का रद्द होना, सैन्य अभियानों की अवधि बढ़ाने की घोषणा और क्षेत्रीय संगठनों की सक्रियता ये सभी संकेत इस बात के हैं कि विश्व एक अत्यंत अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुका है।भारत सहित समूचे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह समय सतर्क कूटनीति, आंतरिक स्थिरता और वैश्विक शांति के प्रति प्रतिबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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