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मथुरा डैम त्रासदी से सीख नहीं-नतीज़ा बरगी डैम त्रासदी दुर्घटना नहीं, संभवततः आपराधिक लापरवाही का आईना -पर्यटन सुरक्षा तंत्र की विफ़लता और जवाबदेही की कसौटी- व्यापक समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
May 4, 2026
in Hindi Editorials
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गोंदिया जिला बार एसोसिएशन चुनाव 30 अप्रैल 2026 – लोकतांत्रिक परंपरा,कड़ा मुकाबला और नई नेतृत्व टीम का उदय

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, धार्मिक, प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन तेजी से बढ़ी- सुरक्षा मानकों का अनुपालन केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन- मृत्यु का प्रश्न बना

पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा उपकरण, विशेषकर थर्डपार्टी से नियमित सुरक्षा ऑडिट,नियमित और औचक निरीक्षण भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में पारदर्शी कार्यवाही,सहित पूर्ण जवाबदेही अस्त्र चलाना ज़रूरी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियाँ नज़रें भारतीय पर्यटक स्थल पर लग गई जब 30 अप्रैल 2026 की शाम बरगी डैम (नर्मदा के बैकवॉटर) में भीषण क्रूज हादसा, हुआ जिसमें प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार 13 लोगों की मृत्यु हुई,केवल एक आकस्मिक दुर्घटना नहीं बल्कि हमारे पर्यटन तंत्र में गहरे पैठे सुरक्षा-संस्कृति के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही का कठोर उदाहरण बनकर सामने आया है। जब घटनास्थल से यह तथ्य उभरकर आता है कि कई पर्यटकों ने लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी और यह भी कि उन्हें व्यवस्थित रूप से पहनने के लिए बाध्य नहीं किया गया तथा मौसम विभाग के अलर्ट को भी नजर नजरअंदाज कर दिया गया था तो यह सवाल स्वतः उठता है कि क्या यह केवल एक त्रुटि थी या नियमों की सुनियोजित अनदेखी? इस त्रासदी का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब इसे हाल ही में मथुरा में हुए समान हादसे के संदर्भ में देखा जाए,जहाँ 26 लोगों की जान चली गई थी और वहाँ भी लाइफ जैकेट का अभाव या उपयोग न होना प्रमुख कारणों में शामिल था। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इन दो घटनाओं के बीच का समयइतना कम है कि यह निष्कर्ष निकलना स्वाभाविक है,हमने सबक नहीं सीखा।यह स्थिति केवल किसी एक राज्य या एक प्रशासनिक इकाई की विफलता नहीं है; यह पूरे देश के पर्यटन प्रबंधन तंत्र में व्याप्त प्रणालीगत खामियों को उजागर करती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ धार्मिक, प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है, वहाँ सुरक्षा मानकों का अनुपालन केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन जाता है। फिर भी, जमीनी हकीकत यह है कि कई पर्यटन स्थलों पर नियम पुस्तकों तक सीमित हैं और उनका पालन ‘मुनाफे’ के दबाव में दरकिनार कर दिया जाता है। बरगी डैम की घटना में भी यही परिलक्षित होता है—जहाँ पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय क्रूज संचालन जारी रखा गया,भले ही परिस्थितियाँ बिल्कुल भी अनुकूल न हों।
साथियों बात अगर हम लाइफ जैकेट का अभाव या उनका उपयोग न कराया जाना इसको समझने की करें तो,इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर और स्पष्ट लापरवाही का बिंदु है। अंतरराष्ट्रीय स्तरपर जल-पर्यटन में यह एक बुनियादी और अनिवार्य सुरक्षा उपाय माना जाता है।किसी भी नाव या क्रूज के पानी में उतरने से पहले यह सुनिश्चित करना ऑपरेटर की जिम्मेदारी होती है कि प्रत्येक यात्री सही ढंग से लाइफ जैकेट पहने। यह केवल एक उपकरण नहीं बल्कि संकट की घड़ी में जीवन और मृत्यु के बीच की अंतिम दीवार होती है। ऐसे में यदि यह पाया जाता है कि जैकेट उपलब्ध नहीं थीं, या उपलब्ध होने के बावजूद यात्रियों को पहनने के लिए बाध्य नहीं किया गया, तो यह सीधा-सीधा आपराधिक लापरवाही का सटीक मामला बनता है।
साथियों दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है मौसम की चेतावनियों की अनदेखी। यदि मौसम विभाग जैसे भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा पहले से तेज हवाओं या खराब मौसम की चेतावनी जारी की गई थी,और इसके बावजूद क्रूज संचालन जारी रहा,तो यह केवल जोखिम उठाने का मामला नहीं बल्कि जानबूझकर खतरे को आमंत्रित करने जैसा है। 40-50 किमी/घंटा की तेज हवाएँ किसी भी जलयान के लिए गंभीर चुनौती होती हैं, विशेषकर तब जब उसमें आम पर्यटक सवार हों। ऐसे में प्रशासन और ऑपरेटर दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे गतिविधियों को तत्काल रोकें, न कि मुनाफे या दबाव के चलते उन्हें जारी रखें।
साथियों ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन भी ऐसे हादसों के प्रमुख कारणों में शामिल होते हैं। कई बार देखा गया है कि अधिक से अधिक यात्रियों को समायोजित करने के लिए नावों में उनकी निर्धारित क्षमता से ज्यादा लोगों को बैठाया जाता है। इससे न केवल संतुलन बिगड़ता है बल्कि आपातकालीन स्थिति में बचाव कार्य भी जटिल हो जाता है। यदि बरगी डैम हादसे में भी ऐसा कोई तत्व सामने आता है, तो यह और अधिक गंभीरता से जांच और कार्रवाई की मांग करता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि सुरक्षा उपकरण जैसे लाइफ बोट,सिग्नलिंग डिवाइस,प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव स्थिति को और घातक बना देता है।
साथियों प्रशासनिक जवाबदेही इस पूरे विमर्श का केंद्र बिंदु है। पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन की यह प्राथमिक जिम्मेदारी होती है कि वे सभी ऑपरेटरों को लाइसेंस देने से पहले उनकी सुरक्षा तैयारियों की जांच करें और नियमित अंतराल पर निरीक्षण करें। यदि यह पाया जाता है कि नियमों का उल्लंघन लंबे समय से हो रहा था और इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो यह केवल चूक नहीं बल्कि ‘सांठगांठ’ या ‘सिस्टमेटिक फेल्योर’ की ओर संकेत करता है। ऐसे मामलों में केवल निचले स्तर केकर्मचारियों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होता; उच्च स्तर के अधिकारियों की भूमिका की भी गहन जांच आवश्यक होती है।
साथियों कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी घटनाओं में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस ) या पूर्ववर्ती आईपीसी की धाराएँ स्पष्ट रूप से लागू होती हैं। धारा 304ए (लापरवाही से मृत्यु) ऐसे मामलों में सामान्यतः लगाई जाती है, जहाँ किसी की असावधानी या लापरवाही के कारण किसी की जान चली जाती है। परंतु यदि यह सिद्ध हो जाए कि जोखिम के बारे में पूर्व जानकारी थी और फिर भी जानबूझकर उसे नजरअंदाज किया गया, तो धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) या यहाँ तक कि धारा 302 (हत्या) के तहत भी मामला बन सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जांच में मेनस रिया,अपराध की मानसिक स्थिति कितनी गंभीर पाई जाती है। बरगी और मथुरा जैसी घटनाओं के संदर्भ में यह बहस प्रासंगिक है कि क्या केवल लापरवाही कहना पर्याप्त है, या इसे अधिक कठोर आपराधिक श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
साथियों दिनांक 26 अप्रैल 2026 को मैं खुद अपने पूरे परिवार सहित उत्तराखंड राज्य के एक पर्यटक स्थल ऋषिकेश के रामझूला व गंगा तट पर था,ऋषिकेश में राम झूला और नाव यात्रा के दौरान इस समस्या की व्यापकता को और स्पष्ट रूप से मैंने देखा क़ि राम झूला के बीच में दो बड़े सांड व दो गाय खड़ी थी मैंने गाइड से पूछा तो उन्होंने कहा साहब यह रोज की बात है इसपर मैंने कहा अगर यह दोनों सांड आपस में लड़े तो जान माल का काफी नुकसान होगा तो गाइड ने कहा साहब यहां सुनने वाला कोई नहीं है फिर जब नीचे मैं अपने परिवार सहित नाव से दूसरा किनारा पार करने के लिए प्रति व्यक्ति 40 रूपए की टिकट लेकर नाव पर बैठा तो वहां देखा कि किसी ने लाइफ सेफ़ जैकेट नहीं पहना था मगर मेरे आग्रह करने पर फिर सभी ने लाइफ सेव जैकेट पहने जब एक पर्यटक को स्वयं दूसरों को लाइफ जैकेट पहनने के लिए प्रेरित करना पड़े, और नाव संचालक या कप्तान इस बुनियादी जिम्मेदारी को नजरअंदाज कर दे, तो यह केवल एक स्थान की समस्या नहीं बल्कि पूरे तंत्र में व्याप्त सुरक्षा के प्रति उदासीनता का प्रमाण है। यह स्थिति दर्शाती है कि नियम केवल कागजों पर मौजूद हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका पालन सुनिश्चित करने वाला कोई प्रभावी तंत्र नहीं है।
साथियों भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बहु-स्तरीय और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, लाइफ जैकेट का अनिवार्य उपयोग केवल एक नियम नहीं बल्कि ‘नॉन- नेगोशिएबल’ शर्त होना चाहिए बिना जैकेट के किसी भी यात्री को नाव या क्रूज पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए तकनीकी उपाय जैसे बोर्डिंग गेट पर सेंसर या डिजिटल चेक भी अपनाए जा सकते हैं। दूसरा, ऑपरेटरों के लाइसेंसिंग सिस्टम को पारदर्शी और सख्त बनाया जाना चाहिए, जिसमें नियमित और औचक निरीक्षण शामिल हों। तीसरा, मौसम संबंधी गाइडलाइंस को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए यदि चेतावनी जारी हो, तो संचालन स्वतः निलंबित हो जाए।इसके अतिरिक्त, क्रूज और नावों पर कार्यरत कर्मचारियों का प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है।उन्हेंआपातकालीन स्थितियों से निपटने, प्राथमिक उपचार देने और बचाव कार्यों का संचालन करने में दक्ष होना चाहिए। क्षमता का कड़ाई से पालन भी अनिवार्य है—इसमें किसी भी प्रकार की ढील सीधे खतरे को आमंत्रित करती है। अंततः, पर्यटन स्थलों पर नियमित ‘सुरक्षा ऑडिट’ विशेषकर थर्ड-पार्टी एजेंसियों द्वारा कराया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके और खामियों को समय रहते दूर किया जा सके। बरगी डैम और मथुरा जैसी त्रासदियाँ हमें यह सिखाती हैं कि विकास और पर्यटन के नाम पर यदि सुरक्षा से समझौता किया गया, तो उसकी कीमत मानव जीवन से चुकानी पड़ती है। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि उन परिवारों की पीड़ा है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। इसलिए अब समय आ गया है कि ‘दुर्घटना’ शब्द के पीछे छिपने के बजाय ‘जवाबदेही’ को केंद्र में लाया जाए। जब तक दोषियों पर कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होगी चाहे वे ऑपरेटर हों, अधिकारी हों या नीति-निर्माता तब तक यह चक्र नहीं टूटेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह केवलसरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की भी भूमिका है। जागरूकता, सतर्कता और नियमों के प्रति सम्मान ये तीनों मिलकर ही एक सुरक्षित पर्यटन संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं। लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी शासन और प्रशासन पर ही आती है, और उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी पर्यटक केवल एक लापरवाही के कारण अपनी जान न गंवाए। बरगी डैम की यह त्रासदी एक चेतावनी है,यदि अब भी नहीं चेते, तो अगली खबर किसी और शहर, किसी और नदी से आ सकती है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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