अभी भी समय है कद्र करो पिता की,प्रसन्नचित हो जाएँ
कहीं देर ना हो जाए,पिता उस देश चले जाएँ
न चिट्ठी जाए,न आवाज़ पहुँचे,न लौटकर कोई आएँ
तस्वीर से लिपटकर कहें पिताजी,लौट आएँ
पिता ही हैं जो हर चिंता को अपने हिस्से में ले लेते हैं,
और बच्चों की राहों से मुश्किलों के पत्थर चुन लेते हैं।
हम बेफिक्र होकर जीते हैं उनकी मजबूत छत्रछाया में,
वे खुद धूप में जलते हैं, हमें ठंडी छाँव दे देते हैं।
घर,सामाजिक,आर्थिक जिम्मेदारियाँ चुपचाप निभाते हैं,
अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर न्योछावर कर जाते हैं।
हमारी हर परेशानी को अपने सीने से लगा लेते हैं,
चेहरे पर मुस्कान रखकर हर दर्द छिपा लेते हैं।
हमारी सफलता में पिता का मौन संघर्ष शामिल होता है,
पिता के पसीने की हर बूँद से हमारा भविष्य हासिल होता है।
वे चाहते हैं कि हम सुखी रहें,आगे बढ़ें और मुस्काएँ, पर उनके अपने जीवन का हर सपना घायल होता है।
हम उनकी ममता,त्याग और प्यार को समझ नहीं पाते,
उनकी डाँट में छिपे डर और दुलार को पहचान नहीं पाते।
किशन अभी भी समय है,उनके पास बैठो,हाथ थामो,
कहीं देर न हो जाए, रहें केवल पछतावे के आँसू बहाते।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

