ज़िंदगी जीने के लिए बनी थी,हमने सोचने में गुज़ार दी
कल की चिंता,बीते कल की यादों में हर खुशियाँ हार दी।
जो पल हथेली पर चमक रहे थे,उन्हें भी धुंधला कर डाला
अपने ही मन की उलझनों ने जीवन की धुन बिगाड़ दी।
सपनों को उड़ना था नभ में,हमने पंख ही बाँध दिए,
हँसते चेहरों के बीच रहकर भी होंठ अपने साध लिए।
डर की दीवारें इतनी ऊँची मन के भीतर खड़ी रहीं,
मंज़िल पास खड़ी मुस्काती रही,हमने कदम ही रोकलिए।
जीवन का हर नया सवेरा उम्मीदों का संदेश लिए आता हैँ
जो वर्तमान को गले लगाता,वही सच्ची मुस्कान पाता है।
सोच ज़रूरी है,पर इतनी भी नहीं कि साँसें थम जाएँ
कर्मों की सरिता बहती रहे,तभी भाग्य का फूल खिलजाए
चलो आज से हर पल को खुलकर जीने का संकल्प करें
छोटी-छोटी खुशियों क़ा दिल के आँगन में स्वागत करें।
कल क्या होगा,ईश्वर अल्लाह पर,आज हमारा अपना है
हर धड़कन को प्रेम,परिश्रम और विश्वास का उत्सव करें।
किशन जब जीना सीखोगे,तब जीवन गीत सुनाएगा
हर संघर्ष का पत्थर भी सफ़लता का दीप जलाएगा।
याद रखो,ज़िंदगी सोचने के लिए नहीं,संवारने के लिए हैँ
जो हर पल को जी लेग़ा,वही अमर मुस्कान छोड़ जाएगा।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

