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Home Hindi Editorials

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच। हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच

by Page 3 News International Desk
June 2, 2026
in Hindi Editorials
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क्या हमारी थाली सुरक्षित है? -महाराष्ट्र के चौंकाने वाले खाद्य नमूना आँकड़ों से पूरे भारत के लिए सबक -पूरे भारत में जीरो टॉलरेंस टू फूड एडल्टरेशन की नीति लागू की जाए -समग्र व्यापक विश्लेषण

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झुकता वही है जिसमें रिश्तो की फ़िक्र होती है

थोड़ा झुकने से अगर रिश्ता टूटने से बचता है तो झुकना ही बेहतर है, सराहनीय विचार – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर हमने कई बार अनेक मुल्कों के बारे में सुने हैं कि दुनिया भर से बेज्ज़ती होने के बाद भी झुकता नहीं, यूक्रेन रूस युद्ध में भी हम सुनते हैं कि इतने महीनों से युद्ध चल रहा है पर कोई झुकने के लिए तैयार नहीं, वैसे ही वैश्विक नेताओं, पार्टियों सहित हाई लेवल स्तरपर भी हमें सुनाई देता है कि कोई झुकने के लिए तैयार नहीं!! परंतु यदि हम भारतीय संस्कृति की बात करें तो हमें पीढ़ियों से सिखाया गया है कि थोड़ा झुककर चलो। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि बड़े बुजुर्गों के दायरे दायरे में अदब से चलेनें झुकने से यदि किसी का भला होता है तो झुकना ही बेहतर है, ऐसे सकारात्मक विचार हम भारतीयों के हैं, जिसे देखकर दुनिया भी भारत को अमूल्य संस्कृति का धनी मानती है। इसी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए किसी ने बहुत सुंदर ही लिखा है, झुकता वही है, जिसमें रिश्तो की फिक्र होती है। थोड़ा झुकने से अगर रिश्ता टूटने से बचता है तो झुकना ही बेहतर है, बिल्कुल सही विचार है। क्योंकि झुकने से नुकसान से कई गुना अधिक फायदा है। इसलिए आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से इसपर चर्चा करेंगे कि मनमुटाव,झगड़ा,भेदभाव,परेशानी कलह इत्यादि परेशानियों का सबसे सटीक हल झुकना है।
साथियों बात अगर हम मनुष्य के जीवन में रिश्तों की करें तो, मनुष्य जीवन रिश्तों से जुड़ा हुआ है। रिश्तों के कारण ही मनुष्य जीवन में आगे बढ़ने की, सफलता पाने की, शिक्षित होने की, कार्य करने की इच्छा रखता है। यदि रिश्ते मधुर हों तो जीवन सुखमय व खुशहाल बन जाता है, किंतु रिश्तों में खटास आते ही व्यक्ति भी टूट जाता है। रिश्ता आखिर बिगड़ता क्यों है? इसके पीछे व्यक्ति का अहं, सोच व उसका व्यवहार ही जिम्मेदार होता है। एक विशेषज्ञ का मानना है कि मानना है कि रिश्तों को बिगाड़ने में 50फ़ीसदी से ज्यादा कारण असंयमित भाषा अकड़ और झुकने से इनकार होता है। अध्यात्म और शांति के साथ कार्य करने वाले व्यक्तियों के रिश्ते बेहद सफल होते हैं। रिश्ते निभाना झुकना भी समझौतों का ही दूसरा नाम है। रिश्ते केवल खून के ही नहीं होते, भावनात्मक भी होते हैं। कई बार भावनात्मक रिश्ते अटूट बन जाते हैं, क्योंकि उनमें प्रेम, सामंजस्य, धैर्य, ईमानदारी का साथ होता है। इसलिए इन्हें निभाने के लिए झुकना सबसे सटीक मंत्र है।
साथियों बात अगर हम व्यस्त जिंदगी में रिश्ते बचाने के लिए झुकने के अस्त्र की करें तो, आजकल जिंदगी बहुत ही व्यस्त हो गईं हैं। हर इंसान जैसे भाग रहा हैं, सभी में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ सी लगी हुई हैं। माना समय बदल गया है, लोग शिक्षित हुए हैं, सुख सुविधाओं का विकास हुआ है, उच्च स्तरीय रहन सहन का स्तर बढ़ा है परंतु हम आज कही ना कही अपने रिश्तों की अहमियत खोते जा रहे हैं। अब तो रिश्ते एक दिखावा बनकर रह गए हैं, रिश्तों में प्यार, लगाव लगभग खत्म हो गया है इसका एक मुख्य कारण एकाकी परिवार और झुकने की भावना का अभाव का होना भी है। संयुक्त परिवार अब कम ही रह गए हैं, जो रिश्तेदारों से घर भरे रहते थे वो अब खाली हो गए हैं और अकड़ में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पहले रिश्तों में जो आपसी जुड़ाव था वो अब मात्र औपचारिक हो गया है। काम की तलाश में, पैसा कमाने की होड़ में हम अपने क़ीमती रिश्तों को भुला रहे हैं य़ह सही नहीं है। अब तो माँ-बाप का रिश्ता भी एक बोझ लगने लगा है बच्चे उन्हें छोड़कर दूसरे शहरों में या विदेशों में रहने लगे हैं। रिश्तों में सहनशक्ति झुकने की प्रथा खत्म हो गई हैं हर कोई सिर्फ खुद में ही खुश रहना पसंद करते हैं। प्रगति के दौर की यह एक बड़ी चुनौती है जिसे सुलझाने की कोशिश सभी को करनी चाहिए।
साथियों इसका कारण है आवश्यकताएं बढ़ना। तृष्णा बढ़ना, भोग की अभिलाषा बढ़ना। व्यक्ति की आवश्यकता बढ़ती है तो लोभ बढ़ता है। लोभ बढ़ता है तो व्यक्ति दूसरों से चाहने की उम्मीद करता है।आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये जी तोड़ मेहनत करता है और रिश्तों के लिये समय नही दे पाता है।अपने मे ही आवश्यकताओं के उपभोग की सोचता है। इसलिये एकल परिवार को प्राथमिकता दे देता है, किसी भी बात पर झुकने के लिए तैयार नहीं होता इस तरह अपने ही लोगों के स्नेह से दूर हो जाता है। ग्रामों में लोगों की आवश्यकता कम थी तो उनके पास लोगों से मिलने के लिये समय था। अब आवश्यकता बढ़ गई तो मिलने के लिये समय कम हो गया।परिवारों में जब से पैसे बढे है भौतिकता आ गई तथा परिवार छोटे होने के साथ ही रिश्तों में भी दूरी आ गई। पहले परिवार बड़े थे तो रिश्ते भी होते चाचा, ताऊ, मौसी भी होते थे तो झुकने का गुण भी स्वाभाविक रूप से रहता था अब जब परिवार में एक या दो ही बच्चे होंगे तो बच्चा परिवार की ऐमियात किस प्रकार जानेगा। उसके लिये उसके दोस्त ही परिवार होंगे।
साथियों बात अगर हम लड़ाई झगड़े,आपसी मतभेद मिटाने के अस्त्र की करें तो झुकना सबको प्रेम प्रगाढ़ करने का सटीक मंत्र है। लड़ाई झगड़ा खत्म करने का सबसे बढ़िया तरीका है, झुकना और चुपचाप हो जाना बेहतर तरीका है लड़ाई झगड़ा खत्म कर देने का क्योंकि जितना हम शब्द बाण चलाएंगे उतना ही वाद विवाद को बढ़ावा देंगे क्योंकि यह आग में घी डालने का काम करता है जिससे आग भड़कती ही है ! मौन होकर उस स्थान से दूर चले जाएं या झुक जाएं, अपने कार्य में संलग्न हो जाए जिससे कि आपका दिमाग वहां से हटकर मूड फ्रेश करने में मदद करेगा एवं तनाव खत्म हो जाएगा निश्चित ही आजमाया हुआ फार्मूला ?अक्सर लड़ाई व झगड़े आपसी मतभेद के कारण होते हैं, जो ज्यादातर अस्थायी भावों से उत्पन्न होते हैं। जिसके कारण एक छोटी सी बात की वजह से जिंदगी भर दो व्यक्तियों के रिश्तों में खटास पड़ जाती है और कुछ लोगों के लिए यह इतना बढ़ जाती है कि वे एक दूसरे को खो देते हैं। लड़ाई एवं झगड़ा खत्म करने का सबसे सही तरीका है कि जब आपको लगे की आपके और सामने वाले में मतभेद इस हद तक बढ़ गया है कि सामने वाला आपकी बात तक नही सुन रहा है, तब आप झुक जाए या चुपचाप उससे बात करना बंद कर दें और परिस्थिति के हिसाब से कुछ दिन या कुछ घण्टे बाद उससे बात करें। गलती न होते हुए भी उससे माफ़ी मांग ले व उसे बताये की वह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है। कुछ उदहारण देकर उसे समझाये की मतभेद का हल लड़ाई झगड़े से नही बल्कि शांति से बात करने से होगा। लड़ाई झगड़े के परिणामों का आंकलन करके उसको बताएं। उम्मीद है कि ऐसा करने से लड़ाई खत्म हो जाये।अगर इतना करने पर भी सामने वाला लड़ने पर उतारू हो , तो हाथ जोड़कर चुपचाप झुक जाएं उससे दूर हो जायें। क्योंकि कुछ लोग जिंदगी भर सिर्फ अपने बारे में सोचते है दूसरा चाहे भाड़ में जाये, मौका आने पर वे एक तुच्छ सी वस्तु या बात की आड़ में आपको धोखा देने में ही खुद को पीछे नही रखेंगे।
साथियों घर के सदस्यों को हम बताएं कि जिस घर में लड़ाई-झगड़े होते हैं उस घर में लक्ष्मी जी नहीं आतीं। आ भी जाएं तो ज्यादा दिन नहीं टिकतीं। अगर हमारे घर वाले घर में निर्धनता चाहते हैं तो हम उन्हें समझा कर सही रास्ते पर लाएं।हमर भी प्रयास करें कि जब झगड़ा हो तो हम झुकें और चुप रहें। झगड़े को बढ़ावा न दें। घर में कलह न हो इसके कुछ उपाय करें कि, अगर गलत हो तो अपनी गलती मानों और झुक जाओ, अगर नहीं भी गलत हो तो चुप रहो क्योंकि अगर एक इंसान बोल रहा है तो दूसरे के चुप रहने में ही भलाई है। फालतू बातों को दिल से ना लगाएं, बिना बात के मुद्दे ना बनाए, एक दूसरों की कमियों को नजर अंदाज करें और अच्छाइयों को बढ़ावा दे तो कलह होने के चांस ना के बराबर हो जाते है, तो अगर कलह से छुटकारा पाना है तो शांत रहना तो हम झुकना सीखें।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे दौरान का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच। हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।
झुकता वही है जिसमें रिश्तो की फ़िक्र होती है। थोड़ा झुकने से अगर रिश्ता टूटने से बचता है तो झुकना ही बेहतर है सराहनीय विचार है।

kishanchand sanmukhadas Bhawnani
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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