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दुनियाँ में स्वास्थ्य क्रांति का नया अध्याय: महाराष्ट्र मॉडल -बीमारी से जंग अकेले नहीं :सरकार,अस्पताल और एनजीओस की साझेदारी -भारत के सभी राज्यों व पूरी दुनियाँ को अपनाने की ज़रूरत

by Page 3 News International Desk
August 24, 2026
in Hindi Editorials, Hindi News
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जब सरकार,अस्पताल और मानवता साथ आए: क़्या महाराष्ट्र का त्रिपक्षीय सामंजस्य करार नया मॉडल बनेगा वैश्विक स्वास्थ्य क्रांति का नया अध्याय?

एक मरीज,एक परिवार और तीन मजबूत सहारे :भारत से दुनियाँ तक स्वास्थ्य सुरक्षा की नई वैश्विक राह -क़्या महाराष्ट्र का मॉडल बनेगा दुनियाँ के लिए ब्लूप्रिंट? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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पितृ पक्ष 2026 -पितरों को तर्पण -मृत्यु के बाद भव्य श्राद्ध,पर जीते-जी बुजुर्गों व माता-पिता की उपेक्षा क्यों? -डिजिटल पीढ़ी के सामने संस्कारों की सबसे बड़ी परीक्षा -अब संवेदनाओं की सामाजिक क्रांति ज़रूरी -समग्र व्यापक विश्लेषण

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी में चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी ऊँचाइयाँ हासिल कर ली हैं,जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव मानी जाती थी। जटिल सर्जरी,अत्याधुनिक कैंसर उपचार,अंगप्रत्यारोपण रोबोटिक तकनीक और जीवनरक्षक दवाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को नई उम्मीद दी है।लेकिन इसवैज्ञानिक उपलब्धि के समानांतर एक गंभीर मानवीय प्रश्न आज भी पूरी दुनियाँ के सामने खड़ा है,क्या इलाज उपलब्ध होने मात्र से स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती है? यदि किसी गरीब परिवार को अस्पताल में उपचार तो मिल जाए, लेकिन इलाज के दौरान रहने,भोजन,परिवहन,कागजी प्रक्रिया और देखभाल के खर्च के कारण वह कर्ज में डूब जाए,तो क्या इसे पूर्ण स्वास्थ्य न्याय कहा जा सकता है? यही वह बिंदु है जहां दिनांक 23 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर प्रस्तावित सरकार,धर्मादाय/निजी अस्पतालों और स्वयंसेवी संस्थाओं के बीच त्रिपक्षीय सामंजस्य करार का विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।यह पहल केवल चिकित्सा खर्च को कम करने की अवधारणा नहीं है,बल्कि मरीज के साथ आने वाले परिवार की सामाजिक, आर्थिक और मानवीय सुरक्षा को स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा मानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सोच प्रस्तुत करती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस मॉडल को भारत के हर राज्य केंद्र शासित प्रदेश ही नहीं दुनिया के हर देश ने अपनाना चाहिए क्योंकि विश्व स्तरपर स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला निजी खर्च है।गरीब और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों के लिए गंभीर बीमारी केवल चिकित्सकीय संकट नहीं होती; वह आर्थिक संकट भी बन जाती है। किसी मरीज को कैंसर,हृदय रोग, किडनी की गंभीर बीमारी या किसी जटिल सर्जरी के लिए महानगर में जाना पड़े, तोअस्पताल का बिल केवल समस्या का एक हिस्सा होता है।परिवार को कई सप्ताह या महीनों तक किराये का कमरा, भोजन, स्थानीय परिवहन, जांचों के लिए आवाजाही और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च करना पड़ सकता है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले परिवारों के लिए यह बोझ और भी गंभीर हो जाता है। अनेक मामलों में मरीज के इलाज की व्यवस्था किसी सरकारी योजना या अस्पताल की रियायत से हो जाती है, लेकिन तीमारदारों की बुनियादी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं। यही वह खाली स्थान है जिसे महाराष्ट्र का त्रिपक्षीय मॉडल भरने की सटीकता से कोशिश करता है।
साथियों बात अगर हम इस मॉडल को समझने की करें तो इस मॉडल की मूल शक्ति इसकी त्रिपक्षीय संरचना में है। पहला स्तंभ राज्य सरकार है, जो नीति, वित्तीय सहायता, डिजिटल सत्यापन, निगरानी और जवाबदेही का ढांचा तैयार करती है।मुख्यमंत्री वैद्यकीय सहाय्यता कक्ष जैसे तंत्र का उद्देश्य जरूरतमंद मरीजों को सरकारी चिकित्सा सहायता तक पहुंचाने में मदद करना है।दूसरा स्तंभ धर्मादाय अथवा निजी अस्पताल हैं,जिनके पास विशेषज्ञ चिकित्सक, आधुनिक उपकरण, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू और जटिल उपचार की क्षमता उपलब्ध है। तीसरा और सबसे मानवीय स्तंभ स्वयंसेवी संस्थाएं तथा चैरिटेबल संगठन (एनजीओस) हैं, जो मरीज और उसके परिवार को अस्पताल के बाहर की उन जरूरतों से जोड़ सकते हैं जिन्हें पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज कर देती है। इस प्रकार सरकार की नीति, अस्पताल की चिकित्सा क्षमता और नागरिक समाज की मानवीय संवेदना एक साझा व्यवस्था में जुड़ती है।
साथियों, इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण नवाचार यह है कि स्वास्थ्य सेवा को केवल अस्पताल के भीतर होने वाली चिकित्सा प्रक्रिया नहीं माना जाता।किसी गरीब परिवार के लिए अस्पताल तक पहुंचना ही एक चुनौती हो सकता है। महानगर में पहुंचने के बाद सही विभाग ढूंढना, डॉक्टर तक पहुंचना,सरकारी सहायता के दस्तावेज तैयार करना,जांचों की तारीख समझना,दवाओं की व्यवस्था करना और रहने-खाने की समस्या से निपटना अलग- अलग कठिनाइयां हैं। यदि एक पंजीकृत और जवाबदेह एनजीओस मरीज के परिवार के लिए हेल्थ नेविगेटर की भूमिका निभाए,तो वह परिवार को व्यवस्था के भीतर रास्ता दिखा सकता है। इस व्यवस्था में विश्राम गृह, कम लागत या मुफ्त भोजन, स्थानीय परिवहन संबंधी सहायता, दस्तावेजी मार्गदर्शन और मानसिक संबल जैसी सेवाएं शामिल की जा सकती हैं। इससे उपचार की वास्तविक पहुंच केवल कागज पर नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत हो सकती है।
साथियों इसे एक उदाहरण के रूप में ऐसा समझा जा सकता है कि कल्पना कीजिए कि महाराष्ट्र के किसी दूरस्थ गांव का एक गरीब परिवार अपने आठ वर्षीय बच्चे को लेकर मुंबई या पुणे के किसी बड़े अस्पताल पहुंचता है। बच्चे को गंभीर हृदय रोग है और लंबे उपचार की आवश्यकता है।पारंपरिक व्यवस्था में परिवार को इलाज की आर्थिक चिंता के साथ महानगर में रहने का संकट भी झेलना पड़ सकता है।लेकिन यदि एक प्रभावी त्रिपक्षीय प्रणाली पहले से सक्रिय हो,तो मरीज का सरकारी सहायता के लिए डिजिटल सत्यापन, अस्पताल में उपचार की उपलब्धता और परिवार के लिए सुरक्षित आवास एवं भोजन एक समन्वित प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं। इससे परिवार को अलग- अलग संस्थाओं के चक्कर लगाने के बजाय एकीकृत सहायता मिल सकती है। इस उदाहरण का सबसे बड़ा संदेश यह है कि स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ केवल मरीज को ऑपरेशन टेबल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे उपचार की पूरी यात्रा सुरक्षित और गरिमापूर्ण तरीके से पूरी करने में सटिका से सक्षम बनाना है।
साथियों, इस मॉडल का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम धर्मादाय अस्पतालों और सामाजिक संसाधनों का बेहतर उपयोग है।भारत के अनेक हिस्सों में ऐसे अस्पताल और ट्रस्ट मौजूद हैं जिन्हें सार्वजनिक हित, धर्मादाय गतिविधियों या रियायती सरकारी सुविधाओं के आधार पर सामाजिक दायित्व निभाने होते हैं। यदि गरीब मरीजों के लिएनिर्धारित सेवाओं की पारदर्शी निगरानी हो, डिजिटल रिकॉर्ड बनाए जाएं और पंजीकृत एनजीओस को सामाजिक ऑडिट तथा सहायता व्यवस्था में जिम्मेदार भूमिका दी जाए, तो उपलब्ध चिकित्सा संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।इसका अर्थ केवल अधिक मुफ्त बेड उपलब्ध कराना नहीं है;इसका अर्थ है कि जिस सामाजिक दायित्व के लिए संस्थागत सुविधाएं विकसित हुई हैं, उसका वास्तविक लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे।
साथियों तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र बिचौलियों औरअनधिकृत दलालों की भूमिका को कम करना है।बड़े अस्पतालों के आसपास आने वाले ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर मरीज अक्सर जानकारी की कमी के कारण गलत लोगों के संपर्क में आ जाते हैं। उन्हें महंगी एम्बुलेंस,अनावश्यक जांच,संदिग्ध दवाओं अथवा गैरजरूरी सेवाओं के लिए भुगतान करना पड़ सकता है। यदि सरकारी सहायता, अस्पताल की सेवाएं और पंजीकृत एनजीओस की सहायता एक पारदर्शी डिजिटल प्रणाली से जुड़ी हों,तो मरीज के पास आधिकारिक जानकारी का विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध होगा। इससे अनौपचारिक दलाली की गुंजाइश कम की जा सकती है। हालांकि यह तभी संभव होगा जब एनजीओस का चयन, वित्तीय पारदर्शिता शिकायत निवारण और स्वतंत्र ऑडिट भी उतनी ही मजबूती से लागू किए जाएं।
साथियों, राष्ट्रीय स्तर पर इस मॉडल की उपयोगिता और भी व्यापक हो सकती है।भारत में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी योजनाओं ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल उपचार की वित्तीय सुरक्षा को मजबूत किया है।लेकिन चिकित्सा बीमा या सरकारी उपचार सहायता और परिवार की गैर- चिकित्सकीय जरूरतें दो अलग -अलग प्रश्न हैं। इसलिए भविष्य की स्वास्थ्य नीति में उपचार खर्च के साथ ‘पेशेंट एंड अटेंडेंट सपोर्ट सिस्टम’ को भी जोड़ा जा सकता है।उत्तर प्रदेश, बिहार,मध्य प्रदेश, राजस्थान,गुजरात,तमिलनाडु और अन्य राज्यों में यदि प्रमुख सरकारी,निजी और धर्मादाय अस्पतालों के साथ स्थानीय एनजीओस का सुव्यवस्थित नेटवर्क तैयार किया जाए, तो बड़े महानगरों की ओर होने वाले अनावश्यक मरीज पलायन को कम किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग होगा और मरीजों को अपने राज्य में ही अधिक गरिमापूर्ण उपचार मिल सकेगा।
साथियो यह मॉडल महानगरीय स्वास्थ्य संस्थानों पर दबाव कम करने की दिशा में भी उपयोगी हो सकता है। भारत में कुछ राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों पर अत्यधिक मरीज भार रहता है। यदि राज्यों में क्षेत्रीय कैंसर केंद्र, कार्डियक संस्थान,मेडिकल कॉलेज और सक्षम धर्मादाय अस्पतालों को एकीकृत रेफरल नेटवर्क से जोड़ा जाए तथा मरीजों और तीमारदारों के लिए सहायता केंद्र विकसित किए जाएं, तो स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण संभव है। इससे मरीजों को केवल इसलिए हजारों किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि उनके स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र में जानकारी और समन्वय की कमी है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस अवधारणा की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं।अमेरिका जैसी बीमा-प्रधान स्वास्थ्य व्यवस्था हो अथवा यूरोप की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां,गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज के परिवार पर अप्रत्यक्ष आर्थिक और सामाजिक दबाव कहीं न कहीं मौजूद रहता है।विकसित देशों में भी कैंसर उपचार के दौरान परिवार के सदस्य को नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ सकती है, परिवहन और आवास की समस्या हो सकती है तथा दीर्घकालिक देखभाल के कारण मानसिक तनाव बढ़ सकता है। विकासशील देशों में यह संकट और अधिक गहरा है, जहां स्वास्थ्य खर्च के साथ परिवहन, भोजन और आवास की लागत परिवार को गरीबी की ओर धकेल सकती है।इसलिए सरकार, चिकित्सा संस्थान और नागरिक समाज के बीच औपचारिक साझेदारी की अवधारणा वैश्विक स्वास्थ्य नीति में उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
साथियों,संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-3 काव्यापक उद्देश्य सभी के लिए स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देना है।इस लक्ष्य की वास्तविक सफलता केवल अस्पतालों की संख्या या डॉक्टरों की उपलब्धता से नहीं मापी जा सकती। स्वास्थ्य न्याय का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि आर्थिक स्थिति के कारण कोई व्यक्ति उपचार से वंचित न हो और उपचार प्राप्त करने के बाद उसका परिवार गरीबी में न धकेला जाए। इसी दृष्टि से त्रिपक्षीय मॉडल को एक संभावित पब्लिक – प्राइवेट – सिविल सोसाइटी हेल्थ पार्टनरशिप के रूप में देखा जा सकता हैअंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ऐसे मॉडलों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया, पारदर्शिता मानक, डिजिटल रेफरल सिस्टम और सामाजिक ऑडिट के वैश्विक ढांचे सटीकता से विकसित कर सकती हैं।
साथियों, इस मॉडल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे पहली चुनौती है, जवाबदेही। यदि सरकार, अस्पताल और एनजीओस तीनों जिम्मेदार हैं, तो किसी गलती की स्थिति में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। दूसरी चुनौती है,एनजीओस का चयन।केवल पंजीकरण पर्याप्त नहीं; उनकी वित्तीय पारदर्शिता, कार्यक्षमता, मानव संसाधन और शिकायत निवारण प्रणाली की जांच जरूरी होगी। तीसरी चुनौती है,डिजिटल विभाजन। ग्रामीण और अशिक्षित मरीजों को केवल ऑनलाइन प्रणाली के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; उन्हें भौतिक सहायता केंद्र भी उपलब्ध कराने होंगे। चौथी चुनौती है डेटा सुरक्षा और मरीज की गोपनीयता। स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशील जानकारी को साझा करते समय मजबूत साइबर सुरक्षा और स्पष्ट सहमति व्यवस्था आवश्यक होगी। पांचवीं चुनौती यह है कि मुफ्त या रियायती सेवाओं की गुणवत्ता किसी भी परिस्थिति में कम नहीं होनी चाहिए।इसलिए महाराष्ट्र की पहल को यदि व्यापक नीति का रूप देना है तो केवल एमओंयू पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्पष्ट पात्रता मानदंड, डिजिटल सिंगल-विंडो प्रणाली, अस्पतालों की सेवा-क्षमता का सार्वजनिक डैशबोर्ड, एनजीओस की स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था, मरीज शिकायत निवारण तंत्र, हेल्पलाइन, सामाजिक प्रभाव का वार्षिक मूल्यांकन और परिणाम आधारित निगरानी आवश्यक होगी। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सहायता वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचे और किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार, पक्षपात या संसाधनों के दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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