संभवतःहेक्सागनका घोषित उद्देश्य कट्टरपंथी शक्तियों, विशेषकर ईरान-समर्थित नेटवर्क और उग्रवादी संगठनों के विरुद्ध समन्वित रणनीति बनाना है
भारत-इज़राइल संबंधों की प्रगति, संभावित हेक्सागन ढाँचा,पाकिस्तान की कूटनीतिक प्रतिक्रिया और मध्य पूर्व की बदलती राजनीति पर दुनियाँ की नज़र -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियाँ की नजरें यह देखकर महसूस कर रही है कि भारतीय पीएम का 25 से 26 फ़रवरी 2026 क़ा दो दिवसीय राजकीय दौरे पर इज़राइल पहुँचना केवल एक द्विपक्षीय यात्रा नहीं,बल्कि 21वीं सदी की बदलती वैश्विक संरचना का प्रतीकात्मक और रणनीतिक संकेत है।इस यात्रा में उनकी मुलाकात इज़राइल के पीएम और राष्ट्रपति से
प्रस्तावित है, साथ ही इज़राइली संसद नेसेट को संबोधित करना एक विशेष कूटनीतिक सम्मान माना जा रहा है। किसी भी विदेशी नेता को नेसेट में भाषण का अवसर मिलना इज़राइल की राजनीतिक प्रणाली में उच्च स्तरीय विश्वास और साझेदारी का संकेत है।पीएम का यह दूसरा इज़राइल दौरा है,जो यह दर्शाता है कि 2017 में स्थापित खुले और प्रत्यक्ष राजनीतिक संवाद की निरंतरता अब सामरिक गहराई में परिवर्तित हो रही है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह महसूस कर रहा हूं कि इस यात्रा का एक रोचक आयाम यह भी है कि पीएम की उड़ान को वैश्विक स्तरपर सबसे अधिक ट्रैक किया गया।अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट- ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म फ्लाइटराडार 24 के आंकड़ों के अनुसार, उनकी फ्लाइट की रियल-टाइम लोकेशन,गति और रूट को दुनियाँ भर के उपयोगकर्ताओं ने अभूतपूर्व संख्या में ट्रैक किया। यह केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं थी,बल्कि वैश्विक राजनीतिक समुदाय की उस उत्सुकता का द्योतक था जो भारत-इज़राइल समीकरण के संभावित प्रभावों को लेकर मौजूद है। जब किसी राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा इस स्तर की डिजिटल निगरानी आकर्षित करे,तो यह संकेत देता है कि उसके निर्णय और वार्ताएँ क्षेत्रीय शक्ति- संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।
साथियों बात अगर हम इस राजकीय दौरे क़े संदर्भ में कुछ इस्लामिक देश व पड़ोसी मुल्क की चिंता को समझने की करें तो स्वाभाविक रूप से यह उभरती है। इस्लामाबाद लंबे समय से भारत-इज़राइल रक्षा सहयोग को अपनी सुरक्षा नीति के दृष्टिकोण से देखता रहा है। पाकिस्तान की संसद, विशेषकर सीनेट, ने 24 फरवरी 2026 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर भारत- इज़राइल सामरिक समीकरण और तथाकथित हेक्सागन अलायंस की अवधारणा पर आपत्ति दर्ज की। इस प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि यह गठबंधन मुस्लिम देशों की एकता को विभाजित करने का प्रयास है और क्षेत्रीय शांति के लिए चुनौती बन सकता हैपाकिस्तान की राजनीतिक भाषा में यह प्रतिक्रिया केवल कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा-मानसिकता और भू- राजनीतिक आशंकाओं का प्रतिबिंब है।हेक्सागन अलायंस की अवधारणा, जिसे नेतन्याहू ने एक कैबिनेट बैठक में प्रस्तुत किया,मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में गठबंधनों के एक नए तंत्र की ओर संकेत करती है। इस प्रस्तावित संरचना में भारत, इज़राइल, ग्रीस, साइप्रस और कुछ उदारवादी अरब तथा अफ्रीकी देशों के शामिल होने की चर्चा है।इसका घोषित उद्देश्य कट्टरपंथी शक्तियों, विशेषकर ईरान-समर्थित नेटवर्क और उग्रवादी संगठनों के विरुद्ध समन्वित रणनीति बनाना है। यदि इसे व्यापक भू- राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह पश्चिम एशिया में उभरते बहुपक्षीय सुरक्षा ढाँचों की निरंतरता का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें क्षेत्रीय शक्तियाँ अमेरिका की पारंपरिक भूमिका से परे स्वयं की सामूहिक सुरक्षा संरचना विकसित करना चाहती हैं।पाकिस्तान की सीनेट द्वारा पारित प्रस्ताव में यह भी आरोप लगाया गया कि यह गठबंधन मुस्लिम उम्माह की एकता को तोड़ने की साजिश है। किंतु अंतरराष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें तो गठबंधन प्रायः साझा हितों और सुरक्षा-चिंताओं के आधार पर बनते हैं,न कि धार्मिक पहचान के आधार पर।भारत स्वयं एक बहुलतावादी लोकतंत्र है, जिसकी विदेश नीतिऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। इज़राइल के साथ उसकी साझेदारी को केवल धार्मिक या वैचारिक चश्मे से देखना भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को सरल बनाकर सटीक रूप से प्रस्तुत करना होगा।
साथियों बात अगर हम इस पूरे घटनाक्रम में एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व सोमालीलैंड की मान्यता के मुद्दे को समझने की करें तो,26 दिसंबर 2025 को इज़राइल द्वारा सोमालीलैंड को स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने की घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छेड़ दी। पाकिस्तान और लगभग 20 अन्य देशों के साथ-साथ आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोआपरेशन ने इसकी आलोचना कीपाकिस्तान की सीनेट ने अपने प्रस्ताव में इस निर्णय को भी क्षेत्रीय संप्रभुता के विरुद्ध बताया। यह स्पष्ट है कि इज़राइल की यह नीति मुस्लिम- बहुल देशों के एक हिस्से में असंतोष का कारण बनी है, और भारत- इज़राइल समीकरण को उसी व्यापक संदर्भ में जोड़ा जा रहा है।भारत के दृष्टिकोण से यह यात्रा केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व भारत के ऊर्जा-स्रोतों, प्रवासी भारतीयों और व्यापारिक हितों का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इज़राइल के साथ घनिष्ठ संबंध, खाड़ी देशों के साथ भारत की मजबूत होती साझेदारी के समानांतर चल रहे हैं। पिछले वर्षों में भारत ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ आर्थिक एवं सामरिक संबंधों को सुदृढ़ किया है। अतः यह मान लेना कि भारत किसी मुस्लिम-विरोधी धुरी का हिस्सा बन रहा है,एक अतिसरलीकरण होगा। भारत की नीति संतुलन, बहुपक्षीय सहयोग और व्यावहारिक कूटनीति पर आधारित है।
साथियों बात अगर हम मीडिया कवरेज में जिस प्रकार भूचाल और नींद उड़ने जैसे शब्दों का प्रयोग हो रहा है, इसको समझने की करें तो वह इस विषय की संवेदनशीलता को दर्शाता है। किंतु कूटनीति में भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से अधिक महत्व दीर्घकालिक हितों का होता है। भारत और इज़राइल दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ हैं, जो अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए साझेदारी कर रहे हैं। पाकिस्तान की प्रतिक्रिया उसकी रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा है,परंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि क्षेत्र युद्ध या अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है, अभी जल्दबाजी होगी।
साथियों बात अगर हम भारत और इज़राइल के बीच रणनीतिक साझेदारी को समझने की करें तो बीते एक दशक में बहुआयामी स्वरूप ले चुकी है।रक्षा और सुरक्षा सहयोग तो इसकी धुरी रहे हैं,किंतु विज्ञान एवंप्रौद्योगिकी कृषि नवाचार,जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा,स्टार्टअप पारिस्थितिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी गहराई है।भारत के लिए इज़राइल अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन प्रणाली, मिसाइल रक्षा और निगरानी तंत्र का विश्वसनीय स्रोत रहा है,जबकि इज़राइल के लिए भारत एक विशाल बाजार,तकनीकी प्रतिभा और रणनीतिक गहराई प्रदान करता है। इस यात्रा में दोनों नेताओं द्वारा रक्षा सौदों, संयुक्त उत्पादन और लेजर- आधारित हवाई रक्षा प्रणाली पर चर्चा की संभावना ने विशेष ध्यान आकर्षित किया है। यदि भारत इज़राइल की उन्नत लेजर एयर- डिफेंस प्रणाली का भागीदार बनता है,तो यह दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन को नई दिशा दे सकता है।
साथियों बात अगर हम नेसेट में भारतीय पीएम क़े संबोधन को समझने की करें तो इस साझेदारी के प्रतीकात्मक चरम का प्रतिनिधित्व करेगा। यह भाषण न केवल द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करेगा,बल्कि संभवत वैश्विक शांति, आतंकवाद -रोधी सहयोग और तकनीकी साझेदारी के साझा दृष्टिकोण को भी रेखांकित करेगा। इज़राइल के लिए भारत एक उभरती वैश्विक शक्ति है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वहीं भारत के लिए इज़राइल एक ऐसा तकनीकी साझेदार है जो नवाचार और सुरक्षा के क्षेत्र में अग्रणी है। इस परस्परता ने दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार बना दिया है।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस यात्रा को समझने की करें तो, अमेरिका यूरोप और मध्य पूर्व के नीति-निर्माताओं द्वारा ध्यानपूर्वक देखा जा रहा है। यदि हेक्सागन जैसी कोई संरचना औपचारिक रूप लेती है, तो यह पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित कर सकती है।इससे ईरान- केन्द्रित धुरी और उसके सहयोगी देशों की रणनीति पर भी प्रभाव पड़ेगा। दक्षिण एशिया में भारत की रक्षा-क्षमता में वृद्धि पाकिस्तान के रणनीतिक गणित को बदल सकती है, जिससे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का नया चरण प्रारंभ हो सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारतीय पीएम की यह यात्रा 21वीं सदी के बहुध्रुवीय विश्व में उभरते नए समीकरणों का प्रतीक है।यह दर्शाती है कि राष्ट्र अब वैचारिक सीमाओं से परे व्यावहारिक साझेदारी की ओर अग्रसर हैं। भारत-इज़राइल संबंधों की प्रगति, संभावित हेक्सागन ढाँचा,पाकिस्तान की कूटनीतिक प्रतिक्रिया और मध्य पूर्व की बदलती राजनीति-ये सभी मिलकर उस वैश्विक परिदृश्य का निर्माण कर रहे हैं जहाँ गठबंधन लचीले,बहुस्तरीय और हित-आधारित होंगे।आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह साझेदारी क्षेत्रीय स्थिरता को सुदृढ़ करती है या प्रतिस्पर्धा को तीव्र बनाती है,किंतु फिलहाल इतना निश्चित है कि यह यात्रा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है।
