देश के अनेक हिस्सों में अत्यधिक वर्षा, बाढ़, शहरी जलभराव और दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी क़ा संकेत -मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है
जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकारों का नहीं प्रत्येक नागरिक का दायित्व – वृक्षारोपण,प्लास्टिक के उपयोग में कमी,पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली जैसे छोटे-छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी में किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता,आर्थिक विकास दर अथवातकनीकी उपलब्धियों से नहीं आँकी जाएगी,बल्कि इस बात से भी निर्धारित होगी कि वह जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती के सामने अपने नागरिकों,संसाधनों और विकास की निरंतरता को कितनी प्रभावी ढंग से सुरक्षित रख पाता है।प्राकृतिक आपदाएँ अब अपवाद नहीं रहीं; वे जलवायु परिवर्तन के कारण एक नई वैश्विक वास्तविकता बनती जा रही हैं। इसलिए भारत के लिए यह समय केवल परिस्थितियों का सामना करने का नहीं, बल्कि भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसी राष्ट्रीय रणनीति विकसित करने का है, जो आने वाली पीढ़ियों को अधिक सुरक्षित,सक्षम और पर्यावरण- अनुकूल भारत प्रदान कर सके।इसलिए मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,गोंदिया महाराष्ट्र मानता हूं कि यह समय की माँग है कि जलवायु परिवर्तन को केवल राज्य व केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का विषय न मानकर राष्ट्रीय नीति और विकास रणनीति के केंद्र में रखा जाए।सरकार को चाहिए कि आपदा प्रबंधन को केवल राहत और पुनर्वास तक सीमित न रखकर उसे राष्ट्रीय विकास नीति का अनिवार्य अंग बनाया जाए।प्रत्येक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय अवसंरचना परियोजना चाहे वह राजमार्ग हो,रेलवे,स्मार्ट सिटी, औद्योगिक गलियारा, बंदरगाह या आवासीय परियोजना उसका जलवायु जोखिम मूल्यांकन अनिवार्य किया जाना चाहिए। यदि विकास परियोजनाएँ संभावित प्राकृतिक जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, तो भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान और जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।यह दृष्टिकोण अल्पकालिक खर्च अवश्य बढ़ाएगा,परंतु दीर्घकाल में राष्ट्र को कहीं अधिक सुरक्षित और आर्थिक रूप से सटीकता से सक्षम बनाएगा।
साथियों,वर्तमान मानसून 7 जुलाई 2026 शाम 6 बजे तक ने देश के अनेक राज्यों को प्रभावित किया है। महाराष्ट्र केरल,कर्नाटक,उत्तराखंड,हिमाचल प्रदेश,असम तथा पूर्वोत्तर के कई क्षेत्रों में भारी वर्षा, जलभराव, भूस्खलन और नदी तंत्र के उफान ने जनजीवन को प्रभावित किया है। विशेष रूप से महानगरों में कुछ घंटों की वर्षा भी यातायात,स्वास्थ्य सेवाओं,बिजली आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर देती है।वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि अनियोजित निर्माण, वनों की कटाई और बदलते वर्षा पैटर्न ने जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन का परिणाम भी है।जहाँ पहले कई दिनों तक सामान्य वर्षा होती थी, वहीं अब कुछ ही घंटों में अत्यधिक वर्षा होने लगी है। इससे शहरी जलनिकासी व्यवस्था,नदी तंत्र और पहाड़ी ढलानों पर अचानक दबाव बढ़ता है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में फ्लैश फ्लड,बादल फटना, समुद्री तूफान और भीषण गर्मी जैसी घटनाएँ पहले की तुलना में अधिक तीव्र और अधिक बार दिखाई दे रही हैं। भारत भी इस वैश्विक परिवर्तन से अछूता नहीं है।
साथियों,जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव समाज के उस वर्ग पर पड़ता है जिसकी आजीविका सीधे प्रकृति पर निर्भर है। भारत की बड़ी आबादी कृषि, मत्स्य पालन, वानिकी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है। असमय वर्षा, लंबे सूखे, ओलावृष्टि और बाढ़ किसानों की मेहनत को कुछ ही घंटों में नष्ट कर देते हैं। इससे खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय,रोजगार और महँगाई सभी प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में उद्योग,परिवहन पर्यटन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ भी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होकर आर्थिक नुकसान को बढ़ाती हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुका है।
साथियों, स्थानीय प्रशासन की भूमिका इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।जिला प्रशासन, नगर निकाय, ग्राम पंचायतें और स्थानीय समुदाय आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति होते हैं। इसलिए प्रत्येक जिले के लिए स्थानीय भूगोल, वर्षा पैटर्न, नदी तंत्र,भूस्खलन संभावित क्षेत्रों तथा शहरी जलभराव के आधार पर स्थानीय आपदा कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिएडिजिटल मानचित्रण रीयल-टाइम मॉनिटरिंग और मोबाइल आधारित चेतावनी प्रणाली को गाँव-गाँव तक पहुँचाना अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है। जिस प्रकार टीकाकरण या स्वच्छता अभियान जनआंदोलन बने, उसी प्रकार आपदा जागरूकता और जलवायु अनुकूलन को भी जनभागीदारी का अभियान बनाना होगा।शिक्षा इस परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम हो सकती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, प्राथमिक उपचार तथा सामुदायिक सेवा जैसे विषयों को व्यवहारिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। यदि बचपन से ही नागरिकों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और आपदा के समय सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होगी, तो भविष्य का समाज अधिक जिम्मेदार और अधिक सुरक्षित होगा। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे बड़ी लड़ाई केवल सरकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक ही जीत सकते हैं।
साथियो, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकारों का नहीं,बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।जल संरक्षण,ऊर्जा की बचत, वृक्षारोपण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता, स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली जैसे छोटे-छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। प्रकृति के साथ संतुलित संबंध ही मानव सभ्यता की स्थायी सुरक्षा का सबसे प्रभावी मार्ग है।आज भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर तीव्र आर्थिक विकास,आधुनिक तकनीक और वैश्विक नेतृत्व की संभावनाएँ हैं, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। यदि भारत इन चुनौतियों को दूरदृष्टि, वैज्ञानिक सोच, पारदर्शी शासन, जनभागीदारी और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ अवसर में बदल देता है, तो वह आने वाले दशकों में केवल एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व का सबसे सशक्त आपदा-प्रतिरोधी और जलवायु-सुरक्षित लोकतंत्र बनने की दिशा में भी सटिका से अग्रसर होगा।
साथियों, इस चुनौती का समाधान केवल सरकारों के पास नहीं है। निजी क्षेत्र और उद्योग जगत की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों का कठोर पालन, हरित ऊर्जा का उपयोग,कार्बन उत्सर्जन में कमी, जल संरक्षण और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से स्थानीय आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना के निर्माण में योगदान देना चाहिए,उद्योगों को हरित प्रौद्योगिकी अपनानी होगी, शहरों को प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों का संरक्षण करना होगा, किसानों को जलवायु -अनुकूल कृषि पद्धतियाँ अपनानी होंगी और प्रत्येक नागरिक को जल संरक्षण,वृक्षारोपण, ऊर्जा बचत तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे प्रभावी लड़ाई जनभागीदारी से ही जीती जा सकती है।आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विकसित भारत का लक्ष्य है, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है, वैज्ञानिक सोच को नीति का आधार बनाया जाता है और आपदा प्रबंधन को आपदा-प्रतिरोधी विकास में परिवर्तित किया जाता है, तो भारत न केवल अपने नागरिकों को सुरक्षित भविष्य दे सकेगा, बल्कि विश्व के लिए एक अनुकरणीय मॉडल भी प्रस्तुत करेगा।
साथियों, भारत ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति भी की है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, राज्य आपदा प्रबंधन संस्थाएँ, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, अंतरिक्ष आधारित मौसम निगरानी प्रणाली तथा समय पर चेतावनी देने वाली तकनीकों ने अनेक अवसरों पर जनहानि को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चक्रवातों के दौरान समय रहते लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना भारत की प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण है। किंतु बदलती जलवायु परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि भविष्य की चुनौतियाँ वर्तमान व्यवस्थाओं से कहीं अधिक जटिल होंगी। इसलिए केवल राहत कार्यों पर आधारित व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी; जोखिम को पहले से कम करने वाली नीतियों पर अधिक बल देना होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की भूमिका निरंतर महत्वपूर्ण होती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन तथा वैश्विक जलवायु मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत केवल अपने लिए नहीं, बल्कि विश्व के लिए भी समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता रखता है। विकासशील देशों की आवश्यकताओं और विकसित देशों की तकनीकी क्षमता के बीच भारत एक सेतु की भूमिका निभा सकता है।यदि भारत जलवायु-अनुकूल कृषि, हरित ऊर्जा, डिजिटल आपदा प्रबंधन और सतत शहरी विकास के सफल मॉडल प्रस्तुत करता है, तो वह वैश्विक दक्षिण के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बदलता मानसून और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ हमें भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि समय रहते चेताने के लिए हैं।यह केवल मौसम का परिवर्तन नहीं,बल्कि विकास की दिशा बदलने का संदेश है। यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व ही स्थायी प्रगति का आधार है। अब समय आ गया है कि भारत जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा न मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा,आर्थिक नीति,कृषि सुधार,शहरी विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व के केंद्र में रखे। यही दूरदर्शिता भारत को आने वाले दशकों में एक जलवायु-सुरक्षित, आपदा- प्रतिरोधी और सतत विकास की वैश्विक मिसाल बना सकती है। यही 21वीं सदी के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

