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अग्निकांडों से सीख: यह केवल एक व्यक्ति या संस्था की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की विफ़लता- जवाबदेही संस्थागत विफलताएँ भ्रष्टाचार और भविष्य की सुरक्षा का वैश्विक परिप्रेक्ष्य समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
June 4, 2026
in Hindi Editorials
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अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं,यह उस पूरे प्रशासनिक, नियामक और सामाजिक तंत्र की प्रणालीगत विफ़लता है जो नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है?

जब तक पारदर्शिता,नियमित निरीक्षण,शून्य- सहिष्णुता वाली भ्रष्टाचार-विरोधी नीति,संस्थागत समन्वय और कठोर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी,तब तक ऐसी त्रासदियाँ बार-बार मानव जीवन की भारी कीमत वसूलती रहेंगी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तर पर फिर एक बार हड़कंप मच गया जब दिल्ली के मालवीय नगर क्षेत्र में 3 जून 2026 को हुए भीषण अग्निकांड में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु और घायल होने की खबर ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जब किसी होटल,अस्पताल, मॉल, स्कूल, औद्योगिक इकाई या व्यावसायिक भवन में आग लगती है तो आखिर ऐसी त्रासदी केवल आग के कारण होती है या उसके पीछे वर्षों से जमा होती आ रही प्रशासनिक, तकनीकी और संस्थागत विफलताओं की लंबी श्रृंखला भी जिम्मेदार होती है। दुनियाँ के किसी भी देश में आग लगना एक दुर्घटना हो सकती है,लेकिन आग के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होना अक्सर एक प्रणालीगत विफलता माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश बड़े अग्निकांडों में मौतें केवल आग से नहीं बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी, निकासी व्यवस्था की कमी, आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी,निरीक्षण तंत्र की कमजोरी और भ्रष्टाचार के कारण होती हैं।इसलिए किसी भी अग्निकांड की जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि आग कैसे लगी, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि ऐसी स्थिति बनने ही क्यों दी गई।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि, 3 जून 2026 की सुबह भारत की राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल और उससे जुड़े रेस्तरां में लगी भीषण आग ने केवल 21 से अधिक लोगों की जान नहीं ली,बल्कि देश की शहरी सुरक्षा व्यवस्था,नियामक तंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक सुरक्षा संस्कृति पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया। मीडिया में आए प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार भवन को केवल 6 कमरों की अनुमति थी,जबकि वहां लगभग 25 कमरे संचालित किए जा रहे थे। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि भवन के पास वैध फायर एनओसी नहीं थी तथा अंदर आने- जाने के लिए प्रभावी आपातकालीन निकास व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं थी। बेसमेंट में लोगों के फंस जाने की खबरों ने स्थिति को और भयावह बना दिया।इस त्रासदी में 21 लोगों की मृत्यु हुई, 40 से अधिक लोगों को बचाया गया तथा अनेक गंभीर रूप से घायल अस्पतालों में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। मृतकों में मध्य एशिया और अफ्रीकी देशों के कई विदेशी नागरिक भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो भारत में चिकित्सा उपचार या अन्य कारणों से आए थेप्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार लोग धुएं और लपटों से बचने के लिए तीसरी और चौथी मंजिल से कूदने को मजबूर हो गए, जबकि स्थानीय नागरिक नीचे गद्दे बिछाकर उनकी जान बचाने का प्रयास कर रहे थे। यह घटना किसी भूकंप, बाढ़ या प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं थी, बल्कि प्रथम दृष्टया मानवीय लापरवाही,नियमों कीअवहेलना भ्रष्टाचार, कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी का परिणाम प्रतीत होती है। यही कारण है कि यह दुर्घटना केवल एक होटल अग्निकांड नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय शहरी प्रशासन की विफलताओं का प्रतीक बन गई है।
साथियों बात अगर हम ऐसी घटनाओं के भारतीय इतिहास की करें तो, भारत का इतिहास ऐसी दर्दनाक घटनाओं से भरा पड़ा है। वर्ष 1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा फायर में 59 लोगों की मृत्यु हुई थी। जांच में सामने आया कि आपातकालीन निकास मार्ग अवरुद्ध थे, सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था तथा प्रबंधन और प्रशासन दोनों स्तरों पर गंभीर लापरवाही हुई थी। वर्ष 2004 में कुम्बाकूनम स्कूल फायर में 94 स्कूली बच्चों की मृत्यु हुई।विद्यालय में अग्नि सुरक्षा प्रबंधअत्यंत कमजोर थे और ज्वलनशील सामग्री का उपयोग किया गया था। वर्ष 2019 में अनाज मंडी फायर में 43 लोगों की मृत्यु हुई, जहां फैक्ट्री अवैध रूप से संचालित हो रही थी और निकास व्यवस्था अपर्याप्त थी। उसी वर्ष दिल्ली के मुंडका फायर ट्रेगेडी जैसे मामलों में भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। पश्चिम बंगाल के अमरी हॉस्पिटल फायर में 90 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी, जहां धुएं और आपातकालीन प्रबंधन की विफलता प्रमुख कारण बने। इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है,नियमों का उल्लंघन, कमजोर निरीक्षण, भ्रष्टाचार, अपर्याप्त फायर ऑडिट और एजेंसियों के बीच सटीकता से समन्वय की कमी।
साथियों, किसी भी बड़े शहर में अग्निशमन सेवा या फायर ब्रिगेड अंतिम रक्षा पंक्ति होती है। जब आग लग जाती है तब फायर ब्रिगेड को बुलाया जाता है, लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या फायर विभाग ने भवन का समय- समय पर निरीक्षण किया था, क्या भवन के पास वैध अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र था,क्या अग्निशमन उपकरण कार्यरत थे, क्या स्प्रिंकलर सिस्टम और स्मोक डिटेक्टर सक्रिय थे और क्या भवन मालिकों ने नियमों का पालन किया था। अनेक मामलों में देखा गया है कि फायर विभाग निरीक्षण तो करता है लेकिन बाद में नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई देशों में जांच रिपोर्टों ने यह दिखाया है कि अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र मिलने के बाद वर्षों तक दोबारा प्रभावी निरीक्षण नहीं होता। परिणामस्वरूप भवनों में अतिरिक्त कमरे, अवैध निर्माण, बंद आपातकालीन निकास और क्षमता से अधिक लोगों को रखने जैसी खतरनाक स्थितियाँ विकसित हो जाती हैं। यदि किसी भवन को छह कमरों की अनुमति मिली हो और बाद में उसमें कई गुना अधिक कमरे बना दिए जाएँ तो यह केवल भवन मालिक की गलती नहीं बल्कि निगरानी तंत्र कीसटीकता से विफलता भी मानी जाएगी।
साथियों पुलिस की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।सामान्यतः पुलिस को आपदा के समय कानून- व्यवस्था बनाए रखने,बचाव कार्यों को सुगम बनाने और अपराध संबंधी जांच करने का दायित्व दिया जाता है। लेकिन कई बार पुलिस का स्थानीय स्तर पर भवनों, होटलों, गेस्ट हाउसों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बारे में पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं होता। कुछ मामलों में अवैध गतिविधियों या नियमों के उल्लंघन की जानकारी होने के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं की जाती। आपदा के बाद पुलिस अक्सर जांच शुरू करती है,जबकि वास्तविकvआवश्यकता जोखिमों की पूर्व पहचान और निवारक कार्रवाई की होती है।विकसित देशों में पुलिस, अग्निशमन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच डेटा साझा करने की व्यवस्था होती है जिससे जोखिम वाले भवनों की पहचान पहले से की जा सके। भारत सहित अनेक विकासशील देशों में यह समन्वय अभी भी सीमित दिखाई देता है।
साथियों,आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की जिम्मेदारी केवल आपदा के बाद राहत देना नहीं बल्कि जोखिम को कम करना भी है।यदि किसी महानगर में हजारों होटल, हॉस्टल अस्पताल और व्यावसायिक इमारतें हैं तो यह सुनिश्चित करना आपदा प्रबंधन संस्थाओं का भी दायित्व है कि आपातकालीन निकासी योजना,मॉक ड्रिल, प्रशिक्षण और जन-जागरूकता कार्यक्रम नियमित रूप से संचालित हों। अक्सर पाया जाता है कि मॉक ड्रिल केवल कागजों में पूरी हो जाती है या सीमित स्तर पर आयोजित होती है। जब वास्तविक आपदा आती है तब कर्मचारी, सुरक्षा गार्ड और भवन प्रबंधक नहीं जानते कि लोगों को सुरक्षित बाहर कैसे निकाला जाए। इससे भगदड़, घबराहट और मृत्यु की संख्या बढ़ जाती है। एम्बुलेंस सेवाओं और चिकित्सा आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की कमियाँ भी अनेक बार सामने आती हैं। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किसी बड़े शहर में आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया का समय न्यूनतम होना चाहिए। लेकिन ट्रैफिक जाम, अपर्याप्त एम्बुलेंस, समन्वय की कमी और अस्पतालों में तैयारी के अभाव के कारण घायल लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। अग्निकांडों में धुएँ से दम घुटना एक प्रमुख कारण होता है और ऐसे मामलों में शुरुआती कुछ मिनट अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। यदि चिकित्सा सहायता में देरी होती है तो बचाई जा सकने वाली जानें भी चली जाती हैं।
साथियों, स्थानीय निकायों और नगर निगमों की जवाबदेही शायद सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि भवन निर्माण की अनुमति,उपयोग परिवर्तन, व्यापार लाइसेंस और भवन सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी इन्हीं के पास होती है। दुनियाँ भर में हुई अनेक त्रासदियों की जांच में पाया गया कि भवन निर्माण नियमों का पालन नहीं किया गया था। कहीं अवैध मंजिलें बनाई गई थीं, कहीं निकास मार्ग बंद थे, कहीं विद्युत तारों का रखरखाव खराब था और कहीं अग्नि सुरक्षाउपकरण केवल दिखावे के लिए लगाए गए थे। यदि किसी नगर निकाय के रिकॉर्ड में भवन की एक स्थिति दर्ज हो और वास्तविकता में वह पूरी तरह अलग हो, तो यह निरीक्षण और प्रवर्तन तंत्र की गंभीर विफलता का संकेत है।
साथियों, भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे संवेदनशील लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है। दुनिया के अनेक देशों में हुई आपदाओं की जांच रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों को कभी-कभी रिश्वत, राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक उदासीनता के कारण संरक्षण मिल जाता है। जब सुरक्षा प्रमाणपत्र पैसे या प्रभाव के आधार पर जारी होने लगें, जब निरीक्षण केवल औपचारिकता बन जाए और जब अवैध निर्माण को वर्षों तक अनदेखा किया जाए, तब एक प्रकार से भविष्य की त्रासदी की नींव रखी जा रही होती है। भ्रष्टाचार केवल वित्तीय अपराध नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा है क्योंकि इसके कारण लोगों की जान सटीकता से जोखिम में पड़ जाती है।
साथियों, शहरीकरण की तेज गति भी एक नई चुनौती बनकर उभरी है। महानगरों में भूमि की कीमतें बढ़ने के कारण भवन मालिक अधिक से अधिक जगह का व्यावसायिक उपयोग करना चाहते हैं। परिणामस्वरूप कई बार सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर अतिरिक्त कमरे, अतिरिक्त मंजिलें या अवैध संरचनाएँ बना दी जाती हैं। प्रशासन यदि समय रहते इसे नहीं रोकता तो जोखिम लगातार बढ़ता जाता है।इसलिए शहरी नियोजन और अग्नि सुरक्षा को अलग-अलग विषयों के रूप में नहीं बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।तकनीक का उपयोग भविष्य में ऐसी घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्मार्ट सेंसर, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जोखिम विश्लेषण, डिजिटल भवन रजिस्टर और स्वचालित अलार्म सिस्टम जैसी तकनीकें जोखिम की प्रारंभिक पहचान कर सकती हैं। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ प्रशासनिक इच्छाशक्ति और पारदर्शिता भी हो। केवल उपकरण खरीद लेना पर्याप्त नहीं है; उनका नियमित रखरखाव और परीक्षण भी आवश्यक है।
साथियों, जनता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कई बार लोग सस्ते या सुविधाजनक विकल्पों के कारण ऐसे होटलों और भवनों का उपयोग करते हैं जिनकी सुरक्षा स्थिति संदिग्ध होती है। यदि नागरिक सुरक्षा मानकों के प्रति अधिक जागरूक हों और जोखिमपूर्ण प्रतिष्ठानों के विरुद्ध शिकायत करने की संस्कृति विकसित हो तो प्रशासन पर भी दबाव बनेगा। विकसित देशों में नागरिक सुरक्षा ऑडिट और सामुदायिक निगरानी को आपदा जोखिम न्यूनीकरण का अति महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो कई देशों ने ऐसी घटनाओं से सीख लेकर कठोर सुधार किए हैं। कुछ देशों में डिजिटल निरीक्षण प्रणाली लागू की गई है जिसमें प्रत्येक निरीक्षण की तस्वीरें, वीडियो और जीपीएस आधारित रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध रहते हैं। इससे निरीक्षक की जवाबदेही बढ़ती है। कुछ स्थानों पर भवनों की अग्नि सुरक्षा स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर प्रदर्शित की जाती है ताकि नागरिक स्वयं देख सकें कि कोई भवन सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है या नहीं। कई देशों में यदि किसी भवन में गंभीर सुरक्षा उल्लंघन पाए जाते हैं तो उसे तत्काल सील कर दिया जाता है और संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाती है।जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत साझी जिम्मेदारी है। अक्सर किसी दुर्घटना के बाद केवल भवन मालिक को दोषी ठहराकर मामला समाप्त कर दिया जाता है, जबकि वास्तविकता में जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी होती है। यदि अवैध निर्माण हुआ तो उसे रोकने वाला कौन था? यदि अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी हुआ तो किन आधारों पर हुआ? यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? यदि आपातकालीन निकास बंद थे तो यह किसकी निगरानी में हुआ? यदि बचाव कार्य में देरी हुई तो उसका कारण क्या था? जब तक इन सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे जाते तब तक किसी भी जांच को पूर्ण नहीं माना जा सकता।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि किसी भी अग्निकांड को केवल एक दुर्घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।यह उस पूरे प्रशासनिक, नियामक और सामाजिक तंत्र का परीक्षण होता है जो नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। यदि एक भवन में क्षमता से अधिक लोग ठहराए गए, यदि सुरक्षा उपकरण काम नहीं कर रहे थे,यदि निरीक्षण प्रभावी नहीं थे, यदि भ्रष्टाचार ने नियमों को कमजोर किया,यदि बचाव में देरी हुई और यदि जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह केवल एक व्यक्ति या संस्था की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की विफलता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या दुनिया के किसी भी महानगर में सुरक्षा का मूल सिद्धांत एक ही है,आपदा के बाद राहत से अधिक महत्वपूर्ण है आपदा से पहले रोकथाम। जब तक पारदर्शिता, नियमित निरीक्षण, शून्य-सहिष्णुता वाली भ्रष्टाचार-विरोधी नीति, तकनीकी आधुनिकीकरण, संस्थागत समन्वय और कठोर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी त्रासदियाँ बार-बार मानव जीवन की भारी कीमत वसूलती रहेंगी। इसलिए हर अग्निकांड को एक चेतावनी के रूप में लेकर प्रणालीगत सुधार करना ही उन लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने ऐसी दुर्घटनाओं में अपने प्राण गंवाए हैं।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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