आर्थिक स्वार्थ और वैश्विक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना होग़ा ,ज़ो आने वाले दशकों में विश्व राजनीति की दिशा और मानव सभ्यता के भविष्य को तय करेगा
आज वैश्विक सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा, साझेदारी की जगह रणनीतिक सौदेबाज़ी और एकजुटता की जगह गुटबाज़ी का वातावरण लगातार मजबूत होता दिखाई दे रहा है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तर पर दुनियाँ बदल रही है। कभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार विचारधारा नैतिकता,लोकतंत्र मानवाधिकार या वैश्विक सहयोग को माना जाता था, लेकिन आज विश्व व्यवस्था का वास्तविक केंद्र आर्थिक हित बन चुका है। अब देशों के निर्णय इस बात से कम प्रभावित होते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, बल्कि इस बात से अधिक तय होते हैं कि क्या लाभदायक है और क्या नुकसानदायक। यही कारण है कि वैश्विक सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा, साझेदारी की जगह रणनीतिक सौदेबाज़ी और एकजुटता की जगह गुटबाज़ी का वातावरण लगातार मजबूत होता दिखाई दे रहा है। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा यह कहा जाना कि “आज दुनिया में आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति हो रही है” वास्तव में आधुनिक विश्व राजनीति की सबसे सटीक व्याख्या प्रतीत होती है। यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की वास्तविकता का प्रतिबिंब है। यदि आज दुनियाँ की प्रमुख घटनाओं पर नज़र डाली जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि लगभग हर बड़ी शक्ति अपनी विदेश नीति, कूटनीति, सैन्य रणनीति और व्यापारिक संबंधों को आर्थिक लाभ के चश्मे से देख रही है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण 2022 से जारी रूस-यूक्रेन वह लंबे समय से चलने वाला ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध है। सतह पर इसे लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा का संघर्ष बताया जाता है,लेकिन इसके पीछे ऊर्जा संसाधनों, हथियारों के बाजार, भू-राजनीतिक प्रभाव और वैश्विक शक्ति संतुलन की जटिल प्रतिस्पर्धा भी मौजूद है। यूरोप की ऊर्जा निर्भरता, अमेरिका के रणनीतिक हित और रूस की संसाधन-आधारित शक्ति इस संघर्ष को केवल सैन्य युद्ध नहीं बल्कि आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई भी बनाते हैं। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं के लिए नहीं, बल्कि बाजारों, संसाधनों और प्रभाव क्षेत्रों के लिए भी लड़े जाते हैं।
साथियो, अमेरिका की “अमेरिका फर्स्ट” नीति इस आर्थिक राष्ट्रवाद का सबसे स्पष्ट उदाहरण रही है। चाहे चीन पर भारी टैरिफ लगाना हो, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्गठित करना हो या घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना हो, हर कदम का उद्देश्य अमेरिकी आर्थिक शक्ति को मजबूत करना रहा है। बदलते प्रशासन के बावजूद मूल नीति यही बनी रही कि राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा सर्वोपरि हैं। आज तकनीक, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में अमेरिका की अधिकांश रणनीतियाँ इसी सोच को प्रतिबिंबित करती हैं।
साथियों, दूसरी ओर चीन ने आर्थिक विस्तार को अपनी वैश्विक शक्ति का प्रमुख आधार बनाया है। एशिया, अफ्रीका और यूरोप में विशाल निवेश परियोजनाओं के माध्यम से उसने न केवल नए बाजारों तक पहुंच बनाई बल्कि अपने राजनीतिक प्रभाव का भी विस्तार किया। चीन की रणनीति यह दर्शाती है कि आधुनिक युग में आर्थिक ताकत ही राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है। समुद्री मार्गों, खनिज संसाधनों और उन्नत तकनीकों पर नियंत्रण की उसकी कोशिशें इसी दीर्घकालिक सोच का हिस्सा हैं।
साथियों, यूरोप स्वयं को मानवाधिकार, लोकतंत्र और पर्यावरण संरक्षण का समर्थक बताता है, लेकिन आर्थिक हितों के सामने उसके आदर्श भी कई बार चुनौती का सामना करते हैं। वर्षों तक रूस की सस्ती गैस पर निर्भर रहना इसका प्रमुख उदाहरण है। यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा संकट ने यह दिखा दिया कि नैतिक सिद्धांत और आर्थिक आवश्यकताएँ अक्सर एक- दूसरे से टकराती हैं। यही कारण है कि आज यूरोप को अपनी नीतियों में संतुलन साधने की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
साथियो, रूस की राजनीति भी आर्थिक संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। तेल, गैस, खनिज और हथियार उद्योग उसकी वैश्विक शक्ति के प्रमुख स्तंभ हैं। ऊर्जा आपूर्ति को कूटनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की उसकी रणनीति ने यह साबित किया है कि प्राकृतिक संसाधन आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। आधुनिक विश्व में ऊर्जा सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है जितनी कभी सैन्य सुरक्षा मानी जाती थी।
साथियो, भारत ने इस बदलती दुनिया में अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत ने अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता देते हुए सस्ते तेल की खरीद जारी रखी, वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ तकनीकी एवं व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत किया। यह रणनीति दर्शाती है कि आज का भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखकर निर्णय लेना चाहता है। “आत्मनिर्भर भारत”, “मेक इन इंडिया” और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे कार्यक्रम भी इसी आर्थिक आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति हैं।मध्य-पूर्व की राजनीति भी आर्थिक स्वार्थ और रणनीतिक हितों का उत्कृष्ट उदाहरण है। तेल और गैस के विशाल भंडारों ने इस क्षेत्र को दशकों से वैश्विक राजनीति का केंद्र बनाए रखा है। क्षेत्रीय संघर्षों, गठबंधनों और कूटनीतिक समीकरणों के पीछे ऊर्जा मार्गों और संसाधनों पर नियंत्रण की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि विश्व की लगभग हर बड़ी शक्ति इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखना चाहती है।
साथियों, अफ्रीका आज नई वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है। लिथियम, कोबाल्ट और अन्य दुर्लभ खनिजों की बढ़ती मांग ने इसे भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना दिया है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आवश्यक ये संसाधन दुनिया की बड़ी शक्तियों को अफ्रीका की ओर आकर्षित कर रहे हैं। परिणामस्वरूप यह महाद्वीप आर्थिक अवसरों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दोनों का केंद्र बन चुका है।तकनीक ने इस आर्थिक राजनीति को और अधिक तीव्र बना दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, 5जी नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और डेटा नियंत्रण आज राष्ट्रीय शक्ति के नए मानक बन चुके हैं। अमेरिका और चीन के बीच चल रहा तकनीकी संघर्ष केवल नवाचार की प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक श्रेष्ठता की लड़ाई है। अब डेटा को नया तेल और तकनीक को नया हथियार कहा जाने लगा है।जलवायु परिवर्तन की राजनीति भी आर्थिक हितों से अछूती नहीं है। विकसित और विकासशील देशों के बीच कार्बन उत्सर्जन, हरित ऊर्जा और जलवायु वित्त को लेकर चल रही बहस इस बात का प्रमाण है कि पर्यावरणीय मुद्दों के पीछे भी आर्थिक समीकरण गहराई से जुड़े हुए हैं। हर देश चाहता है कि विकास की गति बनी रहे और उसकी आर्थिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित न हो।
आज की दुनिया में एक कठोर सत्य उभरकर सामने आया है राजनीति का नया ध्रुवतारा आर्थिक स्वार्थ बन चुका है। चाहे अमेरिका की व्यापारिक रणनीतियाँ हों, चीन का वैश्विक विस्तार, रूस की ऊर्जा कूटनीति, यूरोप की नीतिगत दुविधाएँ, भारत का संतुलनकारी दृष्टिकोण या अफ्रीका और मध्य-पूर्व में बढ़ती प्रतिस्पर्धा—हर जगह राष्ट्रीय हितों का केंद्र आर्थिक शक्ति ही है।भविष्य की विश्व व्यवस्था भी संभवतः इसी दिशा में आगे बढ़ेगी, जहाँ मित्रता, विरोध, गठबंधन और संघर्ष सभी का अंतिम निर्धारक आर्थिक लाभ होगा। ऐसे समय में देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक विकास हासिल करना नहीं, बल्कि आर्थिक स्वार्थ और वैश्विक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना होगी। यही संतुलन आने वाले दशकों में विश्व राजनीति की दिशा और मानव सभ्यता के भविष्य को तय करेगा।

