दीवाली की रौनक में जब घर लौटने का पैगाम आता है,
थके हुए कदमों में भी एक नया उत्साह जग जाता है,
दुनिया की सारी दौलत एक तरफ फीकी पड़ जाती है,
जब माँ की मुस्कान और अपनों का प्यार बुलाता है।
न महलों की चाहत,न दौलत का अभिमान होता है,
अपने घर के आँगन में ही खुशियों का जहान होता है,
जहाँ हर दीवार में बचपन की यादें मुस्कुराती हैं,
छोटी-सी छत इंसान का सबसे बड़ा अरमान होती है।
कहीं दीपों की जगमग है,कहीं अपनों का इंतजार है,
कहीं माँ की दुआएँ हैं,कहीं पिता का असीम प्यार है,
दूरियों के सारे बंधन एक पल में टूट जाते हैं,
जब घर की चौखट पर अपने लौटने का त्योहार है।
सफ़र चाहे कितना लंबा हो,मंजिल प्यारी लगती है,
घर की मिट्टी हर महँगी खुशबू से न्यारी लगती है,
जहाँ रूठने-मनाने में भी अपनापन झलकता है,
वही जगह दुनिया की हर जन्नत से प्यारी लगती है।
दीवाली सिखाती है रिश्तों का असली धन क्या होता है,
घर लौटने का सुकून दुनिया के हर वैभव से बड़ा होता है,
किशन महल तो केवल पत्थरों से बनकर खड़े हो जाते हैं,
मगर अपना घर अपनों के प्रेम से स्वर्ग बना होता है।

