जहाँ आदर नहीं,वहाँ कदम बढ़ाना छोड़ दो,
अपमान की चौखट पर सिर झुकाना छोड़ दो,
जहाँ कद्र नहीं तुम्हारे अस्तित्व और विचारों की,
वहाँ अपनी उपस्थिति का एहसास कराना छोड़ दो।
जो सुनने को तैयार नहीं,उसे समझाना छोड़ दो,
बंद दरवाजों पर शब्दों को आजमाना छोड़ दो,
जहाँ अहंकार ने विवेक पर पहरे बिठा रखे हों,
वहाँ अपनी ऊर्जा और समय गंवाना छोड़ दो।
जो पचता नहीं,उसे थाली में सजाना छोड़ दो,
जो तन-मन को रास न आए,उसे अपनाना छोड़ दो,
हर चमकती चीज सोना नहीं होती इस दुनियाँ में,
स्वाद के लिए स्वास्थ्य को दाँव पर लगाना छोड़ दो।
जो सत्य सुनकर भी रूठें,उन्हें मनाना मत,
झूठ के आगे सच का शीश झुकाना मत,
जिसे अपनी गलती से अधिक अहंकार प्यारा हो,
उसके आगे अपने स्वाभिमान को मिटाना मत।
आत्मसम्मान की लौ को कभी बुझने देना मत,
समय के साथ अपने सिद्धांतों को बदलने देना मत,
किशन हर रिश्ते को निभाना,मगर खुद को खोकर नहीं,
सत्य,सम्मान और स्वाभिमान से समझौता करना मत।

