भारत की आर्थिक ताकत का दुनिया में डंका या वैश्विक मंदी का नया शंखनाद? ई100 एथेनॉल,विश्व बैंक क़ी रिपोर्ट बैंकिंग सुधार और हरित हाइड्रोजन से आत्मनिर्भरता की उड़ान, लेकिन ट्रंप, चीन और पश्चिम एशिया ने बढ़ाई चुनौतियां!
दिवाली 8 नवंबर 2026 पर भारत की अर्थव्यवस्था का महापरीक्षण! -50 करोड़ गरीबों की जिंदगी में रोशनी, ई 100 से ऊर्जा क्रांति,शेयर बाजार को टैक्स गिफ्ट की उम्मीद, लेकिन ट्रंप की 1929 जैसी मंदी वाली चेतावनी ने बढ़ाई दुनियाँ की धड़कन! – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दीपावली केवल दीपों,खुशियों और समृद्धि का पर्व नहीं है,बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश,निराशा पर आशा और संकट पर संकल्प की विजय का प्रतीक भी है।वर्ष 2026 की दीपावली ऐसे समय में आ रही है,जब भारतीय अर्थव्यवस्था एक ओर गरीबी उन्मूलन,हरित ऊर्जा,घरेलू उपभोग,मुक्त व्यापार समझौतों और आर्थिक सुधारों की नई संभावनाओं के साथ आगे बढ़ रही है,वहीं दूसरी ओर वैश्विक भू- राजनीतिक तनाव,महंगे कच्चे तेल,चीन के शेयर बाजार की कमजोरी और अमेरिका की अनिश्चित नीतियां विश्व अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि,इसलिए इस बार भारतीय निवेशकों और आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ा संदेश है कि आर्थिक उपलब्धियों का उत्सव अवश्य मनाएं, लेकिन वैश्विक जोखिमों को नजरअंदाज करके वित्तीय निर्णय न लें।इस दीपावली हमारा संकल्प होना चाहिए,आर्थिक आत्मनिर्भरता निवेश में विवेक,ऊर्जा में स्वावलंबन, रोजगार में गुणवत्ता और विकास में समानता।क्योंकि असली समृद्धि वह नहीं जो केवल शेयर बाजार में चमके, बल्कि वह है जिसकी रोशनी देश के अंतिम नागरिक के घर तक पहुंचे।29 अक्टूबर को राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी.अनंत नागेश्वरन ने कहा कि वर्ष 2026 भारत के लिए 1991 जैसा महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। उनका आशय 1991 जैसी भुगतान संतुलन की आपातस्थिति से नहीं, बल्कि बदलती वैश्विकआर्थिक व्यवस्था में भारत को अपनी रणनीति बदलने की आवश्यकता से था। उन्होंने आयात प्रतिस्थापन,घरेलू विनिर्माण,निर्यात प्रतिस्पर्धा और महत्वपूर्ण संसाधनों में रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर जोर दिया।आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!
साथियों बात अगर हम गरीबी उन्मूलन की ऐतिहासिक उपलब्धि :49.6 करोड़ लोगों के जीवन में बदलाव को समझने की करें तो इस दीपावली भारत के लिए सबसे उत्साहजनक समाचार विश्व बैंक की 30 अक्टूबर 2026 को चर्चा में आई अक्टूबर की इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रिफ रिपोर्ट है। इसके अनुसार वर्ष 2011 से 2023 के बीच भारत में लगभग 49.6 करोड़ लोग प्रतिदिन 4.20 डॉलर की निम्न-मध्यम आय वाले देशों की अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा से ऊपर आए। इस मानक पर गरीबी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया।वहीं तीन डॉलर प्रतिदिन के अत्यधिक गरीबी मानक पर गरीबी 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत हुई। दोनों आंकड़े 2021 की क्रयशक्ति समता यानी पीपीपी पर आधारित हैं। यह उपलब्धि घरेलू उपभोग, रोजगार में वृद्धि,ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती कार्य भागीदारी और खाद्यान्न सब्सिडी जैसे सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों से जुड़ी है।वर्ष 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ की वृद्धि भी दर्ज की गई।इसका वैश्विक संदेश स्पष्ट है कि भारत का विशाल घरेलू बाजार निवेश और उत्पादन के लिए आकर्षक बन रहा है। लेकिन इस उपलब्धि के साथ विश्व बैंक ने आय की असमानता भी रेखांकित की है। शीर्ष 10 प्रतिशत और निचले 10 प्रतिशत के बीच आय का अंतर लगभग 13 गुना है। इसलिए गरीबी से बाहर निकलने के बाद अगली चुनौती गुणवत्तापूर्ण रोजगार,बेहतर वेतन,शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थायी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।केवल गरीबी का आंकड़ा घटना पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रत्येक परिवार की वास्तविक क्रयशक्ति बढ़ना भी आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम हरित हाइड्रोजन के 23 अनुबंध: भारत की ऊर्जा कूटनीति को नई ताकत को समझने की करें तो,भारत की दूसरी बड़ी उपलब्धि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत सामने आई है।नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की 29 अक्टूबर की जानकारी के अनुसार 2023 में मिशन शुरू होने के बाद भारतीय कंपनियों ने कुल 23 ऑफटेक अनुबंध किए हैं, जिनकी प्रतिबद्धता लगभग 5,55, 610 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष हरित हाइड्रोजन समतुल्य है। इनमें 2026 के दौरान 18 नए समझौते हुए हैं और 70 प्रतिशत से अधिक मात्रा निर्यात के लिए निर्धारित है। इन परियोजनाओं से लगभग 90,000 करोड़ रुपये के निवेश की संभावना है।जापान,दक्षिण कोरिया और यूरोपीय बाजारों के साथ ग्रीन अमोनिया तथा ग्रीन मेथनॉल के समझौते भारत को स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकते हैं।इससे विदेशी मुद्रा अर्जन, रोजगार,तकनीकी निवेश, औद्योगिक विकास और ऊर्जा कूटनीति को मजबूती मिलेगी।हालांकि ध्यान रहे कि ये खरीद-आपूर्ति प्रतिबद्धताएं हैं,पूरी हो चुकी उत्पादन उपलब्धियां नहीं परियोजनाओं का समय पर निर्माण, सस्ती नवीकरणीय बिजली, जल उपलब्धता और प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत ही इन समझौतों को वास्तविक आर्थिक सफलता में सटीकता से बदलेंगे।
साथियों, इसी दिशा में केंद्र सरकार ने 26 अक्टूबर को केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन करके ई85 के साथ ई 100 ईंधन को भी मान्यता दी है। यह भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।ई 100 मुख्यतःएथेनॉल आधारित ईंधन है,जिसका उपयोग केवल उसके अनुकूल और प्रमाणित फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में किया जा सकेगा। सामान्य ई 20 वाहनों को ई100 के अनुकूल नहीं माना जा सकता।भारत में गन्ना, मक्का और अन्य कृषि आधारित स्रोतों से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने पर किसानों की आय, ग्रामीण उद्योग और रोजगार को लाभ मिल सकता है। सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने का है। लेकिन इसके लिए एथेनॉल की पर्याप्त उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों का संतुलित उपयोग, वाहन निर्माण और देशव्यापी ईंधन वितरण नेटवर्क विकसित करना होगा।
साथियों बात अगर हम चीन का 3.5 ट्रिलियन डॉलर का शेयर बाजार झटका: भारत के लिए अवसर या चेतावनी? को समझने की करें तो,दूसरी ओर चीन का शेयर बाजार निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तकउपलब्ध बाजार रिपोर्टों के अनुसार सीएसआई 300 सूचकांक में लगातार 12 सप्ताह की साप्ताहिक गिरावट दर्ज हुई, जो 2005 में इसके आरंभ के बाद सबसे लंबी गिरावट बताई गई है। मई के शिखर से चीनी शेयर बाजार लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर का बाजार मूल्य गंवा चुका है। इसके पीछे कमजोर घरेलू मांग, कंपनियों के मुनाफे में गिरावट, रियल एस्टेट संकट, इलेक्ट्रिक वाहन और तकनीकी कंपनियों में प्रतिस्पर्धा, एआई निवेश पर बढ़ते खर्च तथा सरकारी प्रोत्साहन की प्रभावशीलता को लेकर अनिश्चितता प्रमुख कारण हैं।एआई क्षेत्र में भारी पूंजी लगाने के बावजूद निवेश पर अपेक्षित प्रतिफल न मिलने की आशंका ने भी तकनीकी शेयरों पर दबाव बढ़ाया है। चीन की यह स्थिति भारत के लिए अवसर पैदा कर सकती है, क्योंकि वैश्विक कंपनियां वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र तलाश रही हैं। भारत को इसका लाभ तभी मिलेगा जब वह लॉजिस्टिक्स, उत्पादन लागत, कौशल, नीतिगत स्थिरता और निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार करेगा। केवल चीन की कमजोरी से भारतीय बाजार अपने आप मजबूत नहीं हो जाएगा।
साथियों बात अगर हम ट्रंप की 1929 जैसी महामंदी की चेतावनी: क्या दुनिया फिर आर्थिक तबाही की ओर? को समझने की करें तो,अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आर्थिक और राजनीतिक बयान वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा रहे हैं।12 अक्टूबर को ओहायो की चुनावी सभा में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी जीतती है तो अमेरिका को 1929 जैसी आर्थिक महामंदी का सामना करना पड़ सकता है और लोगों के 401(के)सेवानिवृत्ति निवेश की कीमत प्रभावित हो सकती है। 27 अक्टूबर को टेक्सास की सभा में भी उन्होंने इसी प्रकार की चेतावनी दोहराई। लेकिन यह ट्रंप का चुनावी राजनीतिक दावा है, किसी आर्थिक संस्था का प्रमाणित पूर्वानुमान नहीं।1929 की महामंदी के पीछे शेयर बाजार का पतन,बैंकिंग संकट, मांग में भारी कमी, बेरोजगारी और मौद्रिक नीतियों की विफलताएं थीं। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था की संरचना, केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था और वित्तीय नियमन अलग हैं।इसलिए 1929 जैसी मंदी को निश्चित मानना उचित नहीं होगा। फिर भी व्यापार शुल्क,सरकारी कर्ज,महंगी ऊर्जा,भू- राजनीतिक युद्ध और निवेशकों के भरोसे में गिरावट गंभीर जोखिम हैं। यदि अमेरिकी बाजार में बड़ी गिरावट आती है तो विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकाल सकते हैं, डॉलर मजबूत हो सकता है और भारतीय शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है।
साथियों ट्रंप ने 27 अक्टूबर को टेक्सास की एक सभा में वेनेजुएला को संभावित रूप से अमेरिका का 51वांराज्य बनाने की बात भी कही।उन्होंने वहां के विशाल तेल भंडार और अमेरिकी कंपनियों के निवेश का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति के स्थान पर गवर्नर चुने जाने जैसी टिप्पणी की।यह फिलहाल राजनीतिक बयान है,कोई कानूनी विलय प्रक्रिया नहीं। वेनेजुएला की संप्रभुता,वहां की जनता की सहमति और अमेरिकी संवैधानिक प्रक्रिया के बिना ऐसा कदम व्यावहारिक नहीं है। इसका वास्तविक आर्थिक महत्व वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर अमेरिकी प्रभाव, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक तेल बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है।भारत के लिए इसका प्रभाव तेल की कीमतों, अमेरिकी ऊर्जा नीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समीकरणों के माध्यम से सामने आ सकता है।
साथियों बात अगर हम 116 डॉलर का कच्चा तेल: भारत के घरेलू बजट पर वैश्विक युद्ध का प्रहार को समझने की करें तो,पश्चिम एशिया का तनाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे संवेदनशील नस यानी ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की रास तनुरा और रबीघ रिफाइनरी तथा अबकै़क स्थित ऊर्जा प्रतिष्ठान को निशाना बनाने के दावों के बाद तेल बाजार में घबराहट बढ़ी है। 30 अक्टूबर को शुरुआती कारोबार में ब्रेंट क्रूड 115.74 डॉलर और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 102.72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। बाद में ब्रेंट का वायदा भाव 117.64 डॉलर पर बंद हुआ। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए तेल महंगा होने का अर्थ केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव नहीं,बल्कि परिवहन खाद,बिजली,खाद्य पदार्थों, विनिर्माण और आयात बिल पर भी असर है।इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव आ सकता है और महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है। सरकार के सामने पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखने, तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति और राजकोषीय संतुलन के बीच कठिन निर्णय लेने की चुनौती होगी।रूस से रियायती तेल खरीद,अन्य आपूर्तिकर्ताओं से समझौते, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और नवीकरणीय ऊर्जा इस संकट से निपटने के महत्वपूर्ण विकल्प हैं।
साथियों बात अगर हम शेयर बाजार को दिवाली का उपहार : क्या एलटीसीज़ी टैक्स में कटौती होगी? इसको समझने की करें तो भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की निराशा दूर करने के लिए केंद्र सरकार के भीतर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर यानी एलटीसीज़ी को मौजूदा 12.5 प्रतिशत से कम करने पर चर्चा की खबर सामने आई है।इसके अतिरिक्त विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को रुपये के बजाय डॉलर में हुए वास्तविक पूंजीगत लाभ के आधार पर कर भुगतान का विकल्प देने पर भी विचार बताया गया है।इस प्रस्ताव का उद्देश्य घरेलू निवेशकों का विश्वास बढ़ाना,विदेशी पूंजी आकर्षित करना और भारतीय शेयर बाजार की प्रतिस्पर्धात्मकता सुधारना है। हालांकि यह अभी विचार- विमर्श की खबर है, सरकार द्वारा घोषित कर कटौती नहीं।एसटीटी समाप्त करने या घटाने की कोई पुष्ट सरकारी घोषणा भी नहीं माननी चाहिए। यदि एलटीसीज़ी में राहत मिलती है तो बाजार की धारणा सुधर सकती है, लेकिन केवल टैक्स घटाने से कंपनियों के मुनाफे, रोजगार और वेतन वृद्धि की समस्याएं समाप्त नहीं होंगी।
साथियों बात अगर हम बैंकिंग सुधारों का रोडमैप: विकसित भारत 2047 की वित्तीय नींव को समझने की करें तो 30 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने बजट 2026-27 में घोषित हाई लेवल कमेटी ऑन बैंकिंग फॉर विकसित भारत का गठन कर दिया। पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन. पटेल को इसका अध्यक्ष बनाया गया है। समिति में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू, इंडियन बैंक की पूर्व एमडी पद्मजा चुंडुरू और आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर एन.एस. विश्वनाथन सदस्य होंगे। समिति का कार्यकाल छह महीने है। इस समिति का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली की कार्यप्रणाली, नियामकीय कानूनों, ग्रामीण और सहकारी बैंकों, पूंजी की जरूरत, निजी निवेश, डिजिटल बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा तथा प्राथमिकता क्षेत्र ऋण व्यवस्था की समीक्षा करना है। इसका प्रभाव केवल बैंकों तक सीमित नहीं रहेगा।मजबूत बैंकिंग प्रणाली उद्योगों को सस्ता ऋण, छोटे उद्यमों को पूंजी, किसानों को वित्तीय सहायता और निवेशकों को अधिक भरोसा दे सकती है। यदि छह महीने बाद ठोस और व्यावहारिक सुधारों का रोडमैप सामने आता है तो यह विकसित भारत 2047 के लिए महत्वपूर्ण संस्थागत कदम होगा।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

