ढलते हुए सूरज को देखकर,हर घर में दीप जलाते हैं,
अँधियारे से बचने को,रोशनियों के फूल खिलाते हैं।
पर ढलती उम्र के संकेतों को,क्यों नज़रअंदाज़ करते हैं,
बाहर की दुनियाँ चमकाते हैं,भीतर अँधेरा क्यों भरते हैं?
घर की दीवारें जगमग हों,तो मन का तम नहीं मिटता है,
अंतरमन में भक्ति का दीप जले,तभी जीवन निखरता है।
भजन-सिमरन की पावन धारा,मन क़ा मैल धो जाती है
प्रभु-नाम की मीठी ज्योति,आत्मा को राह दिखाती है।
ढलती उम्र कहती है हमसे,अब तो कुछ सत्कर्म करो,
माया के मोह में खोकर,जीवन यूँ न व्यर्थ करो।
धन-दौलत और मान-सम्मान,यहीं धरे रह जाएँगे,
प्रभु-नाम के सच्चे मोती ही,अंतर्मन को महकाएँगे।
साँझ उतरने लगे जीवन में,प्रभु का ध्यान लगाना सीखो,
साँसों की आती-जाती लय में,नाम-सिमरन बसाना सीखो
क्रोध,अहंकार और लोभ मिटाकर,प्रेम की राह अपनाओ,
बाहर के दीपों के संग-संग,भीतर भी प्रकाश जगाओ।
सूरज ढले तो घर चमकाओ,उम्र ढले तो ज्ञान जगाओ,
तन की संध्या आने से पहले,मन में प्रभु का प्रेम बसाओ।
किशन बाहरी लाइट बुझ जाएगी,जग चमक मिट जाएगी
अंतरमन में नाम की लौ जले,तो आत्मा राह पा जाएगी।

