चंदन सिंह | पेज 3 न्यूज़ वर्ल्डवाइड | नई दिल्ली
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने जनसंघ के संघर्ष, आपातकाल के बलिदान और भाजपा की राजनीतिक यात्रा को किया याद
नई दिल्ली। भारतीय जनसंघ के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने जनसंघ की स्थापना से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन और देश की राजनीति में उसकी यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जलाया गया विचारों का दीप आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में विकसित हुआ है।
अपने संबोधन में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि जनसंघ की स्थापना भारत की आत्मा, गौरव और संस्कृति को राजनीतिक अभिव्यक्ति देने के उद्देश्य से हुई थी। उन्होंने कहा कि जनसंघ ने सत्ता की राजनीति के बजाय सिद्धांतों और राष्ट्रवाद को प्राथमिकता दी।
उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नारे—‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे’—का उल्लेख करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण का उनका सपना बाद में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के साथ पूरा हुआ।
तीन सांसदों से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने जनसंघ के शुरुआती चुनावी सफर को याद करते हुए बताया कि 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में पार्टी को तीन सीटें मिली थीं। इसके बाद 1957 में चार, 1962 में 14, 1967 में 35 और 1971 में 22 सीटें मिलीं। उन्होंने कहा कि शुरुआती सीमित चुनावी सफलता के बावजूद जनसंघ का जनाधार बढ़ता रहा और कार्यकर्ताओं ने विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।
उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 23 जून 1953 को कश्मीर में निधन और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय में हुई रहस्यमय मृत्यु को संगठन के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और अंत्योदय के विचारों ने संगठन को वैचारिक दिशा दी।
आपातकाल में कार्यकर्ताओं के संघर्ष को किया याद
25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस दौरान जनसंघ सहित विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में डाला गया। उनके अनुसार, दिल्ली सहित देशभर में एक लाख से अधिक कार्यकर्ता जेल गए और उन्होंने लाठियां तथा यातनाएं सहीं, लेकिन राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी।
उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और नानाजी देशमुख सहित उन नेताओं को याद किया, जिन्होंने आपातकाल के दौरान संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि 1977 में जनता पार्टी के गठन और चुनावी जीत के बाद जनसंघ की विचारधारा को केंद्र की सत्ता में प्रतिनिधित्व मिला।
जनसंघ से भाजपा तक का सफर
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने 1979 में जनता पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधों को लेकर उठे विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसंघ से जुड़े नेताओं ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से समझौता नहीं किया। इसके बाद 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ।
उन्होंने बताया कि भाजपा ने 1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीटों से शुरुआत करते हुए 1989 में 86 और 1991 में 120 सीटें हासिल कीं। वर्ष 1996 में भाजपा लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। इसके बाद 2019 में पार्टी ने अधिक सीटें हासिल कीं और 2024 में लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाई।
अनुच्छेद 370 और राम मंदिर का किया उल्लेख
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जनसंघ की विचारधारा से जुड़े प्रमुख मुद्दों के रूप में देखे जाते हैं। उन्होंने तीन तलाक पर कानून और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा का भी उल्लेख किया।
अपने संबोधन में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के योगदान को याद किया। साथ ही उन लाखों कार्यकर्ताओं के संघर्ष को भी रेखांकित किया, जिन्होंने संगठन को गांव-गांव तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
2047 तक विकसित भारत का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे अपने अनुभव नई पीढ़ी के साथ साझा करें और संगठन के संघर्षपूर्ण इतिहास से युवाओं को परिचित कराएं।
उन्होंने कहा कि 75 वर्षों की यात्रा का संदेश ‘त्याग से शिखर तक’ रहा है और अब लक्ष्य ‘शिखर से शिखर तक’ पहुंचने के साथ वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से सत्ता को सेवा का माध्यम मानने और विनम्रता बनाए रखने का आह्वान किया।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के शब्दों—‘हम भारत के हैं, भारत हमारा है’—का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपना संबोधन समाप्त किया।


