रावण के दस सिर हमने,हर दशहरे जलाए हैं,
ढोल-नगाड़ों की धुन पर,उत्सव खूब मनाए हैं।
पर मन के भीतर बैठे रावण पर,ध्यान नहीं जाता है,
पुतला तो जल जाता है,पर रावण फिर लौट आता है।
काम, क्रोध और लोभ ने,मन में डेरा डाला है,
मोह-मद और मत्सर ने,जीवन को उलझा डाला है।
अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ और छल,अंतरमन को खाते हैं,
ये दस सिर हर दिन उठकर,इंसान को ही हराते हैं।
कागज़ के रावण को जलाकर,खुद को वीर बताते हैं,
लेकिन अपने दोषों पर हम,चुप्पी क्यों अपनाते हैं?
दूसरों की बुराइयों का,जग में ढिंढोरा पीटते हैं,
अपने भीतर झाँकने से,जाने क्यों हम डरते हैं?
जिस दिन काम-क्रोध पर,संयम का तीर चलाएँगे,
लोभ-मोह के बंधन तोड़ें,सत्य की राह अपनाएँगे।
अहंकार को त्यागकर जब,प्रेम के दीप जलाएँगे,
उस दिन अपने भीतर का रावण,सचमुच मार गिराएँगे।
आओ इस दशहरे पर,इक नया संकल्प उठाएँ,
मन के दसों विकारों को,जड़ से दूर भगाएँ।
किशन आओ रावण के संग,भीतर का रावण भी जलाएँ
सच्चे अर्थों में विजयादशमी का,पावन पर्व रोज़ मनाएँ।

