(जहाँ जीत से नहीं,त्याग से रिश्तों की पहचान होती है)
संबंध कोई रणभूमि नहीं,जहाँ जीत का अभिमान हो,
यह प्रेम की वह साधना है,जहाँ त्याग ही सम्मान हो।
स्वयं को सिद्ध करने से बेहतर,किसीको समझना होता है
रिश्तों को जीवित रखने के लिए,स्वयं भी झुकना होता है
हर बात का उत्तर देना ही,समझदारी की निशानी नहीं,
कुछ अपनों की भूल सह लेना भी, प्रेम की मेहरबानी है।
जो हर पल अपनी ही जीत का,रिश्तों में हिसाब रखते हैं,
वे अक्सर भरे हुए घर में भी,तन्हाई का एहसास रखते हैं।
मौन को शब्द बनाना,कभी अश्रुओं को पीना होता है, अपनों की मुस्कान के लिए,अपना अहंकार सीना होता है
जहाँ हारकर भी मन में कोई,पछतावे का भार नहीं होता,
वहीं संबंधों का वास्तविक अर्थ,केवल व्यवहार नहीं होता
दूसरों को जिताकर देखो,कितनी सुंदर जीत मिलती है,
किसी के चेहरे की मुस्कान में,अपनी ख़ुशी खिलती है।
जो स्वयं हारकर भी अपनों का,विश्वास बचा लेते हैं,
वही लोग टूटते हुए रिश्तों को,फिर से सज़ा लेते हैं।
संबंधों में झुकना,कभी अपनी हार नहीं होती,
सहनशीलता की हर चुप्पी,कायरता नहीं होती।
किशन त्याग वहीं तक सुंदर है,जहाँ दोनों का सम्मान रहे,
रिश्ते वही अमर होते हैं,जहाँ प्रेम के साथ स्वाभिमान रहे।
