आईना लेकर निकला तो बाज़ार सूना मिला,
सच दिखाया चेहरों को,हर चेहरा रूठा मिला।
मुखौटे सजाए तो खरीदारों की कतार लग गई,
झूठ की चमक देखिए,सच्चाई फिर हार गई।
कोई सज्जनता का मुखौटा पहनकर छल करता रहा,
कोई रिश्तों की आड़ में अपना मतलब भरता रहा।
चेहरे पर मुस्कान,मगर दिल में हिसाब रखते हैं,
आजकल लोग रिश्तों में भी कई नक़ाब रखते हैं।
सच बोलने वाले अब अक्सर बदनाम किए जाते हैं,
झूठ को सजाकर बड़े सम्मान दिए जाते हैं।
आईना जो हकीकत दिखाए,पत्थर उसी पर पड़ते हैं,
मुखौटे जितने सुंदर हों,उतने महँगे बिकते हैं।
मगर वक़्त की अदालत में मुखौटे उतर ही जाते हैं,
झूठ के ऊँचे महल एक दिन बिखर ही जाते हैं।
किरदार की ख़ुशबू को कोई पर्दा रोक नहीं सकता,
सच को कुछ देर दबा लो,कोई मिटा नहीं सकता।
इसलिए चेहरा नहीं,अपना चरित्र सँवारकर रखिए,
भीड़ चाहे जैसी हो,सच को आधार बनाकर रखिए।
किशन मुखौटों की दुनियाँ में,असली चेहरा ही कमाल है,
झूठ के लाख खरीदार सही,सच आज भी बेमिसाल है।

