जीते-जी माँ की आँखें दरवाज़े पर राह निहारती रहीं,
पिता की बूढ़ी साँसें दो मीठे बोलों को पुकारती रहीं,
संतान अपनी दुनियाँ में सफ़लता के शिखर सजाती रही,
वृद्धाश्रम की चौखट पर ममता चुपचाप आँसू बहाती रही
जिन हाथों ने उँगली पकड़कर चलना कभी सिख़ाया था,
उन्हीं काँपते हाथों को हमने अकेलेपन में छोड़ आया था,
दो पल बैठने का समय नहीं,व्यस्तता का बहाना खूब रहा
मृत्यु हुई तो भव्य श्राद्ध में प्रेम का प्रदर्शन खूब हुआ!
जीते-जी रोटी संग अपनापन देने की फुर्सत नहीं मिली,
मृत्यु के बाद पकवानों की थाली सजाने में कमी नहीं रही,
जीते-जी माँ-बाप तरसते रहे संतान के दो मीठे बोलों को,
बाद में भोज कराते रहे हम,दिखाने अपने संस्कारों को!
श्राद्ध तभी सार्थक है,जब जीवित रिश्तों का सम्मान रहे,
बूढ़े माँ-बाप के चेहरे पर मुस्कान और हृदय में मान रहे,
पितृ पक्ष केवल कर्मकांड नहीं आत्ममंथन का महापर्व बने
हर घर में सेवा-संस्कारों की संवेदनशील सामाजिक क्रांति जगे।
आओ ऐसा समाज रचें,जहाँ वृद्धाश्रम मजबूरी का नाम न हो,
माता-पिता के जीवित रहते घर में अकेलेपन की शाम न हो,
किशन फूल समाधि पर बाद में रखना,पहले चरणों में सम्मान धरें,
जीते-जी माता-पिता को स्वर्ग दें,फिर श्रद्धा से श्राद्ध करें।

